कुरुक्षेत्र: अंतर्द्वंद्व का महासमर
गांधारी गम के सागर में डूबी,
अपने ममता के निर्झर को,
अपनों के ही रक्त में ढूँढती,
हाहाकार कर चीख उठी…
वह चीत्कार…
लगा जैसे मेरे ही कंठ से उपजा हो,
लगा जैसे आज हर कोई,
कुरुक्षेत्र की उसी तप्त धरा पर खड़ा,
प्रतिशोध की अग्नि में जल रहा हो।
वह बोली—
‘हे कृष्ण!
यदि मेरे तपोबल में लेशमात्र भी सत्य है,
यदि मैंने कोई भी धर्म-कार्य किया है,
तो सुनो! मैं तुम्हें शाप देती हूँ…
जैसे धर्मक्षेत्र में भाइयों ने भाइयों को मारा है,
वैसे ही तुम्हारा वंश भी एक-दूसरे को फाड़ खाएगा,
और तुम स्वयं… अपने कुल का विनाश देख,
किसी पशु की भाँति अंत को प्राप्त होगे।’
कृष्ण मौन थे… प्रभु थे, ईश्वर थे,
मगर गांधारी की ममता के आगे निरुत्तर थे।
तभी कृष्ण-द्वैपायन व्यास प्रकट हुए,
पूछा— ‘यह तुमने क्या किया गांधारी?’
शब्द उनके गांधारी के लिए थे,
पर लगा जैसे वे मुझे झकझोर रहे हों।
जिन्हें वरुण की सौ आँखें देख नहीं पातीं,
जिन्हें इंद्र की सहस्र आँखें पहचान नहीं पातीं,
उन्हें इन दो चर्म-चक्षुओं से जग कैसे देख पाता?
उस कृष्ण को तो व्यास और संजय की,
दिव्य-दृष्टि ही साक्षात देख पा रही थी।
व्यास बोले— ‘सुनो धृतराष्ट्र! सुनो गांधारी!
अठारह दिनों के इस भीषण महासंग्राम में,
कोई और नहीं… केवल कृष्ण मरा है,
हर बार… बार-बार… केवल कृष्ण!
रणभूमि में जब-जब कोई सैनिक,
लहूलुहान होकर धराशायी हुआ,
वह कोई और नहीं… कृष्ण ही था।
कुरुक्षेत्र की माटी में जो रक्त बहा है,
वह किसी योद्धा का नहीं… कृष्ण का था।
मरने वाला भी वही, मारने वाला भी वही,
गांधारी! यहाँ कृष्ण के अतिरिक्त कुछ और नहीं।’
गांधारी ने तो आँखों पर पट्टी बाँध रखी थी,
अज्ञान की… अंधकार की… अविद्या की!
पर क्या केवल गांधारी ही?
धृतराष्ट्र, दुर्योधन और दुशासन ने भी,
आँखें होते हुए भी विवेक पर पट्टी लगा रखी थी।
आज का यथार्थ भी तो यही है!
मैं, तुम और हम सब…
स्वार्थ और मोह की पट्टी लगाए खड़े हैं।
तब कौन उतारता वो पट्टी?
और आज कौन उतारेगा यह पट्टी?
कौन रचता है यह युद्ध?
कौन गढ़ता है अपना-अपना संसार?
मैं स्वयं… या कोई और?
अपने सुख और दुखों का रचयिता कौन?
प्रश्न करो… उत्तर अंतस से ही मिलेंगे,
क्योंकि प्रश्न के गर्भ में ही उत्तर का वास है।
हे कृष्ण! अब मैं जान गया हूँ,
सत्य एक है… जिसे बुद्धिमान जन,
अपनी-अपनी प्रज्ञा से अलग-अलग कहते हैं।
आज मैंने इसे देखा भी और जाना भी।
अपनी भूमिका में हर कोई श्रेष्ठ है,
पर फिर भी एक सूक्ष्म अंतर तो है…
मैं सिर्फ सत्य को ‘दोहरा’ रहा हूँ,
मुझसे बेहतर लोग सत्य को ‘जी’ रहे हैं।
आपने कहा था— ‘अश्विनी! कला जीवन की पुस्तक है,’
और जीवन उदाहरण माँगता है।
हे भगवन! अब मैंने उस पुस्तक के पन्ने पलटना,
और उन उदाहरणों को जीना शुरू कर दिया है।