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भारतीय सिनेमा का शंखनाद: ३ मई १९१३ और पहली मूक फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’

 

​”चन्द्र टरै सूरज टरै, टरै जगत व्यवहार।

पै दृढ श्री हरिश्चन्द्र का, टरै न सत्य विचार॥”

​सत्य, निष्ठा और मर्यादा के अप्रतिम प्रतीक सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र ने सत्य के मार्ग पर चलने के लिए अपनी पत्नी और पुत्र के साथ स्वयं को भी बेच दिया था। उनकी धर्मपत्नी का नाम महारानी तारा (तारामती) एवं पुत्र का नाम रोहित (रोहिताश) था। राजा ने अपने परम दानी स्वभाव के कारण महर्षि विश्वामित्र को अपना संपूर्ण राज्य दान कर दिया था, परंतु दान के बाद दी जाने वाली अनिवार्य दक्षिणा के लिए साठ भर सोने की खातिर स्वयं तीनों प्राणी बिक गए, मगर अपने कुल की मर्यादा, प्रतिज्ञा और सत्य की रीति को कभी भंग नहीं होने दिया।

​अब आते हैं मुख्य मुद्दे पर— ३ मई, १९१३ को इस कालजयी और सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र के जीवन पर आधारित भारत की पहली फीचर फिल्म प्रदर्शित हुई थी। यह भारतीय सिनेमा के इतिहास की वह ऐतिहासिक नींव थी, जिसने आगे चलकर दुनिया के सबसे बड़े फिल्म उद्योग का रूप ले लिया।

 

​फिल्म का स्वरूप और ऐतिहासिक महत्व

​’राजा हरिश्चंद्र’ भारत की पहली मूक (Silent) फिल्म थी। इसके निर्माता और निर्देशक भारतीय सिनेमा के पितामह धुंडिराज गोविंद फालके (दादासाहब फालके) थे।

​पूर्ण लंबाई की फिल्म: यह भारतीय सिनेमा की प्रथम पूर्ण लंबाई की नाट्य-रूपक (Feature Film) थी। इसकी कुल समय सीमा (Running Time) लगभग ४० मिनट की थी, जिसे उस दौर के हिसाब से एक बड़ा साहसिक कदम माना गया था।

​द्विभाषी सबटाइटल्स (कथन): फिल्म भले ही मूक थी, लेकिन दृश्यों और संवादों को दर्शकों तक प्रभावी ढंग से पहुँचाने के लिए फिल्म के भीतर अंग्रेज़ी और हिन्दी में कथन (Intertitles) लिखकर हर दृश्य को बखूबी समझाया गया था।

 

​मराठी सिनेमा से जुड़ाव और राजा रवि वर्मा का प्रभाव

​इस फिल्म का एक और तकनीकी और सांस्कृतिक पहलू बेहद दिलचस्प है:

​मराठी कलाकारों का बाहुल्य: इस ऐतिहासिक फिल्म में अभिनय करने वाले लगभग सभी कलाकार मराठी रंगमंच से जुड़े हुए थे। यही कारण है कि इस ऐतिहासिक कृति को मराठी फिल्मों की श्रेणी में भी अत्यंत आदर के साथ रखा जाता है।

​राजा रवि वर्मा की जीवंत झांकी: दादासाहब फालके महान चित्रकार राजा रवि वर्मा के चित्रों से अत्यधिक प्रभावित थे। यही वजह है कि फिल्म की शुरुआत राजा रवि वर्मा द्वारा बनाए गए राजा हरिश्चंद्र, उनकी पत्नी तारामती और पुत्र रोहित के प्रसिद्ध चित्रों की प्रतिलिपियों (Tableaux Vivants) की एक जीवंत झांकी से आरंभ होती है, जो दर्शकों को सीधे कथानक से जोड़ देती है।

 

​फिल्म निर्माण के मुख्य सूत्रधार और विवरण

​निर्देशक, निर्माता एवं पटकथा: दादासाहब फालके

​कहानी (मूल नाटक): रणछोड़भाई उदयराम

​प्रदर्शन तिथि (Release Date): ३ मई, १९१३ (कोरोनेशन सिनेमा, मुम्बई)

​समय सीमा: ४० मिनट (४ रील लंबा प्रिंट)

 

​मुख्य कलाकार और अभिनय का अनूठा इतिहास

​उस दौर में सामाजिक रूढ़ियों के कारण महिलाओं का फिल्मों में काम करना वर्जित माना जाता था। इसलिए दादासाहब फालके को तारामती के किरदार के लिए कोई महिला कलाकार नहीं मिली। अंततः उन्होंने एक पुरुष कलाकार से ही रानी तारामती का ऐतिहासिक किरदार कराया। फिल्म के मुख्य कलाकार निम्नवत थे:

​दत्तात्रय दामोदर दबके (डी. डी. दबके): राजा हरिश्चंद्र (मुख्य भूमिका)

​अण्णा साळुंके (अन्ना सालुंके): रानी तारामती (राजा हरिश्चंद्र की पत्नी)

​भालचंद्र फाळके (बालाचन्द्र डी॰ फालके): रोहिताश (हरिश्चंद्र का पुत्र – जो स्वयं दादासाहब के पुत्र थे)

​जी. व्ही. साने (गजानन वासुदेव साने): महर्षि विश्वामित्र

​अन्य सहयोगी कलाकार:

पी. जी. साने, दत्तात्रेय क्षीरसागर, दत्तात्रेय तेलंग, गणपत शिंदे, विष्णू हरी औंधकर, नाथ तेलंग आदि।

 

​सिनेमाई हुकूमत और भारतीयता का उदय (समीक्षात्मक निष्कर्ष)

​१९१३ का वह दौर भारत में ब्रिटिश हुकूमत के चरम का दौर था। थियेटरों और मनोरंजन के साधनों पर पश्चिमी या विदेशी मूक फिल्मों का कब्ज़ा था। ऐसे में दादासाहब फालके ने अपनी ज़मीन, अपने गहने और यहाँ तक कि अपनी पत्नी के जेवर तक गिरवी रखकर इस स्वदेशी फिल्म का निर्माण किया था।

​’राजा हरिश्चंद्र’ महज़ एक फिल्म नहीं थी, बल्कि वह विदेशी सांस्कृतिक उपनिवेशवाद के सामने भारतीय पौराणिक गौरव और स्वदेशी मेधा का पहला तकनीकी शंखनाद थी। जब ३ मई को मुम्बई के कोरोनेशन थियेटर में लोगों ने पहली बार पर्दे पर भारतीय चेहरों को चलते-फिरते देखा, तो देश की जनता विस्मय और राष्ट्रीय गर्व से भर उठी। इस मूक फिल्म ने जो मौन वैचारिक क्रांति शुरू की, उसी की बदौलत आज भारतीय सिनेमा वैश्विक पटल पर अपनी धाक जमाए खड़ा है। दादासाहब फालके का वह विज़न और राजा हरिश्चंद्र का वह सत्य आज भी भारतीय कला जगत की अमर धरोहर हैं।

 

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