युगों-युगों के साक्षी: महाकालस्वरूप भगवान परशुराम (अवतार, इतिहास और पौराणिक गाथा)
सनातन संस्कृति में शौर्य और ज्ञान के अद्वितीय समन्वय, भगवान विष्णु के छठे आवेशावतार भृगुवंशी भगवान परशुराम जी का उल्लेख रामायण, महाभारत, श्रीमद्भागवत पुराण और कल्कि पुराण आदि अनेकानेक ग्रंथों में प्राप्त होता है। उनका सबसे बड़ा परिचय यही है कि उन्होंने अहंकार और धृष्टता के मद में डूबे हैहयवंशी क्षत्रियों का इस पृथ्वी से २१ बार संहार कर अधर्म का अंत किया था। इसके साथ ही उन्होंने समूची धरती पर वैदिक संस्कृति का जन-जन में प्रचार-प्रसार किया। विद्वानों और इतिहासकारों के अनुसार, भारतवर्ष के अधिकांश प्राचीन ग्राम उन्हीं के द्वारा बसाए गए हैं, जिनमें कोंकण, गोवा एवं केरल का तटीय क्षेत्र विशेष रूप से समाविष्ट है।
१. कोंकण और केरल भूमि का अलौकिक निर्माण
प्रायः यह प्रश्न उठता है कि यदि सभी गाँव उन्होंने ही बसाए, तो कोंकण और सुदूर दक्षिण में ऐसा विशेष क्या है? एक पौराणिक कथा के अनुसार, जब परशुराम जी ने २१ बार पृथ्वी को क्षत्रियविहीन कर सारी भूमि महर्षि कश्यप को दान कर दी, तब उनके पास स्वयं के तपोबल के लिए कोई भूमि शेष नहीं रही। तब उन्होंने सुप्रसिद्ध ‘शूर्पारक’ (वर्तमान सोपारा, महाराष्ट्र) के निकट समुद्र तट पर खड़े होकर एक दिव्य बाण (कुछ ग्रंथों के अनुसार अपना परशु) चलाया। उनके इस तेज से भयभीत होकर समुद्र गुजरात से लेकर केरल तक पीछे हट गया और एक नई, अत्यंत उपजाऊ और अनुपम भूमि का निर्माण हुआ। इसी कारण कोंकण, गोवा और केरल में भगवान परशुराम जी विशेष रूप से पूजनीय और वंदनीय हैं।
प्रकृति-पुत्र परशुराम: उनका मूल भाव इस जीव-सृष्टि को इसके प्राकृतिक सौंदर्य सहित जीवंत बनाए रखना था। वे चाहते थे कि यह सारी सृष्टि पशु-पक्षियों, वृक्षों, फल-फूलों और समूची प्रकृति के लिए सुरक्षित रहे। उनका स्पष्ट मत था कि राजा का धर्म प्रजा पर क्रूरतापूर्वक आज्ञापालन थोपना नहीं, बल्कि वैदिक मर्यादा और लोक-कल्याण का विस्तार करना है। वे जन्म से ब्राह्मण अवश्य थे, लेकिन कर्म और स्वभाव से पूर्णतः क्षत्रिय थे। भृगु वंश में जन्म लेने के कारण उन्हें ‘भार्गव’ भी कहा जाता है।
२. बाल्यकाल और प्रकृति से एकात्मता
भगवान परशुराम जी ने अधिकांश विद्याएँ अपनी बाल्यावस्था में ही अपनी माता रेणुका की सात्विक शिक्षाओं से सीख ली थीं। वे न केवल मनुष्यों की, बल्कि मूक पशु-पक्षियों तक की भाषा समझते थे और उनसे संवाद कर सकते थे। उनके तपोबल और करुणा का प्रभाव ऐसा था कि हिंसक और खूंखार वनैले पशु भी उनके स्पर्श मात्र से अपनी हिंसकता भूलकर उनके परम मित्र बन जाते थे।
३. भृगु वंश का अद्भुत चमत्कार: जन्म कथा
प्राचीन काल की कथाओं के अनुसार, महर्षि भृगु के पुत्र ऋचीक का विवाह कान्यकुब्ज के कौशिक राजा गाधि की पुत्री सत्यवती के साथ हुआ था। विवाह के उपरांत अपने पिता महर्षि भृगु की भाँति भार्गव ऋचीक भी हिमालय के दक्षिण में स्थित गाधिपुरी के एक क्षेत्र (वर्तमान बलिया जिला, उत्तर प्रदेश) में आ गए। वहाँ पहले से उपस्थित भृगु ऋषि ने अपनी पुत्रवधू सत्यवती को देखकर अत्यंत प्रसन्नता से वर माँगने के लिए कहा।
सत्यवती ने अपने श्वसुर (ससुर) से स्वयं के लिए और अपनी माता के लिए एक-एक उत्तम पुत्र की याचना की। महर्षि भृगु ने उसे दो अलग-अलग ‘चरु पात्र’ (यज्ञीय खीर/प्रसाद) देते हुए कहा:
”पुत्री! जब तुम और तुम्हारी माता ऋतु-स्नान कर चुकी हो, तब तुम्हारी माँ पुत्र की इच्छा लेकर पीपल के वृक्ष का आलिंगन करे और तुम उसी कामना को लेकर गूलर के वृक्ष का आलिंगन करना। तत्पश्चात मेरे द्वारा दिए गए इन चरुओं का सावधानीपूर्वक अलग-अलग सेवन कर लेना।”
किंतु, सत्यवती की माता ने अपनी पुत्री के दिव्य चरु को श्रेष्ठ मानकर छल से उसे अपने चरु के साथ बदल दिया। इस प्रकार सत्यवती ने अनजाने में अपनी माता वाले चरु का सेवन कर लिया। योगशक्ति से महर्षि भृगु को तुरंत इस बात का ज्ञान हो गया। वे अपनी पुत्रवधू के पास आकर अत्यंत दुखी स्वर में बोले:
”पुत्री! तुम्हारी माता ने तुम्हारे साथ कपट किया है। इसलिए अब तुम्हारी संतान ब्राह्मण होते हुए भी क्षत्रिय जैसा उग्र आचरण करेगी और तुम्हारी माता की संतान क्षत्रिय होकर भी शांत ब्राह्मण जैसा आचरण करेगी।”
इस पर सत्यवती ने रोते हुए महर्षि भृगु से विनती की कि उसका पुत्र ब्राह्मण स्वभाव का ही हो, भले ही उसका पौत्र (पोता) क्षत्रिय जैसा आचरण करे। भृगु जी ने उसकी करुण प्रार्थना स्वीकार कर ली। समय आने पर सत्यवती के गर्भ से महर्षि जमदग्नि का जन्म हुआ, जो परम शांत और तेजस्वी ऋषि बने। बड़े होने पर मुनि जमदग्नि का विवाह इक्ष्वाकु वंशीय राजा प्रसेनजित की कन्या रेणुका से हुआ। रेणुका से उनके पाँच पुत्र हुए: रुक्मवान, सुषेण, वसु, विश्वावानस और सबसे छोटे राम (परशुराम)।
अक्षय तृतीया का महाअवतार और दिव्य अस्त्रों की प्राप्ति
महर्षि जमदग्नि द्वारा संपन्न पुत्रेष्टि यज्ञ से प्रसन्न होकर देवराज इंद्र ने माता रेणुका को अलौकिक वरदान दिया था। उसी के फलस्वरूप वैशाख शुक्ल तृतीया (अक्षय तृतीया) को मध्य प्रदेश के इंदौर के पास मानपुर के जानापाव पर्वत पर भगवान परशुराम का प्राकट्य हुआ। वे भगवान विष्णु के आवेशावतार हैं। पितामह भृगु द्वारा संपन्न नामकरण संस्कार के बाद उनका नाम केवल ‘राम’ रखा गया था।
अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा:
उनकी आरंभिक शिक्षा महर्षि विश्वामित्र एवं ऋचीक के आश्रम में हुई। ऋचीक जी से उन्हें ‘शार्ङ्ग’ नामक दिव्य वैष्णव धनुष और ब्रह्मर्षि कश्यप से अविनाशी वैष्णव मंत्र प्राप्त हुआ।
तदनन्तर, उन्होंने कैलाश पर्वत पर स्थित देवाधिदेव महादेव के आश्रम में घोर तपस्या की। भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उन्हें अपना विशिष्ट और अमोघ दिव्यास्त्र ‘विद्युदभि’ नामक परशु (फरसा) प्रदान किया। इसी परशु को धारण करने के कारण वे ‘परशुराम’ कहलाए।
शिवजी ने उन्हें श्रीकृष्ण का ‘त्रैलोक्य विजय कवच’, ‘स्तवराज स्तोत्र’ एवं ‘मंत्र कल्पतरु’ भी प्रदान किया।
चक्रतीर्थ में किए गए कठिन तप से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें त्रेतायुग में रामावतार होने पर तेजोहरण के उपरांत, कल्प के अंत तक इसी भूलोक पर तपस्यारत रहने का अमरता का वरदान दिया।
४. पुराणों और इतिहास के झरोखे से: मुख्य कथाएँ
(क) माता-पिता के अनन्य भक्त
श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, एक बार गंधर्वराज चित्ररथ को अप्सराओं के साथ जल-विहार करता देख, यज्ञ हेतु गंगा तट पर जल लेने गईं माता रेणुका क्षण भर के लिए आसक्त (विचलित) हो गईं और उन्हें लौटने में विलंब हो गया। यज्ञ का समय व्यतीत हो जाने से त्रिकालदर्शी मुनि जमदग्नि अत्यंत क्रुद्ध हो गए। उन्होंने इसे मानसिक व्यभिचार और आर्य मर्यादा का उल्लंघन मानकर अपने पुत्रों को माता रेणुका का वध करने की आज्ञा दी।
अन्य चार भाइयों ने इस दारुण कार्य को करने का साहस नहीं किया, परंतु अपने पिता के तपोबल और क्रोध से परिचित परशुराम ने पितृ-आज्ञा को शिरोधार्य करते हुए माता का शिरोच्छेद कर दिया और उन्हें रोकने का प्रयास करने वाले अपने भाइयों का भी वध कर डाला। परशुराम जी के इस पितृ-भक्तिपूर्ण और कठोर कार्य से प्रसन्न होकर जब जमदग्नि ने उनसे वर माँगने को कहा, तो परशुराम जी ने अत्यंत चतुरता और करुणा से दो वर माँगे: पहला, उनकी माता और सभी भाई पुनः जीवित हो जाएं, और दूसरा, उन्हें इस वध की कोई स्मृति न रहे। पिता ने ‘एवमस्तु’ कहा और पूरा परिवार पूर्ववत सुखी हो गया।
(ख) पिता की हत्या और सहस्त्रार्जुन से प्रतिशोध
हैहय वंश के प्रतापी राजा कार्तवीर्य अर्जुन (सहस्त्रार्जुन) ने भगवान दत्तात्रेय की घोर तपस्या करके एक हजार भुजाएँ और युद्ध में अजेय रहने का वरदान पाया था। एक बार आखेट के दौरान वह अपनी विशाल सेना सहित महर्षि जमदग्नि के आश्रम पहुँचा। मुनि जमदग्नि ने देवराज इंद्र द्वारा प्रदत्त अलौकिक ‘कपिला कामधेनु’ के प्रभाव से क्षण भर में पूरी सेना का राजसी सत्कार किया। इस चमत्कारी गाय को देखकर सहस्त्रार्जुन के मन में लोभ आ गया। ऋषि के मना करने पर भी वह बलपूर्वक कामधेनु को छीनकर अपनी राजधानी महिष्मती ले गया।
जब परशुराम जी आश्रम लौटे और उन्हें इस धृष्टता का पता चला, तो वे क्रोध से तमतमा उठे। उन्होंने अकेले ही महिष्मती पर आक्रमण कर दिया और अपने अचूक परशु से सहस्त्रार्जुन की एक-एक कर सभी हजार भुजाएँ काट डालीं और उसका वध कर दिया।
इस वध के प्रतिशोध में, जब परशुराम जी आश्रम में नहीं थे, सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने छिपकर ध्यानमग्न महर्षि जमदग्नि की निर्मम हत्या कर दी। माता रेणुका इस वियोग को सहन न कर सकीं और अपने पति की चिताग्नि में प्रविष्ट होकर सती हो गईं। इस जघन्य अपराध से कुपित होकर परशुराम जी ने प्रतिज्ञा की कि वे इस धरती को अत्याचारी क्षत्रियों से विहीन कर देंगे। उन्होंने पूरे वेग से महिष्मती पर अधिकार किया और एक के बाद एक २१ बार इस पृथ्वी से अहंकारी क्षत्रियों का समूल नाश किया। उन्होंने हैहयवंशी क्षत्रियों के रक्त से ‘समंतपंचक’ क्षेत्र (वर्तमान कुरुक्षेत्र के समीप) में पाँच बड़े सरोवर भर दिए और अपने पिता का तर्पण किया। अंत में उनके पितामह महर्षि ऋचीक ने साक्षात प्रकट होकर उन्हें इस घोर रक्तपात को रोकने का आदेश दिया, जिसके बाद वे शांत हुए।
(ग) भगवान गणेश से युद्ध और ‘एकदंत’ प्रसंग
ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, एक बार जब भगवान परशुराम अपने आराध्य भगवान शिव से मिलने कैलाश पहुँचे, तो शिवजी के अंतःपुर के द्वार पर विघ्नहर्ता गणेश जी पहरा दे रहे थे। गणेश जी ने उन्हें भीतर जाने से रोक दिया। परशुराम जी ने बलपूर्वक प्रवेश करने का प्रयास किया, जिससे दोनों महायोध्दाओं में भयंकर युद्ध छिड़ गया। गणपति ने अपनी सूँड में लपेटकर परशुराम जी को समस्त लोकों का भ्रमण कराया और अंत में भूतल पर पटक दिया।
सचेत होने पर परम क्रुद्ध परशुराम जी ने शिवजी द्वारा प्रदत्त अमोघ परशु से गणेश जी पर प्रहार किया। गणेश जी उस परशु का प्रहार रोक सकते थे, परंतु वह परशु उनके पिता शिवजी का था, इसलिए उसका सम्मान रखने हेतु गणेश जी ने उस प्रहार को अपने बाएँ दाँत पर झेल लिया। इस प्रहार से उनका एक दाँत टूटकर गिर गया और वे सदैव के लिए ‘एकदंत’ कहलाए।
५. रामायण और महाभारत काल में उपस्थिति
रामायण काल: शिव धनुष भंग और मर्यादा पुरुषोत्तम से मिलन
त्रेतायुग में जनकपुरी में जब मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम द्वारा शिवजी का ‘पिनाक’ धनुष भंग हुआ, तब उसकी भयंकर टंकार सुनकर परशुराम जी तत्क्षण सभा में पहुँचे। श्रीरामचरितमानस के अनुसार, वे अत्यंत क्रोधित थे और उन्होंने कहा—”सुनहु राम जेहि सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा॥” लक्ष्मण जी के साथ उनके तीखे संवाद हुए। किंतु जैसे ही श्रीराम ने अत्यंत विनम्रता से अपनी वास्तविकता प्रकट की और परशुराम जी ने अपनी परीक्षा के लिए अपना ‘शार्ङ्ग धनुष’ श्रीराम के हाथों में दिया, उनका संशय दूर हो गया। वे समझ गए कि विष्णु के पूर्ण अवतार का प्राकट्य हो चुका है। उन्होंने श्रीराम की परिक्रमा की, आशीर्वाद लिया और तपस्या हेतु महेंद्र पर्वत पर लौट गए।
महाभारत काल: तीन ऐतिहासिक कथाएँ
१. भीष्म पितामह से २३ दिनों का महायुद्ध
काशीराज की पुत्री अंबा का विवाह भीष्म के कारण टूट गया था, जिससे प्रतिशोध की भावना से वह सहायता माँगने गुरु परशुराम के पास पहुँचे। परशुराम जी ने अपने प्रिय शिष्य भीष्म को अंबा से विवाह करने का आदेश दिया, जिसे भीष्म ने अपनी अखंड प्रतिज्ञा के कारण अस्वीकार कर दिया। विवश होकर गुरु-शिष्य में २३ दिनों तक घमासान युद्ध हुआ। भीष्म को उनके पिता शांतनु से ‘इच्छा मृत्यु’ और अजेय रहने का वरदान प्राप्त था, जिसके कारण इस युद्ध का कोई अंतिम परिणाम नहीं निकल सका और अंततः देवताओं के हस्तक्षेप से यह युद्ध विराम को प्राप्त हुआ।
२. द्रोणाचार्य को संपूर्ण अस्त्र-शस्त्र का दान
जब परशुराम जी अपनी सर्वस्व संपत्ति और अस्त्र-शस्त्र ब्राह्मणों को दान कर महेंद्रगिरि जाने की तैयारी कर रहे थे, तब आचार्य द्रोण उनके पास पहुँचे। गुरुवर ने कहा कि भूमि और स्वर्ण तो समाप्त हो चुके हैं, अब केवल मेरा शरीर और अस्त्र-शस्त्र ही शेष हैं। तब परम चतुर और मेधावी द्रोणाचार्य ने उनके सभी अस्त्र-शस्त्रादि को उनके गुप्त मंत्रों और प्रयोग-उपसंहार की विधि सहित माँग लिया। परशुराम जी ने ‘एवमस्तु’ कहकर द्रोण को सर्वविद्या निपुण बना दिया, जो आगे चलकर कौरव-पांडवों के गुरु बने।
३. दानवीर कर्ण को ब्रह्मास्त्र और भयंकर शाप
परशुराम जी का यह नियम था कि वे क्षत्रियों को अस्त्र विद्या दान नहीं करते थे क्योंकि उनका मानना था कि अनियंत्रित शक्ति विनाश का कारण बनती है। सूर्यपुत्र कर्ण स्वयं को सूतपुत्र समझकर मिथ्या परिचय के साथ परशुराम जी के पास दीक्षा लेने पहुँचा। कर्ण के अप्रतिम सामर्थ्य से प्रसन्न होकर उन्होंने उसे ब्रह्मास्त्र सहित संपूर्ण गुप्त विद्याएँ सिखा दीं।
एक दोपहर, जब परशुराम जी कर्ण की जंघा (गोद) पर सिर रखकर सो रहे थे, तब इंद्रदेव ने ‘अली’ (एक तीखे और विषैले कीड़े/भौंरे) का रूप धारण कर कर्ण के पैर को काटना शुरू कर दिया। गुरु की निद्रा भंग न हो, इस विचार से कर्ण असहनीय वेदना को चुपचाप सहता रहा और टस से मस नहीं हुआ। जब घाव से बहता हुआ गर्म रक्त परशुराम जी के शरीर को छू गया, तो वे तुरंत जाग गए। उन्होंने रक्त देखते ही कहा:
”इतनी भीषण पीड़ा को बिना उफ़ किए केवल एक क्षत्रिय ही सहन कर सकता है, कोई ब्राह्मण नहीं। तूने मुझसे असत्य कहा है।”
क्रोधवश उन्होंने कर्ण को शाप दिया कि:
”जिस विद्या को तूने कपट से सीखा है, जब जीवन के महासंग्राम में तुझे इसकी सर्वाधिक आवश्यकता होगी, तब तू इसके प्रयोग का मुख्य मंत्र भूल जाएगा।”
इसी शाप के कारण, कुरुक्षेत्र के मैदान में जब कर्ण का रथ पृथ्वी में धँस गया और अर्जुन उसके सामने थे, तब वह ब्रह्मास्त्र का मंत्र भूल गया और अर्जुन के बाणों द्वारा वीरगति को प्राप्त हुआ।
६. कलयुग की भविष्यवाणी: कल्कि पुराण का विधान
सनातन कालक्रम के अनुसार, भगवान परशुराम अष्ट-चिरंजीवियों (अमर पुरुषों) में से एक हैं, जो आज भी महेंद्र पर्वत पर सूक्ष्म रूप में तपस्यारत हैं। ‘कल्कि पुराण’ के अनुसार, कलयुग के अंत में जब भगवान विष्णु अपने दसवें अवतार ‘भगवान कल्कि’ के रूप में संभल ग्राम में प्रकट होंगे, तब परशुराम जी ही उनके गुरु की भूमिका निभाएंगे। वे ही कल्कि को भगवान शिव की आराधना करने का मार्ग दिखाएंगे और उन्हें धर्म-संस्थापन हेतु अस्त्र-शस्त्र की अंतिम और सर्वोच्च शिक्षा प्रदान करेंगे।
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