जब हम “Promotion of Equality in Higher Education Regulation 2026” की परतों को खोलते हैं, तो इसके भीतर छिपे हुए वे संवैधानिक विरोधाभास स्पष्ट होते हैं, जो न केवल सवर्ण समाज (General Category) के लिए, बल्कि भारत की संपूर्ण मेधा (Merit) के लिए घातक सिद्ध हो सकते हैं।
नीचे इस कानून की विसंगतियों पर एक तार्किक आलेख प्रस्तुत है:
‘इक्विटी’ की आड़ में ‘अन्याय’ — UGC रेगुलेशन 2026 का विश्लेषण
उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता लाने के नाम पर लाया गया यह नया विनियमन, न्याय के बुनियादी सिद्धांतों—’निर्दोषता का अनुमान’ (Presumption of Innocence) और ‘समान अवसर’—पर प्रहार करता दिखाई देता है। इसकी मुख्य कमियाँ और सवर्ण समाज पर इसके प्रभाव निम्नलिखित हैं:
१. व्यक्तिनिष्ठ परिभाषाएँ: ‘अपराध’ का वैधीकरण
इस कानून में “मानवीय गरिमा को ठेस” और “प्रतिकूल व्यवहार” जैसे शब्दों को कानूनी आधार बनाया गया है। कानून की भाषा में ये ‘अपरिभाषित’ (Vague) शब्द हैं।
समस्या: यदि एक सवर्ण छात्र या प्रोफेसर किसी विषय पर अकादमिक बहस करता है और सामने वाला छात्र उसे अपनी ‘गरिमा’ पर चोट मान लेता है, तो बिना किसी भौतिक साक्ष्य के वह सवर्ण छात्र अपराधी घोषित किया जा सकता है। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19) पर अंकुश है।
२. ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ (विपरीत भेदभाव) का खतरा
संविधान का अनुच्छेद 15 भेदभाव को रोकता है, लेकिन यह विनियमन ‘इक्विटी’ के नाम पर एक नया सामाजिक पदानुक्रम (Social Hierarchy) बना रहा है।
खामी: ओबीसी (OBC) श्रेणी को इसमें शामिल करना इसे एससी-एसटी एक्ट से भी अधिक व्यापक बना देता है। इससे सवर्ण छात्र अल्पसंख्यक (Minority) जैसी स्थिति में आ जाएंगे, जिनके पास अपनी सुरक्षा के लिए कोई विधिक ‘कवच’ नहीं होगा।
३. दंड के प्रावधानों में असंतुलन
२०१२ के नियमों में झूठी शिकायत करने वाले के खिलाफ कार्रवाई का जो ‘चेक एंड बैलेंस’ था, उसे हटाना सबसे बड़ी विधिक भूल है।
प्रभाव: यह ‘ब्लैकमेल’ की संस्कृति को बढ़ावा देगा। मेधावी सवर्ण छात्रों को प्रतियोगिता से बाहर करने के लिए झूठे आरोपों का सहारा लिया जाना आसान हो जाएगा। जहाँ ‘दंड का भय’ केवल एक वर्ग के लिए हो, वह समाज ‘समतावादी’ नहीं, ‘दमनकारी’ हो जाता है।
४. ‘इक्विटी स्क्वाड’: शैक्षणिक स्वायत्तता पर प्रहार
कैम्पस में विशेष टीमों (Squads) का गठन विश्वविद्यालयों को ‘पुलिस स्टेट’ में बदल देगा।
खामी: ये टीमें अकादमिक प्रशासन से ऊपर होंगी। इससे सवर्ण प्राध्यापकों में एक मनोवैज्ञानिक भय व्याप्त होगा, जिससे वे निष्पक्ष मूल्यांकन (Grading) या कड़ा अनुशासन लागू करने से बचेंगे, ताकि उन पर किसी विशेष वर्ग के प्रति ‘प्रतिकूल होने’ का ठप्पा न लग जाए।
५. मेधा (Merit) का क्रमिक विलोपन
जब विश्वविद्यालयों में फैसले ‘तर्क’ के बजाय ‘पहचान’ (Identity) से होंगे, तो मेधावी छात्र पलायन करेंगे। यह सवर्ण समाज के उन युवाओं के साथ अन्याय है जो बिना किसी आरक्षण के अपनी योग्यता से स्थान बनाते हैं।
निष्कर्ष: समाधान का मार्ग
समानता का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि एक वर्ग को स्थायी अपराधी मान लिया जाए। सवर्ण समाज के हितों की रक्षा के लिए निम्नलिखित सुधार अनिवार्य हैं:
झूठी शिकायत पर कठोर दंड: न्याय की पवित्रता बनाए रखने के लिए यह पुनः जोड़ा जाए।
वस्तुनिष्ठ साक्ष्य (Objective Evidence): केवल ‘भावना’ या ‘महसूस होने’ के आधार पर प्राथमिकी या निलंबन न हो।
न्यायिक समीक्षा: ‘इक्विटी स्क्वाड’ के निर्णयों को स्वतंत्र अदालतों में चुनौती देने का सरल मार्ग हो।
विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’ को यह कानून “कलेक्टिव गिल्ट” की भावना से प्रेरित लगता है, जो आधुनिक लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। यह न्याय के ‘तराजू’ को एक तरफ झुकाने का प्रयास है।
“न्याय वह है जो सबको सुरक्षा दे, न कि वह जो किसी एक वर्ग को जन्मजात अपराधी घोषित कर दे। क्या आप इस नए कानून को समानता का मार्ग मानते हैं या सामाजिक विभाजन का? अपनी राय साझा करें।”