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अमिट स्मृतियाँ

 

​अलविदा कह कर भला,

क्या चले जाते हैं लोग?

मैंने तो जाना है कि थोड़ी ही सही,

पर यहीं रह जाते हैं लोग।

 

​जैसे रह जाती है सूरज की गर्मी,

जैसे रह जाता है बारिश का पानी।

जैसे रह जाती हैं दूल्हे की बातें,

जैसे रह जाती है दुल्हन की याद सुहानी।

 

​जहाँ उगते थे गन्ने मीठे-मीठे,

जहाँ घूमा करते थे जवाँ मस्ताने।

भूल न पाईं वो गलियाँ जिन्हें,

खंडहर हो गए अब वो गाँव पुराने।

 

​आप कहते हैं कि—

अलविदा कह कर चले जाते हैं लोग?

तन्हाइयों में भी हमारी यादों के,

साये बनकर रह जाते हैं लोग।

 

​वो थोड़ी सी हँसी,

वो आँखों की चमक।

कुछ कुछ प्यारी बातें,

और कुछ बातों की कसक।

 

​जैसे मंदिर की पावन पूजा रह जाती है,

जैसे गूँजते ही रहते हैं गीता के बोल।

वैसे ही इस मन के भीतर कहीं,

रह जाते हैं लोग… अनमोल।

 

 

 

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