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सरस्वती राजामणि: आज़ाद हिन्द फ़ौज की जांबाज और भारत की प्रथम महिला जासूस

​लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

 

​भूमिका: इतिहास के झरोखे से विस्मृत शौर्य

​मानव इतिहास का एक कड़वा सच यह भी है कि इसने राष्ट्र-वेदी पर सर्वस्व न्योछावर करने वाली वीरांगनाओं को वह स्थान और सम्मान नहीं दिया, जिसकी वे वास्तविक अधिकारी थीं। इतिहास के पन्ने पलटने पर अक्सर यह बोध होता है कि इसे एक विशेष दृष्टिकोण से ही लिखा गया, जिसके कारण देश की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों और सुख-सुविधाओं की आहुति देने वाली अनेक देवियाँ काल के कपाल पर कहीं गुम हो गईं。 भारत के स्वाधीनता संग्राम में भी ऐसी ही एक महागाथा आज़ाद हिन्द फ़ौज (INA) के समानांतर चलती है, जहाँ नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं को भी राष्ट्र-रक्षा की मुख्यधारा में शामिल किया था。 इसी आज़ाद हिन्द फ़ौज की अग्रिम पंक्ति में शामिल थीं—सरस्वती राजामणि। वे भारत की सबसे कम उम्र की और पहली महिला जासूस थीं, जिन्होंने मात्र १६ वर्ष की अल्पायु में अपनी बुद्धिमत्ता और अदम्य साहस से ब्रिटिश साम्राज्य की ईंट से ईंट बजा दी थी।

 

​प्रारंभिक जीवन एवं प्रगतिशील परिवेश

​सरस्वती राजामणि का प्राकट्य ११ जनवरी, १९२७ को म्यांमार (तत्कालीन बर्मा) के एक अत्यंत समृद्ध और कुलीन तमिल परिवार में हुआ था। उस रूढ़िवादी दौर के दृष्टिकोण से यदि देखा जाए, तो राजामणि का परिवार वैचारिक रूप से अत्यधिक राष्ट्रप्रेमी, प्रगतिशील और उदारवादी (लिबरल) था। उन्होंने अपनी पुत्री को पढ़ने, लिखने और वैश्विक परिवेश को समझने के वे तमाम अवसर प्रदान किए, जिनसे उस समय की अधिकांश भारतीय महिलाएँ पूर्णतः वंचित थीं। यही कारण था कि बचपन से ही उनके भीतर राष्ट्र के प्रति समर्पण और निर्भीकता के अंकुर फूटने लगे थे।

 

​महात्मा गांधी से भेंट: अहिंसा बनाम सशस्त्र क्रांति

​’फेमिनिज्म इन इंडिया’ (Feminism in India) के एक प्रामाणिक शोध-लेख के अनुसार, सरस्वती राजामणि के जीवन का एक अत्यंत रोचक प्रसंग राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से जुड़ा है。 एक बार जब महात्मा गांधी बर्मा प्रवास के दौरान राजामणि के पैतृक आवास पर पधारे, तब उन्होंने देखा कि अल्पायु बालिका राजामणि एकाग्रचित्त होकर बंदूक से निशानेबाजी का कड़ा अभ्यास कर रही थीं। गांधीजी ने आश्चर्यचकित होकर उनसे पूछा—”इस छोटी सी आयु में एक बच्ची को बंदूक चलाना सीखने की क्या आवश्यकता है?”

​इस पर राजामणि ने बिना किसी हिचकिचाहट के अत्यंत दृढ़तापूर्वक उत्तर दिया—”क्रूर अंग्रेजों को मार भगाने के लिए, और किसलिए?” चूँकि गांधीजी पूर्णतः अहिंसा के अनन्य पुजारी थे, अतः वे राजामणि को अहिंसा और हृदय-परिवर्तन का मार्ग समझाने लगे; परंतु राजामणि के बाल-मन में यह विचार दृढ़ हो चुका था कि स्वाधीनता केवल याचना से नहीं, बल्कि शक्ति के बल पर ही छीनी जा सकती है और अत्याचारी के विरुद्ध हिंसा का मार्ग अधिक प्रभावशाली होता है।

 

​आज़ाद हिन्द फ़ौज का सफ़र और नेताजी का विस्मय

​सन १९४३ में जब देश-नायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने बर्मा में भारतीय प्रवासियों को स्वतंत्रता संग्राम में तन, मन और धन से सहयोग करने का ओजस्वी आह्वान किया, तो १६ वर्षीय सरस्वती राजामणि के भीतर सोया हुआ राष्ट्रवाद उद्वेलित हो उठा। वे नेताजी के भाषण से इस कदर प्रभावित हुईं कि उन्होंने बिना किसी संकोच के अपने शरीर के सारे बहुमूल्य स्वर्ण आभूषण आज़ाद हिन्द फ़ौज के कोष में दान कर दिए।

​जब नेताजी को ज्ञात हुआ कि एक १६ साल की बालिका ने अपने सारे गहने दान कर दिए हैं, तो उन्हें इस बात पर सहसा विश्वास नहीं हुआ। वे स्वयं वस्तुस्थिति जानने राजामणि के घर पहुँच गए। वहाँ पहुँचकर जब नेताजी ने आभूषण वापस करने चाहे, तो राजामणि और उनके राष्ट्रभक्त पिता ने स्पष्ट रूप से कहा कि यह दान राष्ट्र के चरणों में समर्पित है। राजामणि के इसी अद्भुत जज्बे, अडिग संकल्प और कुशाग्र बुद्धि को देखकर नेताजी ने उन्हें आज़ाद हिन्द फ़ौज का हिस्सा बना लिया और उन्हें फ़ौज की खुफिया विंग में ‘सशस्त्र क्रांति की सबसे कम उम्र की पहली महिला जासूस’ नियुक्त किया।

 

​ब्रिटिश शिविर में गुप्त मिशन और अदम्य जासूसी

​’लाइव हिस्ट्री इंडिया’ (Live History India) के एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ के अनुसार, जब आज़ाद हिन्द फ़ौज इम्फाल और कोहिमा के मोर्चे पर उत्तर-पूर्वी भारत की ओर बढ़ रही थी, तब फ़ौज की विख्यात ‘रानी झांसी रेजिमेंट’ को उत्तरी बर्मा के रणनीतिक क्षेत्रों में तैनात किया गया था। इसी सैन्य टुकड़ी में से सरस्वती राजामणि और उनकी अटूट सहेली ‘दुर्गा’ को ब्रिटिश सेना के शिविरों से अत्यंत गोपनीय सूचनाएँ एकत्र करने के एक बेहद जोखिम भरे ‘सीक्रेट मिशन’ पर भेजा गया।

​इस मिशन को अंजाम देने के लिए दोनों वीरांगनाओं ने अपने लंबे सुंदर केश काट लिए और लड़कों का भेष धारण कर ब्रिटिश छावनी में प्रवेश कर गईं। वे वहाँ अंग्रेज़ सिपाहियों के कपड़े धोने, उनके जूते पॉलिश करने और शिविर के अन्य घरेलू काम करने वाले दासों के रूप में रहने लगीं। इस भेष में रहते हुए दोनों ने अपनी तीक्ष्ण बुद्धि के बल पर ब्रिटिश सेना की रणनीतियों, हथियारों के ठिकानों और आगामी आक्रमणों की कई अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण जानकारियाँ जुटाकर आज़ाद हिन्द फ़ौज तक पहुँचाईं।

 

​साहसिक फरारी और ‘डांसिंग गर्ल’ का स्वांग

​जासूसी के इसी सिलसिले में एक समय ऐसा आया, जब दुर्गा ब्रिटिश सैनिकों के संदेह का शिकार होकर पकड़ी गईं। सरस्वती राजामणि वहाँ से किसी तरह बच निकलने में सफल रहीं, परंतु वे अपनी सहेली को दुश्मन के चंगुल में मरता हुआ नहीं छोड़ सकती थीं। उन्होंने हार न मानते हुए तत्काल एक दुस्साहसिक योजना बनाई। उन्होंने एक ‘डांसिंग गर्ल’ (नर्तकी) का स्वांग रचा और ब्रिटिश सैन्य कैंप में दोबारा प्रवेश कर गईं।

​वहाँ उन्होंने अपनी बुद्धिमत्ता से अंग्रेज अधिकारियों को नशीला पदार्थ देकर बेहोश कर दिया और अत्यंत नाटकीय ढंग से अपनी साथी दुर्गा को उनके चंगुल से छुड़ा लिया। जब वे भाग रही थीं, तब ब्रिटिश सैनिकों की एक गोली राजामणि के पैर में आकर लगी। अत्यधिक घायल होने और पैर से लगातार रक्त बहने के बावजूद दोनों जांबाज लड़कियाँ अंग्रेजों के हाथ नहीं आईं और सुरक्षित अपनी रेजीमेंट में पहुँच गईं। इस गोलीबारी के कारण राजामणि का एक पैर हमेशा के लिए आंशिक रूप से अक्षम हो गया, परंतु उन्होंने इस अपंगता को अपनी कायरता नहीं, बल्कि राष्ट्र द्वारा दिया गया ‘शौर्य का सर्वोच्च सम्मान’ स्वीकार किया। स्वयं नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने उनकी इस अदम्य वीरता से गद्गद होकर उन्हें व्यक्तिगत रूप से शाबाशी की चिट्ठी लिखी और आधिकारिक तौर पर उन्हें ‘भारत की पहली महिला जासूस’ की उपाधि से अलंकृत किया।

 

​आज़ादी के बाद का उपेक्षित एवं संघर्षपूर्ण जीवन

​सन १९४७ में देश आज़ाद हुआ, परंतु आज़ाद हिन्द फ़ौज के सिपाहियों को वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे। सन १९५७ में सरस्वती राजामणि बर्मा से भारत लौट आईं और तमिलनाडु के त्रिची (तिरुचिरापल्ली) में अत्यंत सादगी से बस गईं। स्वतंत्र भारत में इस वीरांगना का जीवन अत्यंत कष्टप्रद और अभावों से भरा रहा। उन्हें भारत सरकार से स्वतंत्रता सेनानी की पेंशन पाने के लिए दफ्तरों के अनगिनत चक्कर काटने पड़े और भारी मशक्कत करनी पड़ी।

​बाद में वे चेन्नई (मद्रास) स्थानांतरित हो गईं और बर्मा में अपनी पैतृक संपत्ति को बेचकर जो भी थोड़ी-बहुत धनराशि मिली थी, उससे किसी तरह अपना जीवन-यापन करने लगीं। अंततः सन १९७१ में, देश की आज़ादी के पूरे २५ वर्ष बाद, भारत सरकार ने उन्हें और आईएनए के अन्य जीवित सैनिकों को स्वतंत्रता सेनानी पेंशन देना स्वीकार किया। इसके बावजूद उनका जीवन संघर्षमय बना रहा। सन २००५ तक वे चेन्नई के एक अत्यंत जर्जर और छोटे से एक कमरे के मकान में गुमनामी का जीवन जी रही थीं। वर्ष २००५ में मीडिया के माध्यम से जब उनकी इस दयनीय स्थिति का पता चला, तब तमिलनाडु सरकार ने हस्तक्षेप कर उन्हें चेन्नई में एक सरकारी आवास आवंटित किया।

 

​महासमाधि: एक अमर चेतना का अवसान

​१३ जनवरी, २०१८ को ९१ वर्ष की दीर्घायु में देश की इस महान और जांबाज वीरांगना सरस्वती राजामणि ने अपनी अंतिम सांस ली। उनके भौतिक शरीर के शांत होने के साथ ही भारतीय जासूसी और सशस्त्र क्रांति के इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय भले ही समाप्त हो गया, परंतु उनका त्याग, बलिदान और भेष बदलकर देश की रक्षा करने का पराक्रम आने वाली कई सदियों तक भारतीय नारी-शक्ति के गौरव को बढ़ाता रहेगा।

 

 

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