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अजब समय आया है! जब भी कोई निरंकुश सत्ताधारी दिखता है, इतिहास के पन्नों से एक नाम उछल पड़ता है – हिटलर। लेकिन इस तुलना में भी अब एक ‘आधुनिक विडम्बना’ है। हिटलर के तो चेहरे से नफरत थी, पर हमारे यहाँ तो ‘चेहरों का मेला’ लगा है।

हिटलर ने अपने चेहरे जैसे कई बहरूपिए रखे थे, ताकि भ्रम बना रहे। पर हमारे आज के ‘हिटलर’ को देखिए! वह स्वयं ही इतने चेहरे बदलता है कि शायद उसे भी स्वयं का असली चेहरा याद नहीं होगा। कभी साधु, कभी सेवक, कभी चौकीदार, कभी विश्वगुरु – हर अवसर पर एक नया मुखौटा। हिटलर तो ‘एक-रूप’ था, उसकी क्रूरता मुखौटे की मोहताज नहीं थी। लेकिन हमारे यहाँ तो ‘रूप-बदलने’ में ही उसकी शक्ति निहित है। कौन असली है, कौन नक़ली, यह जनता भी पहचान नहीं पाती।

हिटलर सच में मर्द था, वो जो भी करता था या करवाता था, अपने चेहरे से ही। उसके फरमान उसके मुख से निकलते थे, उसकी सेना उसके नाम पर चलती थी। उसका चेहरा ही उसका ब्रांड था, चाहे वह कितना भी भयानक क्यों न रहा हो। लेकिन हमारा ‘पात्र’ कभी अपने चेहरे का उपयोग सीधे तौर पर नहीं करता है। वह मंच से मीठी बातें करेगा, त्याग का पाठ पढ़ाएगा, और पर्दे के पीछे उसके ‘सिस्टम’ के हथियार अपना काम करेंगे। उसका चेहरा ‘कठोर’ दिखने के बजाय ‘कल्याणकारी’ दिखता है, ताकि जनता भ्रमित रहे। हिटलर का चेहरा ‘डर’ पैदा करता था, हमारे हिटलर का चेहरा ‘विश्वास’ पैदा करता है, ताकि डर बाद में महसूस हो।

हिटलर ने हथियारों को सिस्टम बनाया था, उसकी गेस्टापो, एसएस, उसकी सेना— सब उसकी सीधी आज्ञा मानते थे। उसकी क्रूरता का स्रोत ‘हथियार’ थे। मगर हमारा बहरूपिया सिस्टम को ही हथियार बना देता है। यहाँ बंदूकें नहीं, नियम-कानून, संस्थाएं और न्यायपालिका ही हथियार बन जाते हैं। कभी वो #सुप्रीम_कोर्ट का प्रयोग करता है तो कभी #ED का उपयोग करता है। कभी चुनाव आयोग की गरिमा दांव पर लगती है, कभी मीडिया की आत्मा बिक जाती है। ये सब हिटलर के सीधे हथियारों से भी ज्यादा घातक हैं, क्योंकि ये ‘लोकतंत्र’ का चेहरा ओढ़े हुए हैं, और अंदर से खोखला कर रहे हैं। हिटलर तो खुली जंग लड़ता था, हमारे यहाँ ‘अघोषित आपातकाल’ है, जहाँ वार दिखते नहीं, पर घाव गहरे होते हैं।
हमारे यहां पहले भी एक हिटलर का जन्म हो चुका है, जिसकी छवि आज भी ‘लौह महिला’ की है, उसके सामने की तो बात ही छोड़िए, पीठ पीछे भी कुछ कहने की हिम्मत नहीं थी। जिसने भी ज़रा आवाज़ उठाई, उसे ‘मीसा’ के अंधे कुएँ में धकेल दिया गया। उसके एक इशारे पर अखबारों की बिजली काट दी जाती थी। उसने कभी पिछवाड़े में डंडा नहीं किया, जो किया आगे (#नसबंदी) का ही किया। उसने जो भी कठोरता दिखाई, वह खुलेआम थी, ‘डंडा’ सामने से था, इसलिए जनता ने उसे महसूस किया और बाद में उखाड़ फेंका। आज लोगों में इतनी हिम्मत हो गई है कि उसके पोते को लोग ‘पप्पू’ तक कहते हैं। यह दिखाता है कि उस ‘पुराने हिटलर’ का डर कम से कम पीढ़ी दर पीढ़ी खत्म हुआ है।
लेकिन आज का ‘नया हिटलर’ ज्यादा सूक्ष्म, ज्यादा चालाक है। उसका ‘डंडा’ अदृश्य है, उसका ‘मुखौटा’ मनमोहक है। वह खुद को ‘संत’ बताएगा, जबकि उसका सिस्टम ‘जल्लाद’ का काम करेगा। यह हिटलर से भी अधिक खतरनाक है, क्योंकि यह लोकतंत्र के भीतर से लोकतंत्र को ही खा रहा है, और जनता ‘विकास’ या ‘राष्ट्रवाद’ के नारों में बहरूपिए की पहचान नहीं कर पा रही है।

इतिहास इसे सुधार नहीं, सामाजिक और संवैधानिक विभाजन का औजार कहेगा।

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