असली वसीयत: वो ‘आवारा’ दोस्त महफ़िल सजी थी, दावत हुई, फिर सब विदा...
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रत्नाकर: दस्यु से महर्षि तक का पथ जिंदगी के बीहड़ में जब, मति...
जिंदगी के टेढ़े-मेढ़े राहों से, एक शाम गुजरती है। उस शाम से सुबहा के...
खिड़की: एक आत्म-साक्षात्कार खिड़की से जब बाहर झांकता हूँ, यादें चुपके से पास...
वक्त का हिसाब कुछ लम्हे अपनी ही ज़िंदगी के, मैंने ज़िंदगी से चुरा...
घर: कर्मों की बुनियाद इक आलीशान घर की ख़ातिर मैंने, न जाने कितनों...
तलाशते अवसर कितने बोझिल थे, वे प्रतीक्षा के क्षण, तुम्हारे इंतज़ार में। मेरे...