1769087965994

सवर्ण – अपनी ही ज़मीन पर शरणार्थी?

 

राष्ट्रवाद का झोला टांगे,

मैं सवर्ण बंजारा हूँ,

गैर से यदि बच भी जाऊँ,

अपनों का ही मारा हूँ।

 

शत्रु-भय की आड़ में,

मेरा ही अस्तित्व मिटाया है,

मैं सत्ता के खेल में,

केवल एक चुनावी चारा हूँ।

 

पीड़ा दी थी हाथ ने,

तब हमने ‘कमल’ को सींचा था,

आस्था के ही रक्त से,

हर एक घाव को सींछा था।

 

अब न्याय का पहिया भी,

बिन पड़ताल ही चलता है,

जेल की उन सलाखों तक,

हमें अपनों ने ही खींचा है।

 

दशकों तक की चाकरी,

फिर भी उपेक्षित और बेचारा हूँ,

भक्ति की इस अंधी दौड़ में,

मैं ही सबसे हारा हूँ।

 

मेरी निष्ठा ढाल बनी,

पर चोट मुझी पर होती है,

वोटबैंक की मण्डी में,

मैं सबसे सस्ता नारा हूँ।

 

पुरखों ने स्कूल सजाए,

मंदिर और कॉलेज बनाए,

खेल के मैदान बनाकर,

हमने ही सामर्थ्य जगाए।

 

पर कैसी ये विडम्बना!

आज दौर वो आया है,

उन्हीं की चौखट से आज,

बच्चों को अपने बेदखल पाया है।

 

आज़ादी की खातिर हमने,

गोली खाई, जेल सहे,

जबकि गोरे शासन में अपनी,

तूती के ही बोल रहे।

 

पर अपनों के खातिर,

सब कुछ हमने त्याग दिया,

इज्जत, संपत्ति, कुनबा—

सब देश के नाम किया।

 

क्या इसलिए मालिकाना त्यागा था कि?

कि कल नौकरी से भी निकाले जाएंगे?

आरक्षण की भेंट चढ़ेंगे, या

धाराओं में फंसकर जेलों को जाएंगे?

 

ऊँची शिक्षा दूर हुई अब,

यूजीसी के नए विधानों से,

जैसे बेदखल हुए हों हम,

अपने ही अरमानों से।

 

गुनाह क्या है हमारा? बस ये कि

सवर्ण कुल में जन्मे हैं?

दोयम दर्जे के नागरिक,

अपने ही वतन में हम बने हैं।

 

वो दिन भी अब दूर नहीं,

जब दास हमें कर देंगे ये,

या छीन कर नागरिकता,

शरणार्थी हमें कर देंगे ये।

 

यहूदियों को मिला ‘इजराइल’,

हमें क्या मिल पाएगा?

इतिहास के पन्नों में क्या,

सवर्ण बस नाम रह जाएगा?

 

मौन रहे यदि आज भी हम, तो

इन सवालों से नस्लें जूझेंगी

क्या किया तब अस्तित्व दांव पर था

आने वाली पीढ़ियां हमसे पूछेंगी

 

 

विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

 

About The Author

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *