पंडित श्रीधर पाठक: खड़ी बोली के उन्नायक और प्रकृति-सौंदर्य के अमर गायक
लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’
भूमिका: आधुनिक हिन्दी काव्य के युगप्रवर्तक
आधुनिक हिन्दी साहित्य का इतिहास उन मनीषियों का ऋणी है, जिन्होंने न केवल भाषा को परिष्कृत किया, बल्कि उसे जन-चेतना और प्रकृति के उन्मुक्त प्रांगण से भी जोड़ा। ऐसे ही कालजयी रचनाकारों में अग्रगण्य थे—पंडित श्रीधर पाठक। वे स्वदेश प्रेम, नैसर्गिक प्राकृतिक सौंदर्य तथा प्रगतिशील समाज सुधार की त्रिवेणी के अद्भुत कवि थे। हिन्दी साहित्य के विकास में उनके अद्वितीय योगदान का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ के पाँचवें ऐतिहासिक अधिवेशन (१९१५, लखनऊ) के सर्वसम्मति से सभापति चुने गए थे। उनकी इसी विलक्षण काव्य-साधना और विद्वत्ता के आदरस्वरूप उन्हें ‘कविभूषण’ की प्रतिष्ठित उपाधि से अलंकृत किया गया था। श्रीधर पाठक उन गिने-चुने विद्वानों में से थे, जिनका हिन्दी, संस्कृत और अंग्रेज़ी तीनों भाषाओं पर समान और असाधारण अधिकार था।
प्राकट्य, परिचय एवं सुसंस्कृत परिवेश
पंडित श्रीधर पाठक का प्राकट्य ११ जनवरी, सन १८६० को उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक आगरा ज़िले में स्थित ‘जौंधरी’ नामक ग्राम में हुआ था। उनके पूज्य पिता का नाम पंडित लीलाधर था, जो स्वयं विद्या-व्यसनी थे। पाठक जी ‘सारस्वत’ ब्राह्मणों के उस विख्यात और कुलीन परिवार से संबंध रखते थे, जो आठवीं शताब्दी में पंजाब के सिरसा से देशांतरण कर आगरा के जौंधरी गाँव में आकर बस गया था। एक अत्यंत सुसंस्कृत, सुशिक्षित और धार्मिक परिवेश में उत्पन्न होने के कारण बालक श्रीधर की रुचि बाल्यावस्था से ही ज्ञानार्जन और प्राचीन ग्रंथों के अनुशीलन में जागृत हो गई थी।
असाधारण शिक्षा एवं भाषा ज्ञान
अल्पायु में ही श्रीधर पाठक ने अपनी कुशाग्र बुद्धि का परिचय देते हुए घर पर ही संस्कृत और फ़ारसी का उत्कृष्ट ज्ञान प्राप्त कर लिया था। इसके उपरांत, उन्होंने औपचारिक रूप से विद्यालयी शिक्षा ग्रहण करना प्रारंभ किया। तत्कालीन शिक्षा पद्धति के अंतर्गत वे ‘हिन्दी प्रवेशिका’ (१८७५) और ‘अंग्रेज़ी मिडिल’ (१८७९) दोनों की परीक्षाओं में संपूर्ण प्रांत में सर्वप्रथम रहे। इसके पश्चात, सन १८८०-८१ में उन्होंने ‘ऐंट्रेंस परीक्षा’ (मैट्रिकुलेशन) भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। उल्लेखनीय है कि उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध के भारत में ऐंट्रेंस तक की शिक्षा को पर्याप्त उच्च और अत्यंत प्रतिष्ठित माना जाता था।
व्यावसायिक जीवन और प्रकृति का सान्निध्य
अपनी शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात श्रीधर पाठक की योग्यता को देखते हुए उनकी नियुक्ति ब्रिटिश भारत की राजकीय सेवा (सरकारी नौकरी) में हो गई। सर्वप्रथम उन्होंने जनगणना आयुक्त (Census Commissioner) के रूप में कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) स्थित केंद्रीय कार्यालय में अपना कार्यभार संभाला। चूँकि उन दिनों ब्रिटिश सरकार के अधिकांश प्रमुख प्रशासनिक और केन्द्रीय कार्यालय कलकत्ता में ही केंद्रित थे, अतः पाठक जी को एक लंबा समय इस सांस्कृतिक नगरी में व्यतीत करने का अवसर मिला।
जनगणना के शासकीय दायित्वों के संदर्भ में श्रीधर पाठक को भारत के विभिन्न ऐतिहासिक नगरों और दुर्गम पर्वतीय प्रदेशों की व्यापक यात्राएँ करनी पड़ीं। इसी यात्रा-क्रम के दौरान उन्हें हिमालय की पर्वत श्रृंखलाओं और भारत के सुदूर प्राकृतिक अंचलों के सौंदर्य को निकट से देखने तथा उसका सूक्ष्म अवलोकन करने का अभूतपूर्व अवसर मिला। इसी सान्निध्य ने उनके भीतर के कवि को प्रकृति-पुत्र बना दिया। कालांतर में उन्होंने रेलवे, पब्लिक वर्क्स (लो०नि०वि०) तथा सिंचाई-विभाग जैसे अन्य महत्वपूर्ण राजकीय विभागों में भी अपनी सेवाएँ दीं और अपनी निष्ठा के बल पर धीरे-धीरे ‘अधीक्षक’ (Superintendent) के उच्च पद को सुशोभित किया।
काव्य लेखन: खड़ी बोली का ऐतिहासिक प्राकट्य
पंडित श्रीधर पाठक की काव्य-साधना ब्रजभाषा और खड़ी बोली दोनों पर समान रूप से प्रवाहित हुई। उनकी ब्रजभाषा जहाँ सहज, सरस और आडम्बरहीन है, वहीं उन्होंने युगीन रूढ़ियों को तोड़ते हुए परंपरागत रूढ़ शब्दावली का परित्याग किया। किंतु साहित्य जगत में उनका सबसे ऐतिहासिक कार्य खड़ी बोली में सफल काव्य रचना करना था। उन्होंने गद्य और पद्य की भाषाओं के मध्य व्याप्त दूरी को समाप्त कर दोनों में एकरूपता स्थापित करने का युगांतरकारी कार्य किया। इसी कारण उन्हें ‘खड़ी बोली का प्रथम समर्थ कवि’ होने का गौरव प्राप्त है।
यद्यपि उनकी आरंभिक खड़ी बोली की कविताओं में कहीं-कहीं ब्रजभाषा के क्रियापदों का पुट मिलता है, परंतु उनका यह प्रयास इसलिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा ‘सरस्वती’ पत्रिका का संपादन संभालने (१९०३) से बहुत पहले ही पाठक जी ने खड़ी बोली में स्वतंत्र रचनाएँ लिखकर अपनी स्वच्छन्द और नूतन प्रवृत्ति का परिचय दे दिया था।
देश-प्रेम, समाज सुधार एवं प्रकृति का स्वतंत्र चित्रण
देश-प्रेम, समकालीन समाज सुधार तथा विशुद्ध प्रकृति-चित्रण उनकी कविताओं के मुख्य स्तंभ थे:
देश-प्रेम और राजभक्ति का समन्वय: उन्होंने अत्यंत मनोयोग और श्रद्धा से भारत भूमि का गौरव गान किया। उनकी कविताओं में जहाँ एक ओर ‘भारतोत्थान’ और ‘भारत प्रशंसा’ जैसी राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत रचनाएँ मिलती हैं, वहीं तत्कालीन युगीन परिस्थितियों (भारतेन्दु युगीन प्रभाव) के कारण ‘जॉर्ज वन्दना’ जैसी कविताओं में राजभक्ति का प्रदर्शन भी दिखाई देता है।
समाज सुधार की दृष्टि: समाज की विसंगतियों और कुरीतियों पर भी उनकी दृष्टि बराबर बनी रही। उनकी मर्मस्पर्शी कविता ‘बाल विधवा’ में उन्होंने समाज में विधवाओं की मर्मान्तिक व्यथा, सामाजिक उपेक्षा और उनके कारुणिक जीवन का अत्यंत सजीव व हृदयविदारक चित्रण किया है।
सर्वश्रेष्ठ प्रकृति-चित्रण: परंतु श्रीधर पाठक को सर्वाधिक और अभूतपूर्व सफलता प्रकृति-चित्रण में प्राप्त हुई। अपने समकालीन कवियों में उन्होंने सबसे अधिक मात्रा में और सबसे सुंदर प्रकृति-चित्रण किया। परिणाम की दृष्टि से ही नहीं, बल्कि भाव, कला और गुण की दृष्टि से भी वे आधुनिक काल के सर्वश्रेष्ठ प्रकृति-कवि स्वीकार किए जाते हैं। उन्होंने शास्त्रीय बन्धनों और उपमानों की रूढ़ि का परित्याग कर प्रकृति का आलम्बन रूप में स्वतंत्र, सजीव और मनोहारी चित्रण किया।
कुशल अनुवादक: अनमोल कृतियाँ
श्रीधर पाठक मौलिक कवि होने के साथ-साथ एक अत्यंत कुशल और सिद्धहस्त अनुवादक (Translator) भी थे। उन्होंने संस्कृत और अंग्रेज़ी की कालजयी पुस्तकों के जो पद्यानुवाद किए, वे आज भी हिन्दी साहित्य की धरोहर हैं। उन्होंने महाकवि कालिदास कृत ‘ऋतुसंहार’ का अत्यंत सुंदर अनुवाद किया। इसके अतिरिक्त, अंग्रेज़ी के प्रसिद्ध कवि ओलिवर गोल्डस्मिथ की कृतियों का उन्होंने जो काव्यानुवाद किया, वह इस प्रकार है:
’हरमिट’ (The Hermit) का ‘एकांतवासी योगी’ शीर्षक से अनुवाद।
’द डेज़र्टेड विलेज’ (The Deserted Village) का ‘ऊजड़ ग्राम’ शीर्षक से अनुवाद।
’द ट्रैवलर’ (The Traveler) का ‘श्रांत पथिक’ शीर्षक से खड़ी बोली में उत्कृष्ट अनुवाद।
प्रमुख मौलिक कृतियाँ:
१. ‘वनाष्टक’ (प्रकृति प्रेम का सुंदर निदर्शन)
२. ‘काश्मीर सुषमा’ (१९०४ – कश्मीर के नैसर्गिक सौंदर्य का अनुपम ग्रंथ)
३. ‘देहरादून’ (१९१५)
४. ‘भारत गीत’ (१९२८ – देशभक्ति पूर्ण कविताओं का संग्रह)
५. ‘गोपिका गीत’
६. ‘मनोविनोद’
७. ‘जगत सच्चाई-सार’ (दार्शनिक और वैचारिक विमर्श की कविता)
महाप्रयाण
हिन्दी भाषा को गद्य और पद्य के धरातल पर एकरूप करने वाले, प्रकृति के इस अनन्य उपासक और राष्ट्रभक्त कवि का निधन १३ सितम्बर, १९२८ को हुआ। उनका भौतिक शरीर भले ही पंचतत्त्व में विलीन हो गया, परंतु खड़ी बोली के रूप में जो भाषाई चेतना उन्होंने देश को दी, वह हिन्दी साहित्य के इतिहास में उन्हें सदैव अमर रखेगी।