धार की भोजशाला: भाग-३ (आज़ादी के बाद का धार्मिक तनाव और ‘मंगलवार-शुक्रवार’ का ऐतिहासिक फॉर्मूला)
(नोट: यह इस विशेष श्रृंखला का तीसरा भाग है। पिछले दो भागों में हमने महाराज भोजदेव परमार द्वारा स्थापित ‘सरस्वती सदन’ विश्वविद्यालय के गौरव, सन १३०५ में अलाउद्दीन खिलजी के बर्बर हमले और माँ वाग्देवी की प्रतिमा के लंदन पहुँचने के इतिहास को समझा था। इस भाग में हम आज़ादी के बाद खड़े हुए नए विवादों और वर्ष २००३ में पुरातत्व विभाग द्वारा निकाले गए उस ऐतिहासिक साझा फॉर्मूले का विश्लेषण करेंगे जिसने दोनों पक्षों को विशेष अधिकार दिए।)
सन १९४७ में भारत की स्वतंत्रता के बाद धार की भोजशाला का कानूनी और प्रशासनिक स्वरूप पूरी तरह बदल गया। रियासतों के भारत संघ में विलय के साथ ही यह ऐतिहासिक परिसर मध्य भारत (बाद में मध्य प्रदेश) सरकार और देश की सर्वोच्च धरोहर संस्था—भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के सीधे नियंत्रण में आ गया। लेकिन इतिहास के पुराने घाव पूरी तरह भरे नहीं थे। आज़ादी के बाद भी स्थानीय हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय इस १३वीं-१५वीं सदी की मिश्रित स्थापत्य संरचना पर अपना-अपना पूर्ण वैधानिक दावा ठोक रहे थे, जिससे कई बार सांप्रदायिक तनाव की स्थितियाँ पैदा हुईं।
आइए इस तीसरे भाग में आज़ादी के बाद के राजनीतिक मोड़ और वर्ष २००३ में तय किए गए उस अनूठे पूजा-नमाज़ फॉर्मूले के इतिहास को सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं।
१. सन १९५१: राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक घोषित होना और शुरुआती व्यवस्था
आज़ादी के तुरंत बाद, केंद्र सरकार ने इस ऐतिहासिक इमारत के स्थापत्य महत्व को देखते हुए एक बड़ा कदम उठाया।
- प्राचीन स्मारक अधिनियम के तहत संरक्षण: सन १९५१ में प्राचीन एवं ऐतिहासिक स्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम (Ancient Monuments Act) के तहत धार की भोजशाला को एक ‘राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक’ (Protected Monument) घोषित कर दिया गया।
- शुरुआती प्रशासनिक नियम: एएसआई के तत्कालीन नियमों के अनुसार, इस परिसर को आम पर्यटकों के लिए एक ऐतिहासिक स्थल के रूप में खोल दिया गया। हालांकि, हिंदुओं को केवल वर्ष में एक बार—वसंत पंचमी (माँ सरस्वती के प्रकट होने का पावन दिन) के अवसर पर ही परिसर के भीतर जाकर भव्य यज्ञ और पूर्ण पूजा-अर्चना करने की अनुमति प्रदान की गई थी। दूसरी ओर, स्थानीय मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार के दिन जुमे की नमाज़ अदा करने की आंशिक व्यवस्था दी गई थी।
२. १९९० का दशक: आंदोलन की धार और बढ़ता सांप्रदायिक तनाव
अयोध्या में राम जन्मभूमि आंदोलन के उभार के साथ ही, १९९० के दशक में धार की भोजशाला को लेकर भी हिंदू संगठनों (विशेषकर हिंदू जागरण मंच और बजरंग दल) ने अपने अभियानों को तेज कर दिया।
- दैनिक पूजा की मांग: हिंदू पक्षकारों का तर्क था कि चूंकि यह मूल रूप से राजा भोज का सरस्वती मंदिर है, इसलिए हिंदुओं को केवल वसंत पंचमी पर ही नहीं, बल्कि हर दिन या कम से कम हर मंगलवार (हनुमान जी और देवी की पूजा का विशेष दिन) को वहाँ पूजा करने का अधिकार मिलना चाहिए।
- कर्फ्यू और प्रतिबंध (१९९७): इस बढ़ती मांग के कारण धार में कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने लगी। सन १९९७ में तत्कालीन राज्य सरकार ने विवाद को टालने के लिए आम हिंदुओं के प्रवेश पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए और वसंत पंचमी को छोड़कर अन्य दिनों में पूजा पर रोक लगा दी। इसके जवाब में हिंदू संगठनों ने धार में बड़े पैमाने पर सत्याग्रह और आंदोलन शुरू कर दिए, जिससे यह मामला मध्य प्रदेश की राजनीति का एक मुख्य केंद्र बन गया।
[ एएसआई (ASI) संरक्षित स्मारक ]
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(१९९० का दशक: दैनिक पूजा बनाम नमाज़ का तनाव)
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[ ७ अप्रैल २००३: एएसआई का ऐतिहासिक आदेश ]
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[ हर मंगलवार: हिंदू पक्ष ] [ हर शुक्रवार: मुस्लिम पक्ष ]
• सूर्योदय से सूर्यास्त तक प्रवेश निःशुल्क। • दोपहर १:०० बजे से ३:०० बजे तक विशेष प्रवेश।
• परिसर के भीतर अक्षत-पुष्प से पूजा। • जुमे की नमाज़ अदा करने की पूर्ण अनुमति।
• वसंत पंचमी पर भव्य वार्षिक यज्ञ। • अन्य दिनों में पर्यटकों के रूप में प्रवेश।
३. ७ अप्रैल २००३: एएसआई (ASI) का वह ऐतिहासिक फॉर्मूला जो कानून बना
वर्ष २००३ में केंद्र और राज्य सरकारों के बीच लंबी बैठकों और स्थानीय प्रशासनिक रिपोर्टों के अध्ययन के बाद, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के महानिदेशक ने 7 अप्रैल 2003 को एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक आदेश जारी किया। इस आदेश के तहत दोनों पक्षों के धार्मिक हितों और कानून-व्यवस्था को संतुलित करने के लिए एक ‘साझा फॉर्मूला’ (Shared Accommodation) तय किया गया, जो पिछले दो दशकों से अधिक समय से वहाँ लागू है:
फॉर्मूले की मुख्य शर्तें:
- हिंदू पक्ष के अधिकार (मंगलवार): हर मंगलवार को सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक सभी हिंदू श्रद्धालुओं को भोजशाला परिसर में निःशुल्क प्रवेश दिया जाएगा। वे परिसर के भीतर माँ सरस्वती के प्राचीन विग्रह स्थल और खंभों के पास अक्षत (चावल), पुष्प (फूल) और जल चढ़ाकर अपनी पारंपरिक पूजा-अर्चना कर सकते हैं। इसके साथ ही, प्रतिवर्ष वसंत पंचमी पर हिंदुओं को सुबह से रात तक अखंड पूजा और हवन-यज्ञ करने का विशेष अधिकार बरकरार रखा गया।
- मुस्लिम पक्ष के अधिकार (शुक्रवार): हर शुक्रवार को दोपहर १:०० बजे से लेकर ३:०० बजे तक (जुमे की नमाज़ के समय) इस परिसर को विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय के लिए आरक्षित किया जाएगा। इस समयावधि में मुस्लिम पक्षकार वहाँ नमाज़ अदा कर सकते हैं।
- आम दिनों की व्यवस्था: सप्ताह के बाकी पाँच दिन (सोमवार, बुधवार, गुरुवार, शनिवार और रविवार) यह परिसर पूरी तरह से भारतीय और विदेशी पर्यटकों के लिए एक ऐतिहासिक स्मारक के रूप में खुला रहेगा, जिसके लिए एएसआई द्वारा तय मामूली प्रवेश शुल्क देना होता है। इस दौरान परिसर के भीतर किसी भी प्रकार की धार्मिक गतिविधि पूरी तरह वर्जित रहती है।
भाग-३ का निष्कर्ष
वर्ष २००३ के इस एएसआई फॉर्मूले ने तात्कालिक रूप से धार में शांति स्थापित कर दी और दोनों समुदायों को अपने-अपने धार्मिक अनुष्ठान करने का एक वैधानिक मंच दे दिया। लेकिन हिंदू पक्षकार इस ‘साझा व्यवस्था’ से पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे। उनका तर्क था कि भगवान की भूमि या विद्या के मंदिर को आंशिक रूप से मस्जिद की तरह इस्तेमाल करने की अनुमति देना ऐतिहासिक और वैधानिक रूप से गलत है। इसी असंतोष के कारण, वर्ष २०२२ में हिंदू संगठनों ने इस व्यवस्था को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में चुनौती दी, जिसने इस पूरे मामले को आधुनिक ९८ दिनों के वैज्ञानिक और एएसआई (ASI) सर्वेक्षण के दौर में पहुँचा दिया।
अगले भाग की ओर:
इस श्रृंखला के भाग-४ में हम चर्चा करेंगे—“हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की याचिका, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का आदेश और वर्ष २०२४ में हुआ एएसआई (ASI) का ९८ दिनों का वैज्ञानिक महा-सर्वे”। हम गहराई से जानेंगे कि कैसे आधुनिक जीपीआर (GPR) और कार्बन डेटिंग तकनीकों के जरिए ज़मीन के कई फीट नीचे खुदाई की गई और कैसे दीवारों पर लगे चूने के पीछे से ‘ओम नमः शिवाय’, ‘काल सर्प यंत्र’ और दर्जनों प्राचीन खंडित हिंदू मूर्तियाँ प्रकट हुईं।