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रत्नाकर: दस्यु से महर्षि तक का पथ

 

जिंदगी के बीहड़ में जब, मति भ्रमित हो जाती है,

तब चेतना नारद बनकर, पथ दिखाने आती है।

अश्वनी की कलम से उपजी, यह कथा पुरानी है,

एक डाकू के वाल्मीकि, बनने की कहानी है।

 

१. संवाद और साक्षात्कार

बीहड़ की उन पगडंडियों पर, रत्नाकर खड़ा था,

हाथों में तीर-कमान लिए, अभिमान में बड़ा था।

देखा एक वीणाधारी को, जो निर्भय चला आता है,

बोला—”ठहरो ब्राह्मण! कर बिना, कोई किधर जाता है?”

 

मैं हूँ ‘डर’ का पर्याय यहाँ, रत्नाकर मेरा नाम है,

लूट लूँ मैं त्रिलोक को, यही मेरा काम है।

नारद मुस्काए और बोले—”मैं तो निर्धन नारद हूँ,

मगर मैं निर्भय हूँ रत्नाकर! क्या तुम भी निर्भय हो?”

 

२. तर्क और प्रतिशोध

रत्नाकर की आँखें दहकीं, क्रोध का ज्वार उठा,

“मुझसे डरती दुनिया सारी, तुम कहते हो मैं हूँ डरा?”

नारद बोले—”जो निर्भय है, वह छिपकर क्यों रहता है?

राजा, प्रजा या पापों से, तू क्यों इतना डरता है?”

 

गर्जा डाकू—”नारद सुनो! मैं राज्य-द्रोही, प्रतिशोधी हूँ,

हाँ, मैं इस क्रूर व्यवस्था का, सबसे बड़ा विरोधी हूँ।

पाप और पुण्य की परिभाषा, ताकतवर ही गढ़ते हैं,

कमजोरों के कंधों पर, अपनी ईंटें जड़ते हैं।”

 

“मैं सैनिक था, मैंने अपनों का, वीभत्स अंत देखा है,

सौदागरों के कपट और, राजा का षड्यंत्र देखा है।

अबलाओं पर पशुवत हमले, जब मैं रोक न पाया था,

तब अपनों को मारकर ही, मैं बागी कहलाया था।”

 

३. सत्य का प्रहार

नारद बोले—”दूसरों का पाप, तेरा पुण्य नहीं हो सकता,

परछाईं काली हो तो क्या, सूरज काला हो सकता?

जाओ पूछो उनसे, जिनके लिए तू पाप ये करता है,

क्या वे भी इस काल-चक्र के, विष का पान करते हैं?”

 

रत्नाकर ने नारद बांधे, मानो अपनी तकदीर बांधी,

मन में उठा बवंडर भारी, हृदय में उठी थी आँधी।

पहुँचा घर और रत्नावली से, सीधे उसने सवाल किया,

“मेरे इस पाप-कर्म में क्या, तुमने हाथ बँटा लिया?”

 

४. महाप्रयाण और हृदय परिवर्तन

पत्नी बोली—”स्वामी! मैं तो सुख-दुख की अनुगामी हूँ,

पर पाप का बोझ न बाँटूंगी, मैं सत्य की ही स्वामी हूँ।”

पिता ने कहा—”कमाई तेरी, तू ही इसका उत्तरदायी,”

रत्नाकर के पैरों तले, जमीन भी जैसे खिसक आई।

 

टूट गया वो दंभ आज, जो पर्वत जैसा ऊँचा था,

पाया खुद को महा-अकेला, जो कल तक सबका था।

दौड़ा वन की ओर और, देवर्षि के चरणों में गिरा,

“रक्षा करो हे महामुनि! मैं अंधियारे में हूँ घिरा।”

 

५. नव-सृजन

नारद बोले—”रत्नाकर उठ! तू ही अपना मीत है,

भूतकाल जो बीत गया, वह केवल एक अतीत है।

छोड़ पुराने जग को अब, नए विश्व की रचना कर,

मरा-मरा को राम बना दे, तू अपना भविष्य गढ़।”

 

वही डाकू रत्नाकर फिर, ‘वाल्मीकि’ महान बना,

रामकथा का अमर शिल्पी, रामायण का गान बना।

असीम संभावनाओं का स्वामी, जब खुद को पहचानता है,

एक दस्यु भी तब ‘आदि-कवि’, की उपाधि जान लेता है।

 

 

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