भोजशाला: भूत, भविष्य और वर्तमान
भूमिका
भारतीय इतिहास केवल राजाओं के उत्थान और पतन की कहानी नहीं है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक चेतना, ज्ञान-परंपरा और स्थापत्य कला के जीवंत प्रतीकों के संघर्ष की गाथा भी है। मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ‘भोजशाला’ ऐसा ही एक पावन और ऐतिहासिक प्रतीक है, जो सदियों से ज्ञान की अधिष्ठात्री माँ वाग्देवी (सरस्वती) की आराधना, भारतीय वास्तुकला के गौरव और विदेशी आक्रांताओं के क्रूर मजहबी कुचक्र का गवाह रहा है। हाल ही में इंदौर हाई कोर्ट द्वारा भोजशाला परिसर के वैज्ञानिक सर्वेक्षण (ASI Survey) को लेकर जो ऐतिहासिक फैसला सुनाया गया, उसे अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मामले के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा सांस्कृतिक व कानूनी निर्णय माना जा रहा है। कोर्ट ने हिंदू पक्ष के इस सनातन तर्क को स्वीकार किया कि यह संपूर्ण परिसर मूल रूप से परमार वंश के प्रतापी राजा भोज द्वारा निर्मित माँ सरस्वती का भव्य मंदिर और एक महान संस्कृत शिक्षा केंद्र था। यह आलेख भोजशाला के संपूर्ण वाङ्मय, इसके गौरवशाली अतीत, विवादों के वर्तमान और इसके भविष्य की संभावनाओं का एक गहन और निष्पक्ष विश्लेषण है।
भूतकाल: राजा भोज का स्वप्न और वाङ्मय का स्वर्णिम काल
भोजशाला के वैभव को समझने के लिए हमें ११वीं शताब्दी के भारत में जाना होगा, जब मालवा की धरती पर परमार राजवंश के महान शासक राजा भोज (१०१०-१०५५ ईस्वी) का शासन था। राजा भोज केवल एक पराक्रमी योद्धा और कुशल प्रशासक ही नहीं थे, बल्कि वे स्वयं एक प्रकांड विद्वान, कवि, दार्शनिक और कला-साहित्य के महान संरक्षक थे। उन्होंने चिकित्सा, खगोल विज्ञान, वास्तुकला, व्याकरण और धर्मशास्त्र पर ‘समरांगण सूत्रधार’, ‘सरस्वती कंठाभरण’ और ‘आयुर्वेद सर्वस्व’ जैसे ८० से अधिक कालजयी ग्रंथों की रचना की थी।
ज्ञान का वैश्विक केंद्र (संस्कृत विश्वविद्यालय):
सृजन और ज्ञान के इसी अनुष्ठान के अंतर्गत राजा भोज ने सन् १०३४ ईस्वी में धार (तत्कालीन धारा नगरी) में एक भव्य स्थापत्य का निर्माण कराया। यह स्थान ‘भोजशाला’ कहलाया। यह केवल एक मंदिर नहीं था, बल्कि मध्यकालीन भारत का सबसे बड़ा और प्रतिष्ठित ‘संस्कृत विश्वविद्यालय’ था। यहाँ देश-विदेश से सुदूर क्षेत्रों के विद्यार्थी, आचार्य और दार्शनिक व्याकरण, वेद, उपनिषद, संगीत और खगोलशास्त्र के अध्ययन के लिए आते थे।
माँ वाग्देवी की प्रतिमा और स्थापत्य:
भोजशाला के केंद्र में ज्ञान की देवी माँ सरस्वती (वाग्देवी) की एक अत्यंत कलात्मक और अलौकिक पाषाण प्रतिमा स्थापित की गई थी। इस परिसर के स्तंभों, झरोखों और पत्थरों पर संस्कृत व्याकरण के सूत्र, प्राकृत भाषा के काव्य, और विभिन्न खगोलीय गणनाएँ उकेरी गई थीं, जो आज भी खंडित अवस्था में देखी जा सकती हैं। यहाँ का प्रत्येक पत्थर शिक्षा और सनातन दर्शन का साक्षात वाङ्मय था।
आक्रांताओं का प्रहार और अंधकार का युग
१३वीं शताब्दी के आते-आते भारत पर इस्लामी आक्रांताओं के हमलों की बाढ़ आ गई। मालवा का यह ज्ञान-केंद्र और सांस्कृतिक गौरव भी इन बर्बर आक्रमणों से अछूता नहीं रह सका।
अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण (१३०५ ईस्वी): मालवा पर खिलजी के सेनापति ऐन-उल-मुल्क ने हमला किया। उसने धारा नगरी को लूटा और भोजशाला के वैभव को भारी क्षति पहुँचाई। संस्कृत केंद्र को बंद कर दिया गया और इसके कई हिस्सों को नष्ट करने का प्रयास किया गया।
दिलावर खान और महमूद खिलजी का दौर: १४वीं और १५वीं शताब्दी के दौरान, धार के मुस्लिम शासकों ने भोजशाला परिसर के भीतर ही हेर-फेर करना शुरू कर दिया। मंदिर के स्तंभों को हटाकर या उन्हें ढंककर वहाँ मस्जिद का स्वरूप देने का प्रयास किया गया, जिसे बाद में ‘कमाल मौला की मस्जिद’ कहा जाने लगा।
माँ वाग्देवी का निर्वासन: इस बर्बरता के दौर में माँ वाग्देवी की मूल प्रतिमा को मंदिर से हटा दिया गया। अंग्रेजी शासनकाल में मेजर बेयर्न द्वारा इस ऐतिहासिक और चमत्कारी प्रतिमा को लंदन ले जाया गया, जो आज भी ‘ब्रिटिश म्यूजियम’ में भारत की सांस्कृतिक परतंत्रता की कहानी बयां कर रही है।
वर्तमान काल: कानूनी संघर्ष और इंदौर हाई कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय
स्वतंत्रता के बाद, भोजशाला का मुद्दा एक बड़े सांप्रदायिक और कानूनी विवाद में बदल गया। वर्ष २००३ में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने एक अंतरिम व्यवस्था बनाई, जिसके तहत हिंदुओं को प्रत्येक मंगलवार को भोजशाला में पूजा-अर्चना और वसंत पंचमी पर माँ सरस्वती के यज्ञ की अनुमति मिली, जबकि मुस्लिमों को प्रत्येक शुक्रवार को वहाँ नमाज़ अदा करने की इजाजत दी गई। लेकिन यह व्यवस्था एक स्थायी समाधान नहीं थी, क्योंकि पूरा परिसर चीख-चीख कर अपनी सनातनी पहचान की गवाही दे रहा था।
इंदौर हाई कोर्ट का युगांतकारी फैसला:
वर्तमान परिदृश्य में इंदौर हाई कोर्ट का फैसला मील का पत्थर साबित हुआ है। कोर्ट ने हिंदू पक्ष की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए इस बात को रेखांकित किया कि किसी भी ऐतिहासिक परिसर के वास्तविक चरित्र को समझे बिना न्याय नहीं किया जा सकता।
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:
१. हिंदू पक्ष के तर्कों में दम: कोर्ट ने माना कि परिसर की बनावट, स्तंभों पर उकेरे गए संस्कृत श्लोक, देवी-देवताओं के खंडित चिह्न और ऐतिहासिक दस्तावेज इस बात की ओर ठोस इशारा करते हैं कि यह राजा भोज निर्मित माँ सरस्वती का मंदिर और संस्कृत पाठशाला थी।
२. वैज्ञानिक सर्वेक्षण (ASI Survey) का आदेश: कोर्ट ने ज्ञानवापी और अयोध्या की तर्ज पर भोजशाला का आधुनिक तकनीकों (जैसे GPR यानी ग्राउंड पेनिट्रेटिंग राडार, कार्बन डेटिंग) के माध्यम से वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराने का आदेश दिया। इस सर्वेक्षण का उद्देश्य पत्थरों के नीचे दबे सनातन इतिहास को विज्ञान की कसौटी पर कसना है।
यह निर्णय इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह देश को ‘भेड़चाल’ या तुष्टिकरण की राजनीति से ऊपर उठकर ऐतिहासिक तथ्यों और वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर सत्य को स्वीकार करने की दिशा में आगे बढ़ाता है।
भोजशाला का संपूर्ण वाङ्मय: पत्थरों पर लिखा इतिहास
यदि हम भोजशाला की दीवारों और स्तंभों का बारीकी से अध्ययन करें, तो हमें पता चलेगा कि यहाँ का ‘वाङ्मय’ (साहित्यिक धरोहर) कितना समृद्ध था:
प्राकृत काव्य के शिलालेख: भोजशाला की दीवारों पर परमार कालीन राजाओं द्वारा रचित प्राकृत भाषा के नाटकों और काव्यों के अंश उत्कीर्ण हैं। इनमें अर्जुनवर्मन द्वारा रचित ‘पारिजात मंजरी’ नाटक के अंश विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
संस्कृत व्याकरण के सूत्र: यहाँ के पत्थरों पर ‘कूर्मशतक’ (भगवान विष्णु के कूर्म अवतार की स्तुति) और संस्कृत व्याकरण के नियम खुरचकर लिखे गए थे, ताकि विद्यार्थी टहलते हुए भी ज्ञानार्जन कर सकें।
स्थापत्य का दर्शन: यह वास्तुकला के ‘धार शैली’ का अद्भुत उदाहरण है, जहाँ खंभों की नक्काशी और छतों का निर्माण इस प्रकार किया गया था कि ध्वनि तरंगें (मंत्रोच्चार) पूरे परिसर में गूंज सकें। यह वैज्ञानिक और आध्यात्मिक चेतना का अनूठा संगम था।
भविष्य की राह: सांस्कृतिक पुनरुत्थान और चुनौतियाँ
इंदौर हाई कोर्ट के इस निर्णय के बाद भोजशाला का ‘भविष्य’ एक नई करवट ले रहा है। वैज्ञानिक सर्वेक्षण के जो परिणाम सामने आ रहे हैं या आएंगे, वे इस स्थान की सनातनी और ऐतिहासिक पहचान पर कानूनी और अकादमिक मुहर लगा देंगे।
संभावित भविष्य की रूपरेखा:
१. पूर्ण अधिकार और भव्य मंदिर का निर्माण: राम मंदिर के निर्णय की तरह ही, भविष्य में जब अकाट्य वैज्ञानिक प्रमाण अदालत के सामने होंगे, तब भोजशाला को एक पूर्णकालिक हिंदू मंदिर और राष्ट्रीय स्मारक घोषित किए जाने की प्रबल संभावना है।
२. माँ वाग्देवी की घर वापसी: जिस प्रकार भारत सरकार वैश्विक स्तर पर भारत की चोरी हुई मूर्तियों और कलाकृतियों को वापस ला रही है, भोजशाला के विधिक समाधान के बाद लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम से माँ वाग्देवी की मूल प्रतिमा को लाकर पुनः धार में स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त होगा।
३. ज्ञान और शोध के केंद्र के रूप में पुनरुद्धार: भविष्य की योजना केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं होनी चाहिए। भोजशाला को पुनः एक वैश्विक ‘संस्कृत और शोध विश्वविद्यालय’ के रूप में विकसित किया जाना चाहिए, जहाँ राजा भोज की ज्ञान-परंपरा को पुनर्जीवित किया जा सके।
चुनौतियाँ और सामाजिक समरसता:
निसंदेह, इस प्रक्रिया में कुछ राजनीतिक दल या विघटनकारी ताकतें समाज में ‘पूर्वाग्रह’ और ‘वैमनस्य’ फैलाने का प्रयास करेंगी (जैसा कि हमने इतिहास में हमेशा देखा है)। परंतु, जैसा कि हमारी दार्शनिक चेतना कहती है—”समय की धारा में बड़े-बड़े पत्थर भी चूर हो जाते हैं, केवल सत्य ही शाश्वत रहता है।” देश के प्रबुद्ध नागरिकों और कानून व्यवस्था को यह सुनिश्चित करना होगा कि इतिहास की इस ऐतिहासिक भूल का सुधार पूरी शालीनता, विधिक प्रक्रिया और सामाजिक सद्भाव के साथ हो।
निष्कर्ष
“भोजशाला: भूत, भविष्य और वर्तमान” केवल एक विवादित परिसर की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारत के ‘स्व’ (Self) की खोज है। यह हमारे उस गौरव की पुनर्स्थापना है जिसे विदेशी आक्रांताओं की तलवारों ने काटने और मिटाने की कोशिश की थी। राजा भोज की यह पावन धरा चीख-चीख कर कह रही है कि अन्याय और झूठ की इमारतें चाहे जितनी भी ऊंची चुन ली जाएं, सत्य की नींव को हिलाया नहीं जा सकता।
इंदौर हाई कोर्ट का यह ऐतिहासिक फैसला इस बात का प्रमाण है कि भारत अब अपनी सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौट रहा है। यह समय ‘परिवर्तन’ का है, जहाँ पाखंड और छल परास्त होंगे और ज्ञान की अधिष्ठात्री माँ वाग्देवी के आँगन में पुनः वेदों और संस्कृत के श्लोकों की गूँज सुनाई देगी। समय का शंखनाद स्पष्ट है—परिवर्तन आने वाला है, और न्याय का सूरज उदय होने वाला है।