🎬 भारतीय सिनेमा में वामपंथी एजेंडे की पोल: भाग 1
नींव का दौर (1940-1960) – इप्टा (IPTA) का उदय और नेहरूवादी समाजवाद
भारतीय सिनेमा की शुरुआत दादा साहब फाल्के ने राजा हरिश्चंद्र (1913) जैसी पौराणिक और सांस्कृतिक फिल्म से की थी। शुरुआती दौर में सिनेमा का मकसद भारतीय संस्कृति, लोककथाओं और देशभक्ति को दिखाना था। लेकिन 1940 का दशक आते-आते, जब देश आजादी की दहलीज पर खड़ा था, एक बहुत ही सोची-समझी रणनीति के तहत हिंदी सिनेमा के ‘बौद्धिक तंत्र’ (Creative Ecosystem) पर कब्जा करने की बिसात बिछाई गई।
1. इप्टा (IPTA) का गठन: कम्युनिस्ट पार्टी का सांस्कृतिक विंग
साल 1943 में भारतीय जन नाट्य संघ (IPTA – Indian People’s Theatre Association) का गठन हुआ। आधिकारिक तौर पर इसे कला और रंगमंच का संगठन कहा गया, लेकिन परदे के पीछे यह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) का सांस्कृतिक मोर्चा था। इसका मुख्य उद्देश्य मार्क्सवादी और कम्युनिस्ट विचारधारा को कला, गीतों और नाटकों के जरिए आम जनता तक पहुंचाना था।
- पटकथा और गीतों पर कब्जा: बॉलीवुड के उस दौर के सबसे बड़े लेखक, निर्देशक और गीतकार इप्टा के सक्रिय सदस्य या उससे गहरे जुड़े थे। इनमें के.ए. अब्बास, पृथ्वीराज कपूर, बलराज साहनी, उत्पल दत्त, ऋत्विक घटक, बिमल रॉय, कैफ़ी आज़मी, साहिर लुधियानवी, मजरूह सुल्तानपुरी और शैलेंद्र जैसे नाम शामिल थे।
- रणनीति: इन बुद्धिजीवियों ने यह भांप लिया था कि भारत की अनपढ़ या कम पढ़ी-लिखी जनता पर किताबों से ज्यादा फिल्मों के गानों और कहानियों का असर होता है। इसलिए, उन्होंने फिल्मों को कम्युनिस्ट ‘वर्ग संघर्ष’ (Class Struggle) का औजार बना दिया।
2. नेहरूवादी समाजवाद और वामपंथ का ‘अपवित्र गठबंधन’
आजादी के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू सोवियत संघ (USSR) के आर्थिक मॉडल और समाजवाद से बेहद प्रभावित थे। नेहरू सरकार की इस नीति ने कम्युनिस्ट विचारकों के लिए खाद-पानी का काम किया।
- सरकारी संरक्षण: नेहरू सरकार को अपनी समाजवादी नीतियों (जैसे उद्योगों का राष्ट्रीयकरण, निजी क्षेत्र पर लगाम) को जनता के बीच सही ठहराना था। वामपंथी फिल्मकारों को ऐसी कहानियां दिखाने की खुली छूट मिली जो पूंजीवाद को देश का दुश्मन साबित करती थीं।
- पुरस्कारों की राजनीति: साल 1954 में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों (National Film Awards) की शुरुआत हुई। दिलचस्प बात यह है कि शुरुआती दौर में सबसे ज्यादा पुरस्कार और सम्मान उन्हीं फिल्मों को मिले जो वामपंथी या समाजवादी एजेंडे पर खरी उतरती थीं।
3. गरीबी का महिमामंडन और अमीरों का ‘खलनायकीकरण’
इस दौर की फिल्मों ने भारतीय समाज में एक बहुत ही खतरनाक नैरेटिव सेट किया—“अमीर है तो अपराधी होगा, गरीब है तो ईमानदार होगा।”
- जमींदारों को क्रूर दिखाना: बिमल रॉय की फिल्म दो बीघा ज़मीन (1953) और महबूब खान की मदर इंडिया (1957) बेहतरीन सिनेमाई कलाकृतियां थीं, लेकिन इनके जरिए ग्रामीण भारत की जो तस्वीर दिखाई गई, उसमें जमींदार या साहूकार (सुखीलाला) को एक ऐसे नरपिशाच के रूप में स्थापित कर दिया गया जो सिर्फ खून चूसना जानता था। ग्रामीण व्यवस्था के पारंपरिक ताने-बाने, दानशीलता और सामाजिक समरसता को पूरी तरह गायब कर दिया गया।
- पूंजीपतियों पर प्रहार: राज कपूर की फिल्म आवारा (1951) और श्री 420 (1955) की पटकथा इप्टा के कट्टर सदस्य के.ए. अब्बास ने लिखी थी। इन फिल्मों में दिखाया गया कि कैसे बड़े शहरों के उद्योगपति और अमीर लोग अय्याश, धोखेबाज और अपराधियों के संरक्षक होते हैं, जबकि फुटपाथ पर रहने वाला गरीब ही सच्चा देशभक्त है। यह सीधे तौर पर कम्युनिस्ट विचारधारा की ‘सर्वहारा’ (Proletariat) बनाम ‘बुर्जुआ’ (Bourgeoisie) की थ्योरी को भारतीय परदे पर उतारना था।
4. गीतों के जरिए ‘सबलिमिनल मैसेजिंग’ (Subliminal Messaging)
वामपंथी गीतकारों ने गानों के जरिए जनता के अवचेतन मन में राष्ट्र की पारंपरिक पहचान और व्यवस्था के प्रति नफरत का बीज बोया।
- साहिर लुधियानवी ने फिल्म प्यासा (1957) के गाने “जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहाँ हैं” के जरिए सीधे तत्कालीन व्यवस्था और देश की स्थिति पर तीखा प्रहार किया।
- मजरूह सुल्तानपुरी इतने उग्र कम्युनिस्ट थे कि उन्होंने एक सार्वजनिक रैली में जवाहरलाल नेहरू की तुलना एडॉल्फ हिटलर से कर दी थी, जिसके लिए उन्हें एक साल जेल में भी काटना पड़ा था। लेकिन जेल से आने के बाद भी फिल्मों में उनका वैचारिक एजेंडा थमा नहीं।
इस दौर की पोल-खोल का निष्कर्ष
1940 से 1960 के इस कालखंड ने भारतीय जनमानस की सोच को पंगु बना दिया। उद्योगों को खड़ा करने वाले व्यवसाई, जो देश को टैक्स और रोजगार दे रहे थे, उन्हें फिल्मों में ‘विलेन’ बना दिया गया। ग्रामीण भारत के नेतृत्व (जमींदारों) को अत्याचारी घोषित कर दिया गया। नेहरू सरकार मूकदर्शक बनी रही क्योंकि यह नैरेटिव उनके अपने राजनीतिक समाजवाद को सूट करता था। इस तरह सिनेमा के जरिए भारत में ‘पूंजी निर्माण’ (Wealth Creation) को एक पाप की तरह स्थापित कर दिया गया।
इस श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए, भाग 2 में हम चलेंगे 1970 और 1980 के दशक (आक्रोश का दौर) में। जहाँ हम विश्लेषण करेंगे कि कैसे आपातकाल (Emergency) के दौरान इंदिरा गांधी सरकार ने सेंसरशिप का हंटर चलाया, कैसे सलीम-जावेद की जोड़ी ने ‘एंग्री यंग मैन’ का निर्माण कर ट्रेड यूनियनों और कम्युनिस्ट आंदोलनों को पर्दे पर वैध ठहराया, और कैसे समानांतर सिनेमा (Parallel Cinema) ने कम्युनिस्ट प्रोपेगैंडा को ‘बौद्धिक’ रूप दिया।
⚠️ डिस्क्लेमर (Disclaimer)
यह आलेख श्रृंखला पूरी तरह से शोध, ऐतिहासिक दस्तावेजों, फिल्मों के सार्वजनिक रूप से उपलब्ध दृश्यों, संवादों और तत्कालीन राजनीतिक घटनाक्रमों के क्रोनोलॉजिकल विश्लेषण पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, कलाकार, समुदाय या राजनीतिक दल की भावना को ठेस पहुंचाना नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक विशेष वैचारिक नैरेटिव (Subversive Narrative) के प्रवेश, प्रभाव और उसके राजनीतिक गठजोड़ की निष्पक्ष समीक्षा करना है। पाठक इसे एक स्वतंत्र, वैचारिक और ऐतिहासिक विमर्श के रूप में लें।