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कुतुब मीनार विवाद: भाग-१ (राजा विक्रमादित्य का काल और ‘विष्णु स्तंभ’ की खगोलीय थ्योरी)

दिल्ली के महरौली में स्थित कुतुब मीनार को दुनिया भर में भारत के एक प्रमुख पर्यटन स्थल और यूनेस्को (UNESCO) की विश्व धरोहर के रूप में जाना जाता है। मुख्यधारा के इतिहास में हमें यही पढ़ाया गया है कि इस ७२.५ मीटर ऊँची मीनार का निर्माण ११९२-९३ ईस्वी में दिल्ली के पहले मुस्लिम सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक ने शुरू कराया था। लेकिन वर्तमान समय में यह परिसर दिल्ली की साकेत कोर्ट और इतिहासकारों के बीच एक गंभीर कानूनी और पुरातात्विक विवाद के केंद्र में है। हिंदू पक्ष और कई शोधकर्ताओं का दृढ़ दावा है कि यह मीनार कोई इस्लामी विजय स्तंभ नहीं, बल्कि गुप्त काल का एक प्राचीन ‘विष्णु स्तंभ’ और खगोलीय वेधशाला (Astronomical Observatory) है।
इस नई विशेष श्रृंखला के पहले भाग में हम कुतुब मीनार के इसी प्राचीन गुप्तकालीन इतिहास, राजा विक्रमादित्य के काल और इसके निर्माण के पीछे छिपे खगोलीय विज्ञान का प्रामाणिक विश्लेषण करेंगे।

१. सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य और ‘विष्णु स्तंभ’ की थ्योरी

हिंदू पक्षकारों और पी. एन. ओक सहित कई स्वतंत्र इतिहासकारों का मानना है कि इस मीनार का निर्माण कुतुबुद्दीन ऐबक से लगभग ७००-८०० वर्ष पूर्व, चौथी या पाँचवीं शताब्दी में गुप्त वंश के महान सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) के शासनकाल में हुआ था।
  • विष्णु ध्वज या विष्णु स्तंभ: सनातन परंपरा में महान विजय या धार्मिक अनुष्ठानों के उपलक्ष्य में ‘ध्वज स्तंभ’ या ‘कीर्ति स्तंभ’ बनाने की सदियों पुरानी परंपरा रही है। हिंदू पक्ष के अनुसार, सम्राट विक्रमादित्य ने भगवान विष्णु के सम्मान में इस अष्टकोणीय और बहुमंजिला स्तंभ का निर्माण कराया था, जिसे ‘विष्णु ध्वज’ या ‘विष्णु स्तंभ’ कहा जाता था।
  • महरौली शब्द का वास्तविक उद्गम: इस मीनार के आस-पास के पूरे क्षेत्र को आज ‘महरौली’ कहा जाता है। इतिहासकारों का दावा है कि महरौली शब्द का मूल रूप ‘मिहिरावली’ था। यह नाम राजा विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक—महान खगोलशास्त्री और गणितज्ञ वराहमिहिर के नाम पर पड़ा था। मिहिरावली का अर्थ होता है ‘मिहिर (वराहमिहिर) की बस्ती या खगोलीय नगरी’।


२. खगोल विज्ञान और २७ नक्षत्रों का वेधशाला कनेक्शन

इस मीनार की बनावट केवल एक स्थापत्य का नमूना नहीं है, बल्कि इसके भीतर प्राचीन भारतीय खगोल विज्ञान (Astronomy) के गहरे सूत्र छिपे हुए हैं। हिंदू पक्षकार अदालत में इसके खगोलीय वेधशाला होने के निम्नलिखित वैज्ञानिक दावे प्रस्तुत करते हैं:

क) २७ कोण और नक्षत्रों का गणित

यदि आप कुतुब मीनार के सबसे निचले हिस्से (Base) की बनावट को ध्यान से देखेंगे, तो इसमें २७ घुमावदार कोने और त्रिकोणीय फलक (Flutings and Angles) बने हुए हैं। हिंदू ज्योतिष शास्त्र और खगोल विज्ञान के अनुसार आकाशमंडल को २७ नक्षत्रों में बांटा गया है। इतिहासकारों का तर्क है कि ये २७ कोने वास्तव में २७ नक्षत्रों का प्रतिनिधित्व करते थे, जहाँ से प्राचीन वैज्ञानिक रात के समय तारों और ग्रहों की गति का अध्ययन करते थे।

ख) सूर्य की छाया और प्रकाश का सिद्धांत

मीनार की बनावट में एक विशेष प्रकार का झुकाव (Tilt) दिया गया है। २१ जून (सर्क संक्रांति – Summer Solstice) के दिन, जब वर्ष का सबसे लंबा दिन होता है, दोपहर के समय इस मीनार की छाया जमीन पर बिल्कुल नहीं पड़ती। यह शुद्ध रूप से एक खगोलीय गणना (Astronomical Alignment) पर आधारित निर्माण है, जो यह साबित करता है कि इसे किसी अनपढ़ आक्रांता ने अचानक नहीं बनवाया, बल्कि इसके पीछे वराहमिहिर जैसे महान खगोलविदों की वैज्ञानिक बुद्धि काम कर रही थी।

ग) मुख्य द्वार का उत्तर मुखी होना

पारंपरिक इस्लामी स्मारकों या मीनारों के द्वार पश्चिम (मक्का की ओर) या दक्षिण की ओर झुके होते हैं। इसके विपरीत, इस मीनार का मुख्य प्रवेश द्वार शुद्ध रूप से उत्तर दिशा (North) की ओर खुलता है। खगोल विज्ञान में ध्रुव तारे (North Star) की स्थिति को देखने और रात्रि वेधशालाओं के लिए उत्तर मुखी द्वार होना अनिवार्य माना जाता है। इसीलिए प्राचीन हिंदू ग्रंथों में इसे ‘ध्रुव स्तंभ’ भी कहा गया है।
                       [ प्राचीन 'विष्णु स्तंभ' / ध्रुव स्तंभ ]
                                          │
                     (चौथी/पाँचवीं शताब्दी: गुप्त काल का निर्माण)
                                          │
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                      [ खगोलीय वेधशाला (Observatory) ]
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  [ २७ नक्षत्रों का गणित ]                                   [ भौगोलिक स्थिति ]
• निचले हिस्से में बने हैं ठीक २७ कोण।                       • उत्तर मुखी द्वार (ध्रुव तारे के अध्ययन हेतु)।
• प्रत्येक कोण एक विशिष्ट नक्षत्र का प्रतीक।                • २१ जून को दोपहर में छाया न बनने की तकनीक।


३. परिसर में मौजूद अद्वितीय ‘लौह स्तंभ’ (Iron Pillar) का अकाट्य साक्ष्य

कुतुब मीनार के ठीक सामने प्रांगण में खड़ा महरौली का लौह स्तंभ इस पूरी थ्योरी का सबसे बड़ा और जीवित भौतिक प्रमाण है।
  • शुद्ध लोहे की तकनीक: ७ मीटर से अधिक ऊँचा यह लोहे का खंभा शुद्ध भारतीय धातुकर्म (Metallurgy) का एक ऐसा चमत्कार है, जिस पर पिछले १६०० वर्षों से खुले आसमान के नीचे रहने के बाद भी आज तक जंग (Rust) नहीं लगा है।
  • राजा चंद्र का शिलालेख: इस लौह स्तंभ पर गुप्त लिपि (संस्कृत) में एक प्राचीन शिलालेख उत्कीर्ण है। इसमें स्पष्ट लिखा है कि इस ‘विष्णु ध्वज’ की स्थापना ‘राजा चंद्र’ (चंद्रगुप्त विक्रमादित्य) ने ‘विष्णुपद पहाड़ी’ पर कराई थी। मुख्यधारा के इतिहासकार भी मानते हैं कि यह खंभा गुप्त काल का ही है। ऐसे में हिंदू पक्ष का यह तार्किक सवाल है कि यदि यह खंभा चौथी सदी का है, तो इसके ठीक बगल में खड़ी इतनी विशाल मीनार अचानक १२वीं सदी में कैसे बन सकती है? वास्तव में, पूरी संरचना एक ही कालखंड की है।


भाग- का निष्कर्ष

कुतुब मीनार के स्थापत्य की गहराई, इसके २७ कोण, उत्तर मुखी द्वार और बगल में खड़ा गुप्तकालीन लौह स्तंभ यह स्पष्ट संकेत देते हैं कि इस परिसर का इतिहास ११९२ ईस्वी से कहीं अधिक प्राचीन है। यह स्थान भारत के खगोलीय गौरव का प्रतीक था। लेकिन १२वीं शताब्दी के अंत में दिल्ली की धरती पर जब मोहम्मद गोरी और उसके सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक का क्रूर कदम पड़ा, तो इस खगोलीय वेधशाला और इसके चारों ओर स्थित भव्य मंदिरों को एक भयंकर विनाश का सामना करना पड़ा।

अगले भाग की ओर:

इस श्रृंखला के भाग-२ में हम चर्चा करेंगे—“२७ हिंदू-जैन मंदिरों का विध्वंस और कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद का सच”। हम एएसआई और स्वयं कुतुबुद्दीन ऐबक के ही लिखे फारसी शिलालेखों के आधार पर जानेंगे कि कैसे महरौली के २७ भव्य मंदिरों को तोपों और हथौड़ों से तोड़ा गया और उनके मलबे से भारत की पहली मस्जिद खड़ी की गई।

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