धार की भोजशाला: भाग-२ (खिलजी काल का बर्बर आक्रमण, कमाल मौला का पेंच और लंदन पहुँची वाग्देवी)
(नोट: यह इस विशेष श्रृंखला का दूसरा भाग है। पहले भाग में हमने महाराज भोजदेव परमार द्वारा सन १०३४ ईस्वी में स्थापित ‘सरस्वती सदन’ विश्वविद्यालय के स्वर्णिम वैभव और माँ वाग्देवी की प्रतिमा के इतिहास को समझा था। इस भाग में हम इतिहास के उस सबसे काले कालखंड का विश्लेषण करेंगे, जब इस वैश्विक ज्ञान केंद्र को लहूलुहान कर दिया गया था।)
लगभग ढाई सौ वर्षों तक पूरे आर्यावर्त में शिक्षा और अध्यात्म का प्रकाश फैलाने वाली धार की भोजशाला पर १४वीं शताब्दी की शुरुआत में काल के क्रूर थपेड़े पड़े। दिल्ली की सल्तनत पर जब खिलजी वंश और बाद में मालवा के स्थानीय मुस्लिम सुल्तानों का नियंत्रण हुआ, तो धार का यह गौरवशाली विश्वविद्यालय उनकी मजहबी कट्टरता का मुख्य निशाना बन गया। इस दौर में न केवल प्राचीन ज्ञान को जलाया गया, बल्कि भारत की धरोहरों को सात समंदर पार ले जाने का एक नया ताना-बाना भी बुना गया।
आइए इस दूसरे भाग में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण, मंदिर को मस्जिद का रूप देने के कपटपूर्ण इतिहास और माँ सरस्वती की मूल मूर्ति के लंदन पहुँचने की पूरी कहानी को सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं।
१. सन १३०५ ईस्वी: अलाउद्दीन खिलजी का बर्बर हमला और विद्वानों का कत्लेआम
१४वीं शताब्दी की शुरुआत में दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने मालवा साम्राज्य को हड़पने और हिंदू संस्कृति के प्रतीकों को नष्ट करने के लिए अपने सबसे क्रूर सेनापति ऐन-उल-मुल्क मुल्तानी को एक विशाल सेना के साथ धार भेजा।
- विश्वविद्यालय का विध्वंस: सन १३०५ ईस्वी में खिलजी की सेना ने धार नगरी पर धावा बोल दिया। ‘सरस्वती सदन’ (भोजशाला) की भव्यता और वहां गूँजते संस्कृत श्लोकों को सहन न कर पाने के कारण आक्रांताओं ने पूरे विश्वविद्यालय परिसर को चारों तरफ से घेर लिया।
- १२०० विद्वानों का खूनी बलिदान: ऐतिहासिक और स्थानीय दस्तावेजी साक्ष्यों के अनुसार, खिलजी के सैनिकों ने विश्वविद्यालय के पुस्तकालयों को आग लगा दी। वहां पढ़ रहे और ज्ञान साधना में लीन १२०० से अधिक हिंदू आचार्यों, पंडितों और विद्यार्थियों को बंदी बना लिया गया। जब उन्होंने इस्लाम स्वीकार करने से मना कर दिया, तो उन सभी विद्वानों का बड़ी बेरहमी से कत्लेआम कर दिया गया और उनके शवों को उसी परिसर के भीतर बने एक विशाल यज्ञ कुंड (हवन कुंड) में फेंक दिया गया। इस भयंकर रक्तपात के बाद सदियों पुराना यह ज्ञान केंद्र हमेशा के लिए शांत हो गया।
२. दिलावर खान और महमूद खिलजी द्वारा ‘कमाल मौला मस्जिद’ का निर्माण
अलाउद्दीन खिलजी के हमले के बाद यह परिसर लंबे समय तक खंडहर बना रहा। लेकिन १५वीं शताब्दी की शुरुआत में जब मालवा का स्वतंत्र सुल्तान दिलावर खान गौरी बना, तो उसने काशी और मथुरा की तर्ज पर एक नई स्थापत्य कूटनीति अपनाई।
- कमालुद्दीन चिश्ती का आगमन: औरंगज़ेब और अन्य शासकों की तरह ही, दिलावर खान ने सूफी संत मौलवी कमालुद्दीन चिश्ती (जो कमाल मौला के नाम से जाने जाते थे) के मकबरे और खानकाह के नाम पर इस परिसर को हथियाने की साजिश रची।
- मलबे से मस्जिद का निर्माण (१४०१-१५१४ ईस्वी): दिलावर खान (१४०१ ई.) और बाद में महमूद शाह खिलजी (१५१४ ई.) ने भोजशाला के मूल गर्भगृह को आंशिक रूप से नष्ट कर दिया। उन्होंने चालाकी दिखाते हुए पूरे परिसर को नष्ट नहीं किया, बल्कि भोजशाला के ही ८४ नक्काशीदार हिंदू खंभों, अष्टकोणीय दीवारों और पत्थरों को उलट-पुलट कर उसके ऊपर ‘कमाल मौला मस्जिद’ का ढांचा खड़ा कर दिया। यही कारण है कि आज भी मस्जिद के प्रवेश द्वार और मेहराबों पर संस्कृत के शिलालेख और पारंपरिक हिंदू नक्काशी साफ दिखाई देती है।
[ राजा भोज का भव्य सरस्वती सदन ]
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(सन १३०५: अलाउद्दीन खिलजी द्वारा खूनी हमला)
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(१४०१-१५१४: दिलावर खान और महमूद खिलजी)
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▼ (कमाल मौला मस्जिद का रूप) ▼
• तोड़े गए मंदिर के ८४ नक्काशीदार खंभों का सीधा उपयोग।
• दीवारों पर लगे संस्कृत व्याकरण के शिलालेखों पर चूना पोता।
३. सात समंदर पार: माँ वाग्देवी की मूल प्रतिमा लंदन कैसे पहुँची?
मुगलों और सुल्तानों के बाद जब भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी (अंग्रेजों) का शासन स्थापित हुआ, तो धार की भोजशाला के पुरातात्विक महत्व ने उनका ध्यान खींचा।
- विलियम किनकेड की खुदाई (१८७५): सन १८७५ में धार के तत्कालीन ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट विंडहैम / मेजर विलियम किनकेड ने भोजशाला परिसर के भीतर और उसके आसपास व्यापक खुदाई और सफाई का काम शुरू कराया। इस खुदाई के दौरान मलबे के नीचे दबी हुई राजा भोज कालीन सफेद संगमरमर की वह अद्वितीय और दिव्य माँ वाग्देवी (सरस्वती) की मूल मूर्ति सुरक्षित रूप से प्राप्त हुई।
- तस्करी और ब्रिटिश म्यूजियम: अंग्रेज इस मूर्ति के अद्वितीय सौंदर्य और ऐतिहासिक महत्व को समझ चुके थे। सन १८८६-१९०२ के बीच, ब्रिटिश अधिकारी इस पावन मूर्ति को चोरी-छिपे और चालाकी से भारत से बाहर ले गए। आज माँ सरस्वती की वह मूल ऐतिहासिक प्रतिमा लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम (British Museum, London) की गैलरी में प्रदर्शित है, जिसे वापस भारत लाने के लिए आज भी राजनयिक और कानूनी स्तर पर प्रयास चल रहे हैं।
भाग-२ का निष्कर्ष
खिलजी और लोदी वंश के सुल्तानों ने तलवार के बल पर सरस्वती के इस मंदिर को ‘कमाल मौला मस्जिद’ का नाम तो दे दिया और अंग्रेजों ने इसकी मुख्य देवी की मूर्ति को सात समंदर पार भेज दिया, लेकिन वे ब्रजमंडल और मालवा के हिंदुओं के मन से भोजशाला की पवित्रता को नहीं मिटा सके। आज़ादी के बाद, यह स्थान भारत के पुरातत्व विभाग के नियंत्रण में आया, लेकिन इसके साथ ही स्वतंत्र भारत की अदालतों और राजनीति में अधिकारों की एक ऐसी जंग शुरू हुई, जिसने वर्ष २००३ में ‘मंगलवार और शुक्रवार’ का एक अभूतपूर्व फार्मूला तैयार किया।
अगले भाग की ओर:
इस श्रृंखला के भाग-३ में हम चर्चा करेंगे—“आज़ादी के बाद का धार्मिक तनाव, ‘मंगलवार-शुक्रवार’ का ऐतिहासिक फार्मूला (२००३) और दोनों पक्षों के अधिकार”। हम विस्तार से जानेंगे कि कैसे आज़ादी के बाद हिंदुओं को केवल वसंत पंचमी पर पूजा की अनुमति थी और कैसे वर्ष २००३ में केंद्र व राज्य सरकार ने एक विशेष कानून बनाकर हिंदुओं को हर मंगलवार पूजा और मुस्लिमों को हर शुक्रवार नमाज पढ़ने का अनूठा अधिकार दिया।