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मणिपुर संकट की अंतर्कथा: औपनिवेशिक षड्यंत्र, जनसांख्यिकीय असंतुलन और तुष्टिकरण का इतिहास

लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

 

भूमिका: पूर्वोत्तर का सामरिक और सांस्कृतिक महत्त्व

भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र न केवल अपनी प्राकृतिक संपदा बल्कि सामरिक दृष्टिकोण से भी देश का अत्यंत संवेदनशील भूभाग है। जब ब्रिटिश औपनिवेशिक शक्तियां भारत आईं, तो उनकी गिद्ध-दृष्टि इस अंचल के घने जंगलों, चाय के बागानों और छुपे हुए खनिज तेल के भंडारों पर पड़ी। इस अमूल्य संपदा पर अवैध आधिपत्य जमाने के लिए अंग्रेजों ने यहाँ के सीधे-सरल, प्रकृति-प्रेमी और बहुतायत में वैष्णव सनातनी परंपरा को मानने वाले मूल निवासियों को अपना सॉफ्ट टारगेट (आसान लक्ष्य) बनाया। अंग्रेजों की नीति स्पष्ट थी—इस भूभाग की संपदा का दोहन करना और यहाँ के निवासियों को शेष भारत की मुख्यधारा से हमेशा के लिए काट देना।

 

विभाजनकारी औपनिवेशिक नीतियां: परमिट राज और मिशनरी तंत्र

अंग्रेजों ने पूर्वोत्तर को शेष भारत से पृथक करने के लिए अत्यंत कुटिल चाल चली। वे ‘इनर लाइन परमिट’ (ILP) और ‘आउटर लाइन परमिट’ जैसी प्रशासनिक व्यवस्थाएँ लेकर आए। इसके अंतर्गत शेष भारत का कोई भी नागरिक इस क्षेत्र में बिना अनुमति के प्रवेश नहीं कर सकता था और न ही एक निश्चित समय-सीमा से अधिक वहाँ ठहर सकता था। इसके विपरीत, ब्रिटिश अधिकारियों ने स्वयं के लिए आलीशान भवन बनवाए और चाय की पत्तियों के व्यापार तथा तेल संपदा पर एकाधिकार स्थापित कर लिया।

सांस्कृतिक रूप से इस क्षेत्र को दुर्बल करने के लिए अंग्रेजों ने देखा कि यहाँ ईसाई धर्म का अस्तित्व नहीं था। अतः योजनाबद्ध तरीके से ईसाई मिशनरियों को इस दुर्गम अंचल में भेजा गया। इन मिशनरियों ने यहाँ की निर्धनता और सीधेपन का लाभ उठाकर तीव्र गति से धर्मांतरण का कुचक्र प्रारंभ किया। जब एक बड़ी आबादी का धर्मांतरण हो गया, तो औपनिवेशिक शासकों ने उन्हें ‘ईसाई राज्य’ का स्वप्न दिखाना शुरू किया। इसका एक बड़ा सामरिक कारण यह भी था कि अंग्रेज इस पहाड़ी क्षेत्र से चीन, मुख्य भारत और संपूर्ण पूर्वी एशिया पर अपनी रणनीतिक निगरानी बनाए रखना चाहते थे। इसी कुटिल नीति के अंतर्गत, धर्मांतरित लोगों को ‘अनुसूचित जनजाति’ (ST) का दर्जा देकर विशेष सरकारी सुविधाएं प्रदान की गईं, जिससे समाज में एक गहरी खाई पैदा हो गई। इस क्षेत्र में पारंपरिक रूप से धर्मांतरित वर्ग को मुख्य रूप से ‘कुकी’ और ‘नागा’ तथा मूल सनातनी वैष्णव समाज को ‘मैती’ (Meitei) कहा जाता है।

 

जनसांख्यिकीय असंतुलन और अफीम की खेती

स्वतंत्रता से पूर्व तक इस क्षेत्र में नागा समुदाय की एक बड़ी आबादी का भी धर्मांतरण हो चुका था। धीरे-धीरे ईसाई पंथ को मानने वालों की संख्या मूल सनातनी वैष्णवों के समतुल्य या उनसे अधिक होने लगी। यद्यपि यहाँ के मूल निवासी लगातार अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष करते रहे, जिसके कारण अंग्रेज इस हिस्से को भारत से पूरी तरह विभाजित करने में तो असफल रहे, परंतु वे मैती हिंदुओं की संख्यात्मक शक्ति को कम करने में अवश्य सफल हो गए।

परिणामस्वरूप, भौगोलिक रूप से मणिपुर के लगभग ९०% पहाड़ी और वन भूभाग पर कुकी और नागा समुदायों का प्रभाव स्थापित हो गया, जबकि मूल निवासी मैती समाज मात्र १०% मैदानी घाटी वाले भूभाग में सिमट कर रह गया। अंग्रेजों ने अपनी कुटिल आर्थिक नीति के तहत इस क्षेत्र में अफीम (Opium) की अवैध खेती को भी बढ़ावा दिया और सामरिक चाल के तहत इस पर कुकी समुदाय के कुछ हिस्सों का नियंत्रण स्थापित होने दिया।

 

स्वतंत्रता के पश्चात: नेहरूवादी नीतियां और उपेक्षा का दंश

सन १९४७ में स्वतंत्रता के समय मणिपुर के महाराजा बोधचंद्र सिंह ने दूरदर्शिता का परिचय देते हुए भारत संघ में विलय का ऐतिहासिक निर्णय लिया। वर्ष १९४९ में उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से भेंट कर आग्रह किया था कि मात्र १०% भूभाग में सिमट कर रह गए मूल निवासी वैष्णव ‘मैती’ समाज के अस्तित्व की रक्षा हेतु उन्हें ‘अनुसूचित जनजाति’ (ST) का दर्जा दिया जाए। परंतु, तत्कालीन केंद्र सरकार ने उनकी इस तार्किक और संवेदनशील मांग को सिरे से ठुकरा दिया।

सन १९५० में जब स्वतंत्र भारत का संविधान अस्तित्व में आया, तब भी मैती समाज को कोई विशेष वैधानिक संरक्षण नहीं मिला। इसके विपरीत, वर्ष १९६० में नेहरू सरकार द्वारा लाए गए ‘लैंड रिफॉर्म एक्ट’ (भूमि सुधार अधिनियम) ने इस असंतुलन को और अधिक गहरा कर दिया। इस अधिनियम के अंतर्गत, ९०% भूभाग वाले कुकी और नागा (धर्मांतरित वर्ग) को अनुसूचित जनजाति (ST) की सूची में बनाए रखा गया, जिससे उन्हें यह विशेषाधिकार मिला कि वे मणिपुर में कहीं भी जाकर बस सकते हैं और भूमि क्रय कर सकते हैं। परंतु, १०% की संकीर्ण घाटी में रहने वाले मैती हिंदुओं को पहाड़ों पर भूमि खरीदने या बसने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं दिया गया। इसी विसंगति ने मैती समाज के भीतर दिल्ली की तत्कालीन व्यवस्था के विरुद्ध असंतोष के बीज बो दिए।

 

विदेशी खुफिया एजेंसियों का प्रवेश और आंतरिक अशांति

इस आंतरिक असंतोष का लाभ उठाने के लिए वैश्विक पटल पर सक्रिय शक्तियों—जैसे ब्रिटेन की खुफिया एजेंसी MI6 और पाकिस्तान की ISI—ने हाथ मिला लिया। इन एजेंसियों ने कुकी और नागा उग्रवादी गुटों को अत्याधुनिक हथियारों की आपूर्ति शुरू की, जिसका उपयोग वे भारतीय संप्रभुता के विरुद्ध और मैती वैष्णवों को उनके मूल स्थानों से खदेड़ने के लिए करने लगे। मैती समाज ने दिल्ली के किसी विशेष संरक्षण के बिना भी इस सशस्त्र उग्रवाद का डटकर मुकाबला किया।

दशकों तक इस क्षेत्र में रही राजनीतिक शिथिलता और वोटबैंक की राजनीति के कारण उग्रवादी संगठनों को परोक्ष समर्थन मिलता रहा। पूरा पूर्वोत्तर क्षेत्र एक तरह से उग्रवाद और गुरिल्ला युद्ध का मैदान बना दिया गया, जिसके कारण मिजो जनजातियों में भी सशस्त्र विद्रोह भड़क उठा। इसी कालखंड में, म्यांमार (बर्मा) की सीमा से अवैध रूप से चीनी-कुकी मूल की जनजातियों का भारत में अनधिकृत प्रवेश प्रारंभ हुआ। स्थानीय राजनीतिक प्रश्रय के कारण इन अवैध प्रवासियों को मणिपुर के पहाड़ी और जंगली इलाकों में नागरिकता देकर बसा दिया गया, जिन्होंने मूल निवासी वैष्णव मैतियों के विरुद्ध मोर्चेबंदी तेज कर दी।

 

१९७२ का संकट और हवाई हमला (Air Strike)

पूर्वोत्तर के हालात लगातार बिगड़ते गए और केंद्र द्वारा इसका कोई ठोस राजनैतिक या स्थाई समाधान नहीं खोजा गया। इसी अशांति के कालखंड में एक अभूतपूर्व मोड़ तब आया, जब मिजोरम के आदिवासी इलाकों में उग्रवाद को कुचलने के लिए तत्कालीन केंद्र सरकार द्वारा ‘हवाई हमले’ (Air Strike) का आदेश दिया गया। यद्यपि सैन्य और वायुसेना के शीर्ष अधिकारियों ने अपने ही नागरिकों पर हवाई हमले का विरोध किया था, परंतु तत्कालीन युवा पायलटों (जो बाद में राजनीति में आए) के माध्यम से इस मिशन को अंजाम दिया गया, जिसने स्थानीय आबादी के भीतर असंतोष और अलगाव की भावना को और अधिक हिंसक व सशस्त्र बना दिया।

वर्ष १९७१ में पूर्वी पाकिस्तान के विभाजन और बांग्लादेश के अस्तित्व में आने से पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI के नेटवर्क को पूर्वी मोर्चे पर करारा झटका लगा, परंतु म्यांमार की खुली और पोरस (छिद्रदार) सीमा उनके लिए एक सुरक्षित गलियारा बनी रही। म्यांमार से आने वाले अवैध तत्वों ने मणिपुर के आरक्षित वनों और पहाड़ों में डेरा जमाकर बड़े पैमाने पर अफीम की खेती और नशीले पदार्थों की तस्करी का एक समानांतर साम्राज्य स्थापित कर लिया। यह पूरा अंचल दशकों तक हथियारों और मादक पदार्थों की तस्करी की ‘ब्लैक इकोनॉमी’ (काली अर्थव्यवस्था) का केंद्र बना रहा, जिसने न केवल सुरक्षा को खतरे में डाला, बल्कि वहाँ की युवा पीढ़ी को भी नशे के जाल में धकेल दिया।

 

वर्ष २०१४ के बाद का नीतिगत परिवर्तन: ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’

वर्ष २०१४ के पश्चात केंद्र की नीति में एक आमूलचूल परिवर्तन देखा गया। ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ के अंतर्गत पूर्वोत्तर के विकास और सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई। NSCN (नागा संगठन) और भारत सरकार के बीच हुए ऐतिहासिक ‘नागा एकॉर्ड’ के बाद क्षेत्र में हिंसक घटनाओं में भारी कमी आई और भारतीय सेना पर होने वाले घात लगाकर हमले लगभग समाप्त हो गए। बुनियादी ढांचे (Infrastructure) के अभूतपूर्व विकास और कनेक्टिविटी ने पूर्वोत्तर के लोगों को वैचारिक रूप से दिल्ली के निकट आने का अवसर दिया।

रणनीतिक रूप से इस क्षेत्र में हुए राजनीतिक परिवर्तन के कारण दशकों से पैर जमाए बैठे पारंपरिक राजनीतिक दलों और उनके समर्थित तंत्र का समापन हुआ। इससे अफीम और हथियारों की तस्करी से होने वाली काली कमाई के स्रोत बंद होने लगे। यही कारण है कि इस अवैध तंत्र से जुड़े तत्वों के लिए क्षेत्र में पुनः अशांति और हिंसा फैलाना उनके अस्तित्व की लड़ाई बन गया।

 

हालिया तनाव के दो मुख्य कारण

वर्तमान में मणिपुर में उपजे नए तनाव के पीछे दो अत्यंत महत्वपूर्ण और तात्कालिक कारण रहे हैं:

१. मणिपुर उच्च न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय: उच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि मूल निवासी मैती समाज को भी ‘अनुसूचित जनजाति’ (ST) का दर्जा देने की प्रक्रिया पर विचार किया जाए। इस निर्णय से दशकों पुराने उस नेहरूवादी फॉर्मूले को झटका लगा, जिसने मैतियों को १०% भूभाग में कैद कर रखा था। इस दर्जे के मिलने से मैती समाज भी पूरे मणिपुर में वैधानिक रूप से भूमि खरीदने और बसने का अधिकारी हो जाएगा, जो कि पहाड़ी इलाकों पर एकाधिकार जमाए बैठे उग्रवादी तत्वों को स्वीकार नहीं था।

२. अवैध घुसपैठ और अफीम पर प्रहार: मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बिरेन सिंह द्वारा म्यांमार से आए अवैध प्रवासियों की पहचान करने, उन्हें बाहर निकालने और जंगलों में चल रही अफीम की अवैध खेती को नष्ट करने का व्यापक अभियान (War on Drugs) चलाया गया। इस कड़े प्रहार ने ड्रग माफिया और तस्करों के पूरे सिंडिकेट को हिलाकर रख दिया।

इसी पृष्ठभूमि में, जब इस अवैध साम्राज्य पर संकट आया, तो उग्रवादी तत्वों ने लुटियंस मीडिया और चुनिंदा वैचारिक विमर्शकारों के माध्यम से शेष भारत में एकतरफा और भ्रामक नैरेटिव (कथानक) फैलाना शुरू किया। इसके तुरंत बाद, योजनाबद्ध तरीके से मूल निवासी मैती समाज पर हमले किए गए। परंतु इस बार मैती समाज ने भी अपनी सांस्कृतिक अस्मिता और अस्तित्व की रक्षा के लिए पूरी शक्ति के साथ प्रत्युत्तर दिया, जिसकी कल्पना इन उग्रवादी संगठनों और उनके वैचारिक आकाओं ने नहीं की थी। परिणाम विपरीत आते ही अब एक विशेष बौद्धिक और राजनैतिक वर्ग द्वारा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ‘विक्टिम कार्ड’ खेलने का प्रयास किया जा रहा है। वास्तव में, यह छटपटाहट इस बात की है कि मणिपुर और केंद्र सरकार ने दशकों से चल रहे अवैध घुसपैठ, धर्मांतरण और ड्रग्स तस्करी के सुरक्षित बिलों पर निर्णायक प्रहार कर दिया है।

 

 

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