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ज्ञानवापी: पौराणिक सत्य, छह वापियों का इतिहास और आक्रांताओं के नामकरण का षड्यंत्र

लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’
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​भूमिका: विसंगति और इतिहास का सबसे बड़ा प्रश्न

​सनातन धर्म के अठारह पुराण, जो न जाने कितनी सदियों पहले लिखे गए, वे एक स्वर में उद्घोष करते हैं कि ‘ज्ञानवापी’ साक्षात देवाधिदेव महादेव का ही जलीय स्वरूप है। परंतु आज आधुनिक विमर्श और समाचारों में जब हम ‘ज्ञानवापी मस्जिद’ जैसा विरोधाभासी नाम सुनते हैं, तो मन में एक तीव्र वैचारिक उद्वेलन और प्रश्न चिन्ह खड़ा होता है। जो नाम विशुद्ध संस्कृत का है, जिसका उल्लेख सनातन के आदि-ग्रंथों में है, वह किसी इस्लामिक इबादतगाह का नाम कैसे हो सकता है? क्या संसार के किसी अन्य कोने में किसी मस्जिद का नाम संस्कृत भाषा में है? कदापि नहीं। वास्तव में, यह नामकरण कोई सामान्य घटना नहीं, बल्कि विदेशी मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा भारत की सांस्कृतिक अस्मिता को मिटाने और सत्य को दबाने के कुत्सित प्रयास का जीवंत दस्तावेज़ है।

 

पौराणिक उत्पत्ति: महादेव का त्रिशूल और आदिज्ञान

​पुराणों के अनुसार, ज्ञानवापी की उत्पत्ति उस कालखंड में हुई थी जब इस धरा पर पतित-पावनी गंगा का अवतरण नहीं हुआ था। उस समय संसार के जीव-जंतु और मनुष्य जल की एक-एक बूंद के लिए तरस रहे थे। तब स्वयं भगवान शिव ने इस सृष्टि के कल्याणार्थ और अपने अभिषेक के लिए पृथ्वी पर तीव्र प्रहार करते हुए अपना दिव्य त्रिशूल चलाया, जिससे वहां से एक पवित्र जलधारा फूट पड़ी।

​इसी पावन स्थल पर भगवान शिव ने माता पार्वती को ‘आदिज्ञान’ (परम तत्त्व का ज्ञान) प्रदान किया था। ज्ञान की इस दिव्य वार्ता और त्रिशूल से उत्पन्न जल के कारण ही इसका नाम ‘ज्ञानवापी’ पड़ा और जहाँ से वह पवित्र जल निकला, उसे ‘ज्ञानवापी कुंड’ कहा गया। वापी का सीधा और सरल अर्थ होता है—तालाब या बावड़ी। अतः ज्ञानवापी का संपूर्ण और गूढ़ अर्थ है—’ज्ञान का तालाब’।

 

​काशी की छह ऐतिहासिक वापियाँ: पौराणिक भूगोल

​सनातन वाङ्मय और विशेषकर पुराणों में काशी नगरी के भीतर स्थित छह अत्यंत पवित्र वापियों (बावड़ियों) का विस्तृत उल्लेख मिलता है, जो काशी के धार्मिक भूगोल को परिभाषित करती हैं:

ज्येष्ठा वापी: इसके विषय में पौराणिक मान्यता है कि यह काशीपुरा मोहल्ले में स्थित थी, जो कालचक्र के प्रभाव और मानवीय उपेक्षा के कारण अब लुप्त हो चुकी है।

​ज्ञानवापी: यह आदि-वापी साक्षात बाबा काशी विश्वनाथ मंदिर के ठीक उत्तर भाग में आज भी प्रत्यक्ष रूप से विद्यमान है, जो आक्रांताओं के विध्वंस की गवाह है।

​कर्कोटक वापी: यह वापी आज भी काशी में ‘नागकुआं’ के नाम से अत्यंत प्रसिद्ध है, जहाँ नागपंचमी के अवसर पर भारी मेला लगता है और कालसर्प दोष की शांति की जाती है।

भद्रवापी: यह प्राचीन वापी काशी के भद्रकूप मोहल्ले में आज भी सुरक्षित और पूजनीय है।

शंखचूड़ा वापी: इतिहास के उतार-चढ़ाव में यह पवित्र वापी भी वर्तमान में लुप्त हो चुकी है।

​सिद्ध वापी: यह वापी काशी के बाबू बाजार क्षेत्र में स्थित थी, जो समय के साथ अब लुप्तप्राय हो गई है।

 

​पुराणों के अकाट्य साक्ष्य और श्लोक

​अठारह महापुराणों में से एक ‘लिंग पुराण’ में आदि विश्वेश्वर मंदिर की भौगोलिक स्थिति और इस वापी की महत्ता को स्पष्ट करते हुए कहा गया है:

​”देवस्य दक्षिणी भागे वापी तिष्ठति शोभना।

तस्यात वोदकं पीत्वा पुनर्जन्म ना विद्यते।”

​अर्थात: प्राचीन आदि-विश्वेश्वर मंदिर के दक्षिण भाग में जो अत्यंत सुशोभित वापी (ज्ञानवापी) स्थित है, उसका पवित्र जल पीने मात्र से मनुष्य को जन्म-मरण के बंधन से सदा के लिए मुक्ति मिल जाती है।

​इसी प्रकार, ‘स्कंद पुराण’ के काशी खंड में इस वापी के जल के आध्यात्मिक प्रभाव का वर्णन करते हुए कहा गया है:

उपास्य संध्यां ज्ञानोदे यत्पापं काल लोपजं।

क्षणेन तद्पाकृत्य ज्ञानवान जायते नरः।

​अर्थात: इस ज्ञानरूपी वापी के जल से संध्यावंदन करने का अत्यंत महान फल है। इसके स्पर्श और आचमन से मनुष्य के काल-लोप जनित समस्त पाप क्षण भर में नष्ट हो जाते हैं और वह परम ज्ञान को प्राप्त करता है।

​’स्कंद पुराण’ में ही आगे इस वापी को सीधे शिव का विग्रह बताते हुए लिखा गया है:

योष्टमूर्तिर्महादेवः पुराणे परिपठ्यते।

तस्यैषांबुमयी मूर्तिर्ज्ञानदा ज्ञानवापिका।

​अर्थात: पुराणों में भगवान महादेव की जिन ‘अष्टमूर्तियों’ (आठ स्वरूपों) का सांगोपाङ्ग वर्णन मिलता है, उनमें से शिव की जो ‘अम्बुमयी’ (जलरूपी) मूर्ति है, वही साक्षात ज्ञान देने वाली ‘ज्ञानवापिका’ यानी ज्ञानवापी है।

 

अविमुक्त काशी और आदिलिंग का इतिहास

​विदेशी और क्रूर मुस्लिम आक्रांताओं के आक्रमणों से पूर्व, इस पावन नगरी काशी को ‘अविमुक्त क्षेत्र’ कहा जाता था और यहाँ विराजमान महादेव को ‘अविमुक्तेश्वर’ के नाम से पूजा जाता था। मान्यता है कि प्रलय काल में भी भगवान शिव इस क्षेत्र को कभी नहीं छोड़ते (मुक्त नहीं करते), इसीलिए यह ‘अविमुक्त’ है।

​यहाँ काशी में अविमुक्तेश्वर के रूप में स्वयं प्रकट हुए ज्योतिर्लिंग की पूजा होती थी, जिसे शास्त्रों में ‘आदिलिंग’ या ‘आदि विश्वेश्वर’ कहा गया है। यह वह मूल शिवलिंग था जिसकी आभा से संपूर्ण आर्यावर्त आलोकित था।

 

मस्जिद के साथ यह नाम कैसे जुड़ा? आक्रांताओं की कुटिल मानसिकता

​अब प्रश्न उठता है कि यह नाम मस्जिद के साथ कैसे जुड़ गया? इसका उत्तर इतिहास की क्रूर सच्चाई में छिपा है। सन १६६९ में जब मुग़ल आक्रांता औरंगज़ेब ने सनातनी अस्मिता पर कुठाराघात करते हुए आदि विश्वेश्वर के भव्य मंदिर को तोड़ने का क्रूर आदेश दिया, तो मंदिर के मलबे और उसकी मूल पश्चिमी दीवार (जो आज भी चीख-चीख कर मंदिर होने की गवाही दे रही है) का उपयोग करके जबरन एक ढांचा खड़ा कर दिया गया।

​इस्लामिक परंपरा के अनुसार, मस्जिदों के नाम आमतौर पर अल्लाह, पैगंबर, राजाओं या उनके निर्माताओं (जैसे जामा मस्जिद, मोती मस्जिद, बाबरी मस्जिद) के नाम पर होते हैं। परंतु काशी में आक्रांता और उनके दरबारी पूरी तरह विफल रहे। वे मंदिर को तो तोड़ सके, परंतु जनमानस के हृदय में बसी ‘ज्ञानवापी’ की चेतना को नहीं मिटा सके।

​चूँकि वह अवैध ढांचा साक्षात ज्ञानवापी कुंड के ऊपर और मूल मंदिर के गर्भगृह को घेरकर बनाया गया था, इसलिए स्थानीय हिंदू समाज उस पूरे परिसर को ‘ज्ञानवापी’ ही कहता रहा। समय के साथ, अपनी पहचान को बनाए रखने और हिंदुओं को चिढ़ाने के लिए मुस्लिम समाज और औपनिवेशिक काल के इतिहासकारों ने भी उस विवादास्पद ढांचे को ‘ज्ञानवापी मस्जिद’ कहना शुरू कर दिया। यह नाम स्वयं में इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि मस्जिद के नीचे दबा हुआ सच केवल और केवल हिंदू धर्म और भगवान शिव का आदि-स्वरूप है।

 

निष्कर्ष

​सारे पुराण, सारे शास्त्र और स्वयं भूमि का भूगोल चिल्ला-चिल्ला कर कह रहा है कि ज्ञानवापी हिंदुओं की आस्था का अनादि केंद्र है। एक मस्जिद का नाम ‘ज्ञानवापी’ होना ही इस बात का सबसे बड़ा वैधानिक और ऐतिहासिक प्रमाण है कि वहाँ कोई मस्जिद थी ही नहीं, बल्कि वह बाबा विश्वनाथ का मंदिर था जिसे जबरन अधर्म की तोपों से ढका गया। आज जब सत्य की परतें धीरे-धीरे उतर रही हैं, तो यह स्पष्ट हो गया है कि आदि विश्वेश्वर का आदिलिंग अपनी ज्ञानवापी के साथ पुनः अवतरित होने के लिए व्याकुल है।

हरि ॐ! नमः शिवाय‼️

 

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