धार की भोजशाला: भाग-१ (राजा भोज की ‘सरस्वती कंठाभरण’ और प्राचीन विश्वविद्यालय का गौरव)
“कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तेली…” भारतीय जनमानस में रची-बसी यह कहावत राजा भोज के असीम पराक्रम, विद्वता और उनके न्यायप्रिय शासन को रेखांकित करती है। मध्य प्रदेश का ऐतिहासिक ‘धार’ (प्राचीन नाम धारा नगरी) जिला परमार वंश के इन्हीं प्रतापी राजा भोज की राजधानी था। वर्तमान समय में धार की ‘भोजशाला’ भले ही एक जटिल कानूनी और पुरातात्विक विवाद का केंद्र हो, लेकिन मूल रूप से यह स्थान मध्यकालीन भारत में ज्ञान, वास्तुकला और सनातन संस्कृति का सबसे बड़ा प्रकाश स्तंभ था।
इस नई विशेष श्रृंखला के पहले भाग में हम भोजशाला के उसी प्राचीन स्वर्णिम वैभव, राजा भोज के ऐतिहासिक संकल्प और माँ वाग्देवी (सरस्वती) के इस दिव्य मंदिर के विश्वविद्यालयीय स्वरूप का प्रामाणिक विश्लेषण करेंगे।
१. राजा भोज और धारा नगरी का सांस्कृतिक उत्थान
११वीं शताब्दी (१०१०-१०५५ ईस्वी) में मालवा की गद्दी पर महाराज भोजदेव परमार आसीन हुए। राजा भोज केवल एक महान योद्धा और कुशल रणनीतिकार ही नहीं थे, बल्कि वे स्वयं खगोल विज्ञान, व्याकरण, वास्तुकला (शिल्पशास्त्र), चिकित्सा और साहित्य के प्रकांड विद्वान थे। उन्होंने ‘समरांगण सूत्रधार’ और ‘सरस्वती कंठाभरण’ जैसे दर्जनों अमर ग्रंथों की रचना की थी।
- विद्या की राजधानी: राजा भोज ने धार को अपनी राजधानी बनाया और संकल्प लिया कि वे धारा नगरी को पूरे आर्यावर्त (भारत) में ज्ञान और कला की सबसे श्रेष्ठ नगरी बनाएंगे। उनके दरबार में देश-विदेश के ५०० से अधिक शीर्ष कवि, दार्शनिक और मनीषी (जैसे महाकवि कालिदास द्वितीय, भवभूति और भास्करभट्ट) निवास करते थे।
२. सन १०३४ ईस्वी: ‘सरस्वती सदन’ (भोजशाला) की स्थापना
राजा भोज ने धार के केंद्र में सन १०३४ ईस्वी में एक अत्यंत भव्य और विशाल संस्थान का निर्माण कराया, जिसे मूल रूप से ‘सरस्वती सदन’ या ‘धार की भोजशाला’ के नाम से ख्याति मिली।
नालंदा और तक्षशिला जैसा आवासीय विश्वविद्यालय
यह केवल पूजा करने का एक साधारण मंदिर नहीं था, बल्कि नालंदा और तक्षशिला की तरह एक विश्वप्रसिद्ध आवासीय विश्वविद्यालय (Residential University) था।
- अध्ययन केंद्र: यहाँ देश-विदेश से हजारों विद्यार्थी और शोधकर्ता दर्शन, वेद, व्याकरण, ज्योतिष, खगोल विज्ञान, संगीत, कला और आयुर्वेद का उच्च अध्ययन करने आते थे।
- शिलालेखों पर व्याकरण: इस विश्वविद्यालय की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसकी दीवारों, स्तंभों और फर्श पर पत्थरों को तराशकर संस्कृत व्याकरण की वर्णमाला, प्राकृत भाषा के श्लोक और खगोलीय सूत्र (चार्ट) उत्कीर्ण किए गए थे, ताकि छात्र घूमते-फिरते भी ज्ञान अर्जित कर सकें।
[ महाराज भोज की धारा नगरी ]
│
(सन १०३४ ईस्वी: 'सरस्वती सदन' की स्थापना)
│
▼
[ ज्ञान और कला का वैश्विक केंद्र ]
│
┌─────────────────────┴─────────────────────┐
▼ ▼
[ आवासीय विश्वविद्यालय ] [ माँ वाग्देवी का मंदिर ]
• दर्शन, व्याकरण और खगोल का अध्ययन। • मध्य भाग में माँ सरस्वती की दिव्य मूर्ति।
• दीवारों पर पत्थरों पर खोदे गए श्लोक। • स्फटिक और सफेद संगमरमर का भव्य गर्भगृह।
३. माँ वाग्देवी की दिव्य प्रतिमा और स्थापत्य का वैभव
इस भव्य भोजशाला परिसर के बिल्कुल मध्य भाग में राजा भोज ने ज्ञान और स्वर की देवी माँ वाग्देवी (सरस्वती) की एक अद्वितीय मूर्ति की स्थापना कराई थी।
- संगमरमर की बेजोड़ कला: यह प्रतिमा शुद्ध सफ़ेद संगमरमर (Marble) को तराशकर बनाई गई थी। शिल्पशास्त्र के नियमों के अनुसार बनी यह मूर्ति इतनी जीवंत और सुंदर थी कि इसकी नक्काशी को देखकर समकालीन शिल्पी भी दाँतों तले उँगली दबा लेते थे। मूर्ति के नीचे राजा भोज और उनके मुख्य मूर्तिकार ‘मंथल’ का नाम उत्कीर्ण था।
- अष्टकोणीय और स्तंभित स्थापत्य: पूरी भोजशाला का निर्माण एक विशाल अष्टकोणीय (Octagonal) प्रांगण के रूप में किया गया था। इसमें नक्काशीदार पत्थरों के दर्जनों विशाल खंभे (Pillars) थे, जिनके ऊपर कमल के फूल, मांगलिक कीर्तिमुख और हिंदू देवी-देवताओं की आकृतियाँ उकेरी गई थीं। परिसर के खुले आकाश वाले हिस्से से सूर्य की किरणें सीधे माँ सरस्वती के गर्भगृह को आलोकित करती थीं।
भाग-१ का निष्कर्ष
महाराज भोज द्वारा निर्मित यह ‘सरस्वती सदन’ लगभग ढाई सौ वर्षों तक बिना किसी विघ्न के पूरे भारत को ज्ञान का आलोक बांटता रहा। धार की माटी में श्लोकों की गूँज और माँ वाग्देवी की आराधना अनवरत चलती रही। लेकिन सनातन संस्कृति के इस पावन केंद्र का स्वर्णिम कालखंड १४वीं शताब्दी की शुरुआत में हमेशा के लिए समाप्त हो गया, जब दिल्ली सल्तनत से अलाउद्दीन खिलजी की बर्बर सेना मालवा के गौरव को मिटाने के उद्देश्य से धार की सीमाओं में दाखिल हुई।
अगले भाग की ओर:
इस श्रृंखला के भाग-२ में हम चर्चा करेंगे—“खिलजी काल का बर्बर आक्रमण, भोजशाला का विध्वंस और कमाल मौला का पेंच”। हम विस्तार से जानेंगे कि कैसे सन १३०५ में अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति ऐन-उल-मुल्क मुल्तानी ने इस विश्वविद्यालय को नष्ट किया, १२०० से अधिक हिंदू विद्वानों का कत्लेआम किया, और कैसे बाद के मुस्लिम शासकों ने इसके मलबे से ‘कमाल मौला मस्जिद’ खड़ी की; साथ ही माँ वाग्देवी की मूल मूर्ति आज लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में कैसे पहुँची।