पानीपत का तृतीय युद्ध और इतिहासकार त्र्यंबक शेजवलकर: प्रामाणिकता की कसौटी
भारतीय इतिहास की नियति का निर्धारण यदि किसी एक भौगोलिक क्षेत्र ने किया है, तो वह हरियाणा का पानीपत है। इस मैदान की मिट्टी में तीन ऐसे युद्ध लड़े गए जिन्होंने दिल्ली के सिंहासन का भाग्य पूरी तरह बदल कर रख दिया। जहाँ १५२६ के प्रथम युद्ध ने इब्राहिम लोदी को हराकर बाबर के माध्यम से मुगल साम्राज्य की नींव रखी और युद्ध में पहली बार बारूद व मैदानी तोपखाने (तुगलमा पद्धति) का सूत्रपात किया; वहीं १५५६ के द्वितीय युद्ध में अकबर के सेनापति बैरम खान ने सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य (हेमू) को परास्त कर मुगलों और अफगानों के संघर्ष को अंतिम रूप से मुगलों के पक्ष में निर्णीत कर दिया।
परंतु, इन सबसे इतर, १४ जनवरी १७६१ को लड़ा गया पानीपत का तीसरा युद्ध भारतीय सैन्य इतिहास का सबसे त्रासद और भीषण युद्ध था। मराठा सेनापति सदाशिव राव भाऊ और अफगान आक्रांता अहमद शाह अब्दाली के बीच हुए इस महासंग्राम में जहाँ भील प्रमुख इब्राहिम ख़ाँ गार्दी की तोपों ने मराठों का साथ दिया, वहीं दोआब के रोहिला अफगानों और अवध के नवाब शुजाउद्दौला ने अब्दाली का साथ देकर इतिहास की धारा बदल दी।
इस तीसरे युद्ध के वास्तविक, प्रामाणिक और निष्पक्ष इतिहास को देश के सामने लाने का श्रेय यदि किसी को जाता है, तो वे हैं—महान मराठी इतिहासकार त्र्यंबक शंकर शेजवलकर।
इतिहासकार त्र्यंबक शेजवलकर: जीवन और वैचारिक पृष्ठभूमि
त्र्यंबक शेजवलकर केवल एक लेखक नहीं थे, बल्कि वे आधुनिक भारत के उन गिने-चुने इतिहासकारों में से थे जिन्होंने इतिहास-लेखन को ‘प्रमाण’ और ‘भूगोल’ की वैज्ञानिक कसौटी पर कसा।
जन्म और शिक्षा: उनका जन्म २५ मई १८९५ को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के कशेली (कसैली) ग्राम में हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा ‘आर्य शिक्षा समाज’ द्वारा संचालित विद्यालय से प्राप्त कर मैट्रिक उत्तीर्ण किया और तत्पश्चात विल्सन कॉलेज, मुंबई से कला स्नातक (B.A.) की उपाधि प्राप्त की।
सेवाकाल और डेक्कन कॉलेज: शेजवलकर जी ने अपने करियर की शुरुआत मई १९१८ से जून १९२१ तक सैन्य लेखा विभाग (Military Accounts Department) में नौकरी से की। इसके बाद, उनका वास्तविक बौद्धिक सफर शुरू हुआ जब उन्होंने अगस्त १९३९ से २५ मई १९५५ तक पुणे के सुप्रसिद्ध डेक्कन कॉलेज में इतिहास विभाग में अध्यापन और शोध कार्य किया। सेवानिवृत्ति के उपरांत भी वे अपनी मृत्यु तक डेक्कन कॉलेज में मानद शोधकर्ता के रूप में निरंतर सक्रिय रहे।
भारतीय इतिहास संशोधक मंडल और वैचारिक संगति
वर्ष १९१८ से ही शेजवलकर जी ‘भारतीय इतिहास संशोधक मंडल’ (पुणे) से जुड़ चुके थे। यह वह दौर था जब भारत के इतिहास को स्वदेशी दृष्टि से पुनः प्रलेखित किया जा रहा था। यहाँ वे अपने समय के मूर्धन्य इतिहासकारों—दत्तो वामन पोद्दार, गोविंद सखाराम सरदेसाई (रियासतकार सरदेसाई) और दत्तोपंत आप्टे के जीवंत संपर्क में आए। इन महापुरुषों के सानिध्य और आपसी विमर्श ने शेजवलकर जी की ऐतिहासिक दृष्टि को और अधिक पैना और वस्तुनिष्ठ बनाया।
’पानीपत’ ग्रंथ: शोध, प्रवास और सर्वोच्च प्रामाणिकता
मराठी भाषा और इतिहास-लेखन में त्र्यंबक शेजवलकर जी का नाम सदा-सर्वदा के लिए अमर कर दिया उनके कालजयी शोध ग्रंथ ‘पानीपत १७६१’ ने। वे महाराष्ट्र के पहले ऐसे इतिहासकार थे जिन्होंने पानीपत के तीसरे युद्ध को किसी दंतकथा या केवल लोक-श्रुतियों के आधार पर नहीं, बल्कि कठोर ऐतिहासिक साक्ष्यों पर परखा।
पेशवा दफ्तर का गहराई से अध्ययन: इस ग्रंथ को लिखने के लिए उन्होंने पेशवाओं के मूल ऐतिहासिक पत्रों, कूटनीतिक पत्राचारों और समकालीन स्रोतों (मराठी, फारसी और अंग्रेजी) का अत्यंत सूक्ष्म व गहराई से अध्ययन किया।
भौगोलिक प्रवास और मैदानी निरीक्षण: शेजवलकर जी का मानना था कि युद्ध का इतिहास तब तक अधूरा है जब तक उसकी भौगोलिक परिस्थितियों को न समझा जाए। इसके लिए वे स्वयं पुणे से चलकर पानीपत, कुंजपुरा, सोनीपत और कुरुक्षेत्र की उन ऐतिहासिक जगहों पर गए, जहाँ सेनाओं के शिविर लगे थे। उन्होंने सैन्य व्यूह-रचना (Tactical Deployment) को समझने के लिए उस पूरी भूमि का पैदल प्रवास और निरीक्षण किया। यही कारण है कि उनका यह ग्रंथ पानीपत की तीसरी लड़ाई पर दुनिया का सबसे विश्वसनीय और प्रामाणिक दस्तावेज़ माना जाता है।
साहित्यिक सम्मान और सिनेमा पर प्रभाव
इतिहास-लेखन के साथ-साथ मराठी साहित्य में उनके अप्रतिम योगदान के लिए, उनके द्वारा रचित विस्तृत शोधपरक जीवनी ग्रंथ ‘श्री शिव छत्रपति’ के लिए उन्हें वर्ष १९६६ में मरणोपरांत ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया।
उनकी प्रामाणिकता का प्रभाव आधुनिक युग में भी साफ़ देखा जा सकता है। वर्ष २०१९ में आई निर्माता-निर्देशक आशुतोष गोवारिकर की भव्य ऐतिहासिक फिल्म ‘पानीपत’ (जिसमें अर्जुन कपूर और संजय दत्त मुख्य भूमिका में थे), वह पूरी तरह से त्र्यंबक शेजवलकर जी द्वारा लिखित इसी ‘पानीपत’ ग्रंथ के शोध और ऐतिहासिक तथ्यों पर ही आधारित थी। फिल्म की कथावस्तु, किरदारों के संबंध और युद्ध के घटनाक्रम को शेजवलकर जी की पुस्तक से ही हूबहू लिया गया था।
निष्कर्ष
त्र्यंबक शेजवलकर जी का कार्य आज के इतिहासकारों के लिए एक मार्गदर्शक की तरह है। उन्होंने सिखाया कि इतिहास केवल विजेताओं या पराजितों की गाथा नहीं है, बल्कि वह उन रणनीतिक चूकों, कूटनीतिक विफलताओं और शौर्य का लेखा-जोखा है जिससे आने वाली पीढ़ियाँ सीख ले सकें। पानीपत के तीसरे युद्ध के उस भीषण सन्नाटे और मराठों के महात्याग को शब्दों में सहेजने वाले शेजवलकर जी का योगदान भारतीय इतिहास-लेखन में सदैव वंदनीय रहेगा।
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