औपनिवेशिक हीनता-बोध बनाम प्राच्य मेधा: भारतीय ज्ञान-परंपरा और आत्म-विस्मृति का संकट
भूमिका: मेधा का विस्थापन और आधुनिक बौद्धिक विमर्श
इतिहास गवाह है कि किसी भी राष्ट्र को मानसिक रूप से पराधीन करने का सबसे सुलभ मार्ग उसकी ज्ञान-परंपरा को ‘अंधविश्वास’ या ‘पिछड़ापन’ घोषित कर देना है। भारतीय प्राच्यविद्या (Indology) के साथ भी यही हुआ। जिस ज्ञान-परंपरा में गणित, व्याकरण, काव्य-शास्त्र और चिकित्सा की अत्यंत वैज्ञानिक और अद्भुत दृष्टियाँ समाहित थीं, उसे एक सोची-समझी कूटनीति के तहत केवल ‘कर्मकांड और रूढ़ियों’ से जोड़कर हाशिए पर धकेल दिया गया।
यह आज के स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी विडंबना है कि हिंदुस्तान की किसी भी बड़ी और नामचीन अकादमी से पढ़कर निकलने वाला आधुनिक बुद्धिजीवी राजशेखर, भरतमुनि, व्यास, पाणिनि, आर्यभट या कुमारिल भट्ट को उद्धृत करने में संकोच का अनुभव करता है। जैसे ही कोई इन मनीषियों के वैज्ञानिक अवदान की चर्चा करता है, वैसे ही आधुनिक विमर्श का एक बड़ा धड़ा पूरी ज्ञान-परंपरा को ही ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ या ‘अतीत-मोह’ का ठप्पा लगाकर निरस्त करने की आत्मघाती कोशिशों में जुट जाता है।
भाषा और प्रतीक: ‘अष्टाध्यायी’ का कौतुक और ‘भगवा’ का भय
भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति की संवाहक होती है। परंतु आज की स्थिति यह है कि ‘संस्कृत’ का नाम लेते ही पढ़े-लिखे आधुनिकतावादी अपनी नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं। यदि उनके सामने पाणिनि की “अष्टाध्यायी” या अमरसिंह के “अमरकोश” की बात की जाए, तो सामान्य जन भी उसे इस कौतुक और विस्मय से देखता है, मानो किन्हीं विलायती या परग्रही ग्रंथों का नाम ले लिया गया हो। यह वह भारत है, जहाँ अंग्रेज़ी की क्लिष्टता लिखना और बोलना परम गर्व तथा बौद्धिकता की निशानी मानी जाती है, जबकि शुद्ध, परिमार्जित और तत्समनिष्ठ हिंदी हमें सहज ही असहज कर देती है। आधुनिक लेखकों (जैसे सुशोभित) को उनकी क्लिष्ट तत्समनिष्ठ हिंदी के लिए स्वयं को ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवादी’ कहने वालों द्वारा ही जब नियमित रूप से टोका और उपेक्षित किया जाता है, तो भाषा के इस संकट की गहराई को समझा जा सकता है।
विडंबना की पराकाष्ठा देखिए कि ‘योग’ जैसी सार्वभौमिक और वैज्ञानिक जीवन-पद्धति तक को राजनीतिक चश्मे से देखकर “भगवा” मान लिया जाता है और उसका विरोध शुरू हो जाता है!
पश्चिम का सम्मोहन और अपनों से अनभिज्ञता
हमारे देश के तथाकथित प्रगतिशील बुद्धिजीवी रात-दिन भारतीय परंपरा को कोसने, उसे अवैतिहासिक और प्रतिगामी सिद्ध करने में ही अपनी बौद्धिक ऊर्जा व्यय करते हैं। उनकी दृष्टि में गीता, उपनिषद और योग केवल उपहास के विषय हैं; ज्योतिष महज़ अंधविश्वास है और आयुर्वेद पूरी तरह से तिथिबाह्य (Outdated) हो चुका है। जब मूल आधारों के प्रति ही ऐसा दृष्टिकोण हो, तो फिर भारतीय व्याकरण-शास्त्र, रस-सिद्धांत, काव्य-मीमांसा और ‘षट्दर्शन’ (Six Schools of Philosophy) की गंभीर चर्चा की अपेक्षा किससे की जाए?
जबकि सत्य इसके ठीक विपरीत और विस्मयकारी है। आज दुनिया के उत्तर-आधुनिक चिंतक (Post-modern Thinkers) शून्यवाद को समझने के लिए नागार्जुनाचार्य के दर्शन से फिलॉस्फी सीख रहे हैं। पश्चिम के आधुनिक भाषा-वैज्ञानिक (जैसे नॉम चॉम्स्की) पाणिनि के व्याकरण सूत्रों और उनकी गणितीय संरचना से भाषा का व्याकरण सीख रहे हैं। परंतु हम, जो इस महान विरासत के सीधे उत्तराधिकारी हैं, इसके दाय (विरासत) से भी पूरी तरह अनभिज्ञ बैठे हैं। पाणिनि के जो पारिभाषिक शब्द हमारी रोज़मर्रा की चेतना का हिस्सा होने चाहिए थे, वे आज हमारे लिए आश्चर्य का विषय बन चुके हैं।
यही स्थिति हमारे भूगोल और इतिहास की भी है। ‘शारदा पीठ’ और ज्ञान की भूमि रहे कश्मीर को आज हम केवल राजनीतिक और सांप्रदायिक वितंडवाद के कारणों से जानते हैं; उसे आनंदवर्धन (ध्वन्यालोक के रचयिता), अभिनवगुप्त (तंत्रालोक और रस-सिद्धांत के प्रणेता), कल्हण (राजतरंगिणी के लेखक) और क्षेमेन्द्र के देश के रूप में याद करने का सांस्कृतिक साहस हम खो चुके हैं। यह हमारी वर्तमान शिक्षा परंपरा की विफलता पर एक अत्यंत कड़वी और प्रामाणिक टिप्पणी है।
आत्म-घृणा का व्याकरण और वैचारिक दुरभिसंधि
इस वैचारिक भटकाव ने समाज में आत्म-घृणा, आत्म-धिक्कार और आत्मग्लानि के एक नए त्रिकोण को जन्म दिया है। औपनिवेशिक हीनता-बोध (Colonial Hangover) से उपजे इस रीढ़हीन ‘आत्म-दैन्य’ को आज के बुद्धिजीवियों ने अपने चिंतन का व्याकरण बना लिया है। इसके चलते हर हिंदू प्रतीक घृणित और संदेहास्पद प्रतीत होने लगा है, चाहे वह कितना ही उदात्त, मानवीय और कल्याणकारी क्यों न हो। हर हिंदू रूपक लज्जास्पद बना दिया गया है, चाहे वह कितना ही निरापद और सुंदर क्यों न हो।
यहाँ ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ को संकीर्ण जातीय अस्मिता से जोड़कर देखने की एक फैशननुमा होड़ मची है। और इस पूरे विमर्श में यदि आप ध्यान से देखें, तो दक्षिणपंथ और वामपंथ की एक भीषण कूटनीतिक दुरभिसंधि (Unspoken Alliance) साफ़ लक्षित होती है:
दक्षिणपंथ का उग्र नैरेटिव: वह कहता है कि “केवल उग्र राष्ट्रवाद और आक्रामकता ही हिंदुत्व है।”
वामपंथ का प्रत्युत्तर: वह तुरंत ताली बजाकर कहता है कि “जी हाँ, आप बिल्कुल सही कह रहे हैं; और चूँकि यह उग्र है, इसीलिए संपूर्ण हिंदू अस्मिता और उसकी ज्ञान-परंपरा एक सर्वथा त्याज्य (छोड़ने योग्य) मूल्य है।”
यह एक अत्यंत श्रेष्ठ, सहिष्णु, दार्शनिक और समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा पर होने वाला दोहरा प्रहार है—भीतर से भी और बाहर से भी!
मनीषियों का अभाव और सामूहिक एकालाप
आज के इस दौर में इतिहासकार महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज, डॉ. भगवतशरण उपाध्याय, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’, आचार्य विद्यानिवास मिश्र, श्री नरेश मेहता और निर्मल वर्मा जैसे मनीषियों की अनुपस्थिति बहुत गहराई से खलती है। ये वे प्रखर चिंतक और साधक थे, जो आधुनिकता और परंपरा के सेतु थे। जब तक ये मनीषी बौद्धिक जगत के केंद्र में थे, तब तक “हिंदू-भर्त्सना” और भारतीयता को लांछित करने का ऐसा सामूहिक और एकतरफा एकालाप (Monologue) कभी संभव न होने पाता, जैसा कि आज धड़ल्ले से दिखाई देता है। उनकी लेखनी अक्षरों में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वाभिमान के अक्षुण्ण आत्म-गौरव में डूबी होती थी।
निष्कर्ष: आत्ममंथन की सक्षमता और जातीय गौरव
यह एक अकाट्य मनोवैज्ञानिक सत्य है कि दुनिया की कोई भी जाति या राष्ट्र आठों पहर केवल आत्मग्लानि, अपराध-बोध और आत्म-निंदा के गर्त में डूबा रहकर जीवित नहीं रह सकता। गौरव ही किसी भी जातीय अस्मिता का मुख्य ग्रास (भोजन) है, जिससे वह पुष्ट, जाग्रत और क्रियाशील होती है। यदि आप किसी समाज से उसका गौरव छीन लेंगे, तो वह समाज रीढ़हीन और दिशाहीन हो जाएगा।
सनातन परंपरा कभी जड़ नहीं रही; वह अपने भीतर के दोषों के निवारण हेतु आत्ममंथन करने में स्वयं सक्षम है और इतिहास के हर कालखंड में बड़े से बड़े सामाजिक सुधारों के लिए सदैव तत्पर और अग्रणी रही है। फिर भी, वैश्विक पटल पर उसे हमेशा लज्जित और लांछित करने के ये प्रायोजित प्रयास क्यों किए जाने चाहिए? यह प्रश्न आज के प्रत्येक जागरूक और सुधी मानस के लिए एक अनिवार्य चिंतन की मांग करता है।
इति नमस्कारान्ते।
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