कुछ वक्त जिन्दगी के,
मैने जिंदगी से चुरा लिए।
वक्त को वक्त से जोड़कर
बुनियाद बना लिए॥
पिरोया है हमने उसे धागे में,
संग वक्त के मैं भी पिरो गया।
झूल गया वक्त मेरे गले,
अपने हर पल का हिसाब लेने।
वो हर पल, पल-पल,
अपने पल को लेने लगा।
या यूँ कहें कि लूटने लगा वक्त,
हर पल को मेरे पल से।
यूं ही गुजरते रहे मेरे वक्त,
पल पल कर मेरे जीवन से॥
जिंदगी में उमंग के सागर होंगे,
तो कभी दर्द की दरिया बहेगी।
गर वक्त से कुछ खुशनुमा पल गिरेंगी,
तो यहाँ महफिलें भी सजेगी।
इनमे कुछ पल नजरों के मिलने के होंगे,
चाहत और रुसवाई की बातें भी होंगी॥
ऐ वक्त जरा सा एहसान कर दे,
एक बार यूं ही ठहर जाना।
उस पल में दिलों के तार छू लूँ,
फिर चाहे तो मेरे सारे पल काल को दे आना॥
अश्विनी राय ‘अरुण’