धार की भोजशाला: भाग-4 (वर्ष 2024 का ऐतिहासिक एएसआई वैज्ञानिक सर्वे और 2100 पन्नों का सच)
(नोट: यह इस विशेष श्रृंखला का चौथा भाग है। पिछले भागों में हमने प्राचीन इतिहास, औरंगज़ेब और खिलजी के विध्वंस, राजा पटनीमल की भूमिका और २००३ के ‘मंगलवार-शुक्रवार’ के पूजा-नमाज़ फॉर्मूले को समझा था। इस भाग में हम उस वैज्ञानिक और पुरातात्विक क्रांति का विश्लेषण करेंगे जिसने इस पूरे मुकदमे की नींव को हिलाकर रख दिया।)
वर्ष २००३ से लागू मंगलवार को पूजा और शुक्रवार को नमाज़ की व्यवस्था ने धार में तात्कालिक शांति तो कायम रखी, लेकिन यह इस ऐतिहासिक विवाद का स्थायी समाधान नहीं था। हिंदू पक्षकारों का स्पष्ट मत था कि विद्या की इस पावन देवी के मंदिर का चरित्र आंशिक रूप से भी मस्जिद का नहीं हो सकता। अंततः, इस ऐतिहासिक सच्चाई को वैज्ञानिक धरातल पर परखने के लिए ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ नामक संस्था ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
आइए इस चौथे भाग में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के ऐतिहासिक आदेश और वर्ष २०१४ में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा किए गए ९८ दिनों के वैज्ञानिक महा-सर्वे के चौंकाने वाले निष्कर्षों को गहराई से समझते हैं।
१. हाईकोर्ट का रुख और एएसआई (ASI) को सर्वे का आदेश (मार्च २०२४)
अयोध्या के राम जन्मभूमि मामले और वाराणसी के ज्ञानवापी परिसर की तर्ज पर, धार की भोजशाला में भी असली सत्य केवल ज़मीन के नीचे दबे अवशेष ही बता सकते थे।
- हाईकोर्ट का ऐतिहासिक निर्देश: ११ मार्च २०२४ को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने एक बड़ा और युगांतरकारी आदेश सुनाया। कोर्ट ने एएसआई को स्पष्ट निर्देश दिया कि वह आधुनिक जीपीआर (Ground Penetrating Radar), कार्बन डेटिंग और आधुनिकतम वैज्ञानिक तकनीकों का उपयोग करके पूरे भोजशाला परिसर का एक व्यापक और विस्तृत सर्वेक्षण करे।
- ९८ दिनों का महा-सर्वे: हाईकोर्ट के आदेश के पालन में, एएसआई की ३० से अधिक वरिष्ठ पुरातत्वविदों की टीम ने २२ मार्च २०२४ से २७ जून २०२४ के बीच लगातार 98 दिनों तक परिसर के भीतर और बाहर वैज्ञानिक उत्खनन (Excavation) और जांच की। इस सर्वे की पूरी प्रक्रिया की चौबीसों घंटे वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी कराई गई ताकि निष्पक्षता पर कोई सवाल न उठ सके।
२. २१०० पन्नों की एएसआई रिपोर्ट: ज़मीन के नीचे से निकले अकाट्य हिंदू प्रमाण
जुलाई २०२४ में एएसआई ने अपनी कई महीनों की वैज्ञानिक जांच के बाद २१०० से अधिक पन्नों की एक विस्तृत और व्यापक आधिकारिक रिपोर्ट मध्य प्रदेश हाईकोर्ट को सौंप दी। इस रिपोर्ट ने दोनों पक्षों के दावों के बीच विज्ञान का आईना रख दिया।
खुदाई और सर्वेक्षण के दौरान एएसआई को निम्नलिखित अत्यंत महत्वपूर्ण और अकाट्य साक्ष्य प्राप्त हुए:
क) चूने और प्लास्टर के पीछे छिपाई गई हिंदू मूर्तियां
सर्वेक्षण के दौरान सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि मस्जिद के भीतरी हिस्सों और खंभों पर जहां चूने और आधुनिक प्लास्टर की मोटी परतें चढ़ाई गई थीं, उन्हें जब वैज्ञानिक पद्धतियों से साफ किया गया, तो उनके पीछे प्राचीन हिंदू मूर्तियां और नक्काशी छिपी हुई मिली। एएसआई को परिसर से भगवान गणेश, भगवान विष्णु, मां पार्वती, वाग्देवी और विभिन्न यक्ष-यक्षिणियों की ९० से अधिक प्राचीन खंडित मूर्तियां प्राप्त हुईं।
ख) ‘ओम सरस्वती नमः’ और संस्कृत के शिलालेख
मस्जिद की दीवारों में उल्टे और सीधे चिनवाए गए पत्थरों की आधुनिक रडार (GPR) और थ्री-डी लेजर स्कैनिंग की गई। इस जांच में पत्थरों पर उत्कीर्ण ३० से अधिक महत्वपूर्ण संस्कृत शिलालेख मिले। इनमें स्पष्ट अक्षरों में ‘ओम नमः शिवाय’, ‘ओम सरस्वती नमः’ और राजा भोज द्वारा रचित व्याकरण के सूत्र उत्कीर्ण थे।
ग) काल सर्प यंत्र (Astrological Chart) और तोरण द्वार
भोजशाला के मुख्य गर्भगृह के फर्श और दीवारों की जांच में पारंपरिक हिंदू ज्योतिष शास्त्र के अनिवार्य अंग ‘काल सर्प यंत्र’ और खगोलीय गणनाओं के रेखाचित्र उकेरे हुए मिले। इसके साथ ही, मस्जिद के मुख्य मेहराब के नीचे प्राचीन मंदिर का विशाल और भव्य तोरण द्वार (Pranala) और प्रवेश स्तंभ दबा हुआ पाया गया, जिसे १४वीं सदी में ढक दिया गया था।
[ मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का आदेश (२०२४) ]
│
(ASI द्वारा ९८ दिनों का गहन वैज्ञानिक सर्वे)
│
▼
[ २१०० पन्नों की आधिकारिक एएसआई रिपोर्ट ]
│
┌─────────────────────┴─────────────────────┐
▼ ▼
[ संरचनात्मक निष्कर्ष ] [ कलाकृतियाँ और शिलालेख ]
• मूल ढांचा ११वीं सदी का हिंदू मंदिर ही है। • चूने के पीछे से मिलीं देवी-देवताओं की ९०+ मूर्तियां।
• मंदिर की नींव और चबूतरे पर मस्जिद खड़ी की। • 'ओम सरस्वती नमः' और संस्कृत व्याकरण के सूत्र।
३. एएसआई (ASI) की रिपोर्ट का अदालती और ऐतिहासिक निष्कर्ष
अपनी २१०० पन्नों की रिपोर्ट के समापन खंड में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने बिना किसी लाग-लपेट के अदालत के सामने अपना अंतिम और वैज्ञानिक निष्कर्ष रख दिया:
“धार की वर्तमान भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद नामक संरचना का मूल चरित्र और स्थापत्य शुद्ध रूप से ११वीं शताब्दी (परमार राजवंश) के एक अत्यंत भव्य हिंदू मंदिर और विद्या केंद्र (सरस्वती सदन) का ही है। इस पहले से मौजूद मंदिर के खंभों, नक्काशीदार पत्थरों और संपूर्ण जगती (चबूतरे) का आंशिक रूप से विनाश करके, उन्हीं अवशेषों के ऊपर बाद के कालखंडों में मस्जिद का रूप देने का प्रयास किया गया था।”
मुस्लिम पक्ष (कमाल मौला मस्जिद वेलफेयर सोसाइटी) ने एएसआई की इस रिपोर्ट की वैधता को यह कहते हुए चुनौती देने की कोशिश की कि खुदाई से इमारत की सुरक्षा को खतरा है, लेकिन उनके पास इन वैज्ञानिक और भाषाई शिलालेखों का कोई प्रति-उत्तर नहीं था।
भाग-४ का निष्कर्ष
वर्ष २०२४ के इस एएसआई वैज्ञानिक सर्वे ने धार की भोजशाला की कानूनी लड़ाई का पूरा विमर्श ही बदल दिया। अब यह केवल मौखिक इतिहास या धार्मिक आस्थाओं का टकराव नहीं रह गया था; बल्कि विज्ञान, कार्बन डेटिंग और जमीन के सीने से निकले पत्थरों ने यह गवाही दे दी थी कि यह स्थान राजा भोज का ‘सरस्वती कंठाभरण’ मंदिर ही था। इसी अकाट्य वैज्ञानिक रिपोर्ट को आधार बनाकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इस सदियों पुराने विवाद पर अपना वह अंतिम और ऐतिहासिक फैसला सुनाया, जिसने धार के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया।
अगले और अंतिम भाग की ओर:
इस श्रृंखला के भाग-५ (अंतिम भाग) में हम चर्चा करेंगे—“हाईकोर्ट का ऐतिहासिक अंतिम फैसला, ‘प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट’ की वैधानिक स्थिति और भविष्य का कानूनी रुख”। हम विस्तार से जानेंगे कि कैसे इंदौर हाईकोर्ट ने भोजशाला को पूर्णतः हिंदू मंदिर घोषित करते हुए वहां नमाज पर रोक लगाई, और वर्तमान समय में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत इस विवाद के स्थाई सामाजिक व कानूनी समाधान की क्या स्थिति है।