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हसरत भरी नजर

 

​हसरत भरी नजर से देखा,

मुझे मिठाइयाँ खरीदते हुए।

फ़ुरसत न थी तब,

जब वह मिला मुझे।

 

​दीये की रोशनी में

अनायास ही फिर,

गरीबी को ओढ़े हुए

वह नजर आया मुझे।

 

​छत की ओर ताकते हुए,

खुद से खुद को छुपाते हुए।

अपनी किस्मत को छुपाते हुए,

रोशनी से खुद को छलाते हुए।

 

​मैंने पूछा तुझे क्या चाहिए?

‘ना’ में सर को हिलाते हुए,

अपने जमीर को जगाते हुए,

जगमगाती रोशनी के दूसरे पहलू से,

​आज उसने मिलाया मुझे।

 

​— अश्विनी राय ‘अरुण’

 

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