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शीर्षक: मेरा घर कहाँ है?

 

बचपन की देहरी पर खड़ी, जब माँ से वो पूछती थी,

“माँ, क्या ये रंग कमरों की दीवारों पर सजा लूँ?”

माँ मुस्कुराकर कहती— “पगली, यहाँ तो तू मेहमान है,

अपने घर जाना, तो जी भरकर अपने अरमान सजाना।”

 

जब सहेलियों संग अल्हड़पन में झूमना चाहती थी,

जब मनपसंद लिबास में खुद को निहारना चाहती थी,

हर बार एक ही उत्तर मिला— “थोड़ा संयम रख बिटिया,

अपने घर जाना, तो जो जी में आए वो पहनना, जहाँ मन हो घूमना।”

 

बेटी मान गई… उस ‘अपने घर’ का एक सपना बुन लिया,

विवाह की अग्नि के फेरों में, एक नया संसार चुन लिया।

पहुँची ससुराल, तो दीवारों ने जैसे कान खड़े कर लिए,

मर्यादा और एडजस्टमेंट के कड़े पहरे लगा दिए।

 

ज़रा सा चहकी, तो सास ने धीरे से कान में कहा—

“बहू, ये तुम्हारे माँ का घर नहीं, यहाँ मनमानी नहीं चलती,

ये ससुराल है, यहाँ घर की रीत से ही घर की गृहस्थी पलती।”

 

कभी तकरार हुई, तो हमसफ़र के स्वर भी बदल गए,

जिसने संग चलने की कसमें खाई थीं, उसके लहजे निकल गए—

“मर्यादा में रहो, ये मेरा घर है, तुम्हारे पिता की जागीर नहीं,

यहाँ वही होगा जो मैं चाहूँगा, तुम्हारी कोई तक़दीर नहीं।”

 

अब वो खड़ी है बीच चौराहे पर, मौन खामोशी लिए,

आँखों में बीते कल और आज की नमी लिए।

एक घर ने ‘पराया’ कहकर विदा कर दिया,

दूजे ने ‘बाहर की’ कहकर पराया कर दिया।

 

मैं अश्विनी, बस यही सोचकर ठिठक जाता हूँ,

अस्तित्व की इस लड़ाई में, ख़ुद से ही हार जाता हूँ।

जिसके बिना कोई घर, ‘घर’ नहीं बन पाता,

आखिर उसका अपना घर, दुनिया के नक्शे में क्यों नहीं मिल पाता?

 

कहाँ है वो घर… जहाँ वो ‘मैं’ बन सके?

जहाँ दीवारों से उसे अपनी पहचान मिल सके?

जनम दिया जहाँ, वो ‘बाबुल का घर’ हो गया,

ब्याह कर आई जहाँ, वो ‘पति का घर’ हो गया।

 

ईंट-पत्थरों के इस खेल में, एक बात अधूरी है,

स्त्री के लिए क्या ‘अपना घर’ होना सिर्फ एक मजबूरी है?

 

 

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