वक्त का हिसाब
कुछ लम्हे अपनी ही ज़िंदगी के,
मैंने ज़िंदगी से चुरा लिए।
वक्त को फिर वक्त से जोड़कर,
ख्वाबों के बुनियाद बना लिए।
पिरोया है हमने उन्हें यादों के धागे में,
संग वक्त के मैं भी पिरो गया।
झूल गया वह वक्त मेरे गले हार सा,
अपने हर पल का हिसाब लेने को खड़ा हो गया।
वो हर पल, अब पल-पल—
मुझसे अपने ही पल माँगने लगा।
या यूँ कहें कि लूटने लगा वह बेदर्दी,
मेरे हर पल को, मेरे ही कल से।
यूँ ही गुज़रते रहे मेरे कीमती वक्त,
तिल-तिल कर मेरे इस जीवन से।
ज़िंदगी में कभी उमंग के सागर उठेंगे,
तो कभी दर्द की गहरी दरिया बहेगी।
गर वक्त के दामन से कुछ खुशियाँ गिरेंगी,
तो यहाँ यादों की महफिलें भी सजेंगी।
इनमें कुछ पल नज़रों के मिलने के होंगे,
चाहत और रुसवाई की बातें भी होंगी।
ऐ वक्त! अब ज़रा सा एहसान कर दे,
बस एक बार… यूँ ही ठहर जाना।
उस पल में मैं रूह के तार छू लूँ,
फिर चाहे मेरे सारे पल ‘काल’ को दे आना।