स्वामी विवेकानन्द: वेदांत चेतना और आधुनिक राष्ट्रवाद के कालजयी उद्घोषक
लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’
भूमिका: भारतीय संस्कृति के वैश्विक संवाहक
स्वामी विवेकानन्द एक ऐसे युवा संन्यासी के रूप में भारतीय इतिहास के आकाश पर उदित हुए, जिन्होंने अपनी बौद्धिक मेधा, अगाध ज्ञान और अध्यात्म के बल पर संपूर्ण विश्व में भारतीय संस्कृति की सुगन्ध बिखेरी। वे साहित्य, दर्शन और इतिहास के उद्भट विद्वान तथा एक युगांतरकारी आध्यात्मिक गुरु थे। उन्होंने रूढ़िवादिता में जकड़े हिंदू धर्म को गतिशील, व्यावहारिक और लोकोन्मुखी बनाया। एक सुदृढ़ वैश्विक सभ्यता के निर्माण के लिए उन्होंने आधुनिक मानव से पश्चिमी जगत के विज्ञान व भौतिकवाद को भारत की प्राचीन आध्यात्मिक संस्कृति से जोड़ने का महती आग्रह किया।
कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) के एक प्रबुद्ध कुलीन परिवार में जन्मे विवेकानन्द चिंतन, अगाध भक्ति, तार्किकता, भौतिक एवं बौद्धिक श्रेष्ठता के साथ-साथ शास्त्रीय संगीत की प्रतिभा का एक विलक्षण और विस्मयकारी संयोग थे। भारत में उनके इसी युगांतरकारी योगदान और युवाओं के प्रति उनकी प्रेरणा को अक्षुण्ण रखने के लिए उनके जन्म दिवस (१२ जनवरी) को प्रतिवर्ष ‘राष्ट्रीय युवा दिवस’ के रूप में संपूर्ण गरिमा के साथ मनाया जाता है।
प्राकट्य, परिचय एवं प्रारंभिक जीवन का द्वंद्व
इस महान महापुरुष का प्राकट्य १२ जनवरी, १८६३ को कलकत्ता में हुआ था। उनका मूल नाम ‘नरेंद्रनाथ दत्त’ था। उनके पिता विश्वनाथ दत्त पाश्चात्य सभ्यता और आधुनिक विचारों में गहरी आस्था रखने वाले एक प्रतिष्ठित अधिवक्ता (वकील) थे। नियति का कौतुक देखिए कि पाश्चात्य सभ्यता से प्रभावित घर में जन्म लेने वाला बालक नरेंद्रनाथ आगे चलकर स्वयं पाश्चात्य जगत् को भारतीय तत्वज्ञान और सनातन संस्कृति का अमर संदेश सुनाने वाला महान विश्व-गुरु बना।
विख्यात फ्रांसीसी मनीषी रोमां रोलां ने नरेंद्रनाथ के संबंध में अत्यंत सटीक लिखा है:
“उनका बचपन और युवावस्था के बीच का काल यूरोप के पुनरुज्जीवन-युग (Renaissance) के किसी कलाकार राजपुत्र के जीवन-प्रभात का स्मरण दिलाता है।”
बचपन से ही नरेंद्र के भीतर तीव्र आध्यात्मिक पिपासा और ईश्वर को जानने की व्याकुलता थी। सन १८८४ में पिता के आकस्मिक अवसान के पश्चात परिवार के भरण-पोषण का गुरुतर भार उनके युवा कंधों पर आ पड़ा। इस दौरान परिवार को गंभीर आर्थिक संकट और दुर्बल वित्तीय स्थिति का सामना करना पड़ा। स्वयं भूखे रहकर भी द्वार पर आए अतिथियों का सत्कार करना और उनके लिए भोजन की व्यवस्था करना नरेंद्र के जीवन की वह गौरव-गाथा है, जो उनके भावी संन्यासी रूप की आधारशिला बनी। नरेंद्र कुशाग्र मेधा के धनी थे, उन्होंने अल्पायु में ही भारतीय व पाश्चात्य दर्शनों का गहन अध्ययन कर लिया था। सत्य की खोज में वे तत्कालीन ‘ब्रह्मसमाज’ में भी गए, परंतु वहाँ उनकी वैचारिक और आध्यात्मिक जिज्ञासा शांत न हो सकी। तीव्र बुद्धि जब साधना के धरातल पर प्रत्यक्ष प्रमाण न पा सकी, तो एक समय के लिए नास्तिकता की ओर उन्मुख हो चली।
शिक्षा और पाश्चात्य दर्शन का प्रभाव
नरेंद्रनाथ ने सन १८७९ में १६ वर्ष की आयु में कलकत्ता से प्रवेश परीक्षा (मैट्रिक) प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। अपने शिक्षा काल के दौरान वे कॉलेज के सर्वाधिक लोकप्रिय, मेधावी और जिज्ञासु छात्र थे। इस दौरान उन पर पाश्चात्य विचारक हरबर्ट स्पेंसर के नास्तिकवाद और तार्किकता का गहरा प्रभाव पड़ा। स्नातक (बी.ए.) की उपाधि प्राप्त करने के बाद वे सामाजिक सुधारों के प्रति जागरूक ‘ब्रह्म समाज’ के सिद्धांतों से जुड़े, जो हिंदू धर्म में समयानुकूल सुधार लाने तथा उसे आधुनिक बनाने का प्रयास कर रहा था।
युगद्रष्टा रामकृष्ण परमहंस से भेंट और शक्तिपात
युवावस्था में नरेंद्र को पाश्चात्य दार्शनिकों के निरीश्वर भौतिकवाद (Atheistic Materialism) तथा ईश्वर के अस्तित्व में अटूट भारतीय विश्वास के कारण एक गहरे आंतरिक द्वंद्व से गुज़रना पड़ा। वे जिससे भी मिलते, एक ही तीखा प्रश्न करते—“क्या आपने ईश्वर को देखा है?” इस प्रश्न का उत्तर उन्हें तब मिला, जब दक्षिणेश्वर के दिव्य संत भगवान रामकृष्ण परमहंस रूपी जौहरी ने इस अनगढ़ रत्न को परखा।
उस दिव्य महापुरुष के केवल एक स्पर्श और आत्मीय सम्भाषण ने नरेंद्र के अंतःकरण को पूरी तरह बदल दिया। रामकृष्ण परमहंस ने उन्हें पूर्ण विश्वास दिलाया कि ईश्वर का अस्तित्व शाश्वत है और मनुष्य सत्य साधना से ईश्वर को पा सकता है। गुरुदेव ने सर्वव्यापी परमसत्य के रूप में ईश्वर की सर्वोच्च अनुभूति पाने में नरेंद्र का मार्गदर्शन किया। उन्होंने नरेंद्र को युगप्रवर्तक शिक्षा दी:
“मानवता की सेवा कभी ‘दान’ या ‘दया’ नहीं हो सकती, बल्कि वह तो प्राणिमात्र में निहित साक्षात् ईश्वर की सचेतन आराधना (शिव ज्ञाने जीव सेवा) होनी चाहिए।”
यह उपदेश स्वामी विवेकानंद के भावी जीवन का मुख्य दर्शन बन गया। कहा जाता है कि गुरु द्वारा किए गए उस आध्यात्मिक ‘शक्तिपात’ के कारण कई दिनों तक नरेंद्र एक अलौकिक समाधि और उन्मत्त अवस्था में रहे। गुरु ने उन्हें आत्मदर्शन करा दिया था। मात्र पच्चीस वर्ष की अवस्था में नरेंद्रनाथ ने काषाय (गेरुआ) वस्त्र धारण कर संन्यास की दीक्षा ली और वे ‘स्वामी विवेकानंद’ के रूप में लोक-विख्यात हुए। अब उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य अपने गुरु के आध्यात्मिक आलोक को जगत के अंधकार में भटकते प्राणियों के समक्ष उपस्थित करना था।
परिव्राजक काल: समूचे भारत का भ्रमण और राष्ट्र का पुनर्निर्माण
गुरुदेव रामकृष्ण परमहंस के महासमाधि लेने के पश्चात विवेकानंद ने स्वयं को हिमालय की कंदराओं में चिंतन रूपी आनंद सागर में डुबाने की चेष्टा की, लेकिन देश की पुकार उन्हें शांत बैठने न दे सकी। वे शीघ्र ही एकांत ध्यान त्यागकर भारत की कारुणिक निर्धनता, अशिक्षा और सामाजिक विसंगतियों से साक्षात् साक्षात्कार करने के लिए देश के भ्रमण पर निकल पड़े। लगभग छह वर्षों के इस अनवरत ‘परिव्राजक’ (भ्रमण) काल में उन्होंने पूरे भारत की पैदल यात्रा की। इस दौरान उन्हें कई दिनों तक भूखा रहना पड़ा और वे महलों के राजाओं से लेकर दलितों की झोपड़ियों तक, सभी के अतिथि रहे।
उनकी यह महान ऐतिहासिक यात्रा भारत के अंतिम छोर ‘कन्याकुमारी’ में जाकर समाप्त हुई। वहाँ समुद्र के मध्य स्थित शिला पर तीन दिनों तक गहन ध्यानमग्न रहने के पश्चात विवेकानंद को यह दिव्य बोध हुआ कि:
“राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के लिए नए युग के भारतीय वैरागियों को आगे आना होगा। जब तक देश के जनसाधारण की सुप्त दिव्यता का जागरण नहीं होगा और दलितों व वंचितों का उत्थान नहीं होगा, तब तक इस मृतप्राय देश में पुनः प्राणों का संचार असंभव है।”
शिकागो धर्म संसद (१८९३): विश्व पटल पर दिग्विजय
भारत के पुनर्निर्माण और सनातन धर्म की वास्तविक उदारता को विश्व पटल पर स्थापित करने के इसी आंतरिक लगाव ने उन्हें सन १८९३ में अमेरिका के शिकागो नगर में आयोजित ‘विश्व धर्म संसद’ में जाने के लिए प्रेरित किया। वे वहाँ बिना किसी औपचारिक आमंत्रण के गए थे, जिसके कारण प्रारंभ में उन्हें परिषद में प्रवेश की अनुमति मिलना ही अत्यंत कठिन हो गया था। पराधीन भारत का एक निर्धन संन्यासी क्या संदेश देगा—इस संकीर्ण भावना के कारण यूरोपीय आयोजकों द्वारा उन्हें समय न दिए जाने का भरपूर कुप्रयास किया गया। अंततः हार्वर्ड विश्वविद्यालय के एक उदार अमेरिकी प्रोफेसर (डॉ. जॉन हेनरी राइट) के सहयोग से उन्हें बोलने के लिए मात्र दो मिनट का समय मिला।
११ सितंबर, १८९३ का वह ऐतिहासिक दिन इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गया। जैसे ही स्वामी जी ने मंच पर आकर अपने ओजस्वी स्वर में “अमेरिकी बहनों और भाइयो!” (Sisters and brothers of America) कहकर सभा को संबोधित किया, वहाँ उपस्थित ७,००० प्रतिनिधियों ने करतल ध्वनि (तालियों) के साथ खड़े होकर उनका अभूतपूर्व स्वागत किया। कई मिनटों तक तालियाँ गूँजती रहीं। अपने संक्षिप्त किंतु अलौकिक व्याख्यान में उन्होंने पाश्चात्य जगत को सभी पंथों की अनिवार्यता, वेदान्त के सार्वभौमिक संदेश और सभी धर्मों में निहित मूल एकता से परिचित कराया।
इस व्याख्यान ने पाश्चात्य जगत के अहंकार को झकझोर कर रख दिया। अमेरिका के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों ने स्वीकार किया कि भारत जैसे आध्यात्मिक रूप से समृद्ध देश में ईसाई मिशनरियाँ भेजना मूर्खता है; भारत ही जगत का वास्तविक गुरु था और रहेगा। सन १८९७ तक वे अमेरिका और यूरोप में रहकर हिंदू धर्म की भव्यता और वेदान्त का प्रचार करते रहे। वे इतिहास के पहले ऐसे मनीषी थे, जिन्होंने विदेशों में भारतीय संस्कृति के प्रति हीनभावना को गौरव में बदल दिया।
व्यावहारिक वेदान्त और विज्ञान का समन्वय
स्वामी विवेकानंद केवल एक संत या दार्शनिक नहीं थे, बल्कि वे व्यावहारिक वेदान्त (Practical Vedanta) के प्रणेता थे। वे स्वयं कहा करते थे:
“मैं कोई तत्ववेत्ता नहीं हूँ, न ही कोई संत या दार्शनिक हूँ। मैं तो ग़रीब हूँ और ग़रीबों का अनन्य भक्त हूँ। मैं तो सच्चा महात्मा उसे ही कहूँगा, जिसका हृदय ग़रीबों के लिए तड़पता हो।”
उन्होंने उद्घोषणा की कि केवल अद्वैत वेदान्त के वैज्ञानिक धरातल पर ही आधुनिक विज्ञान और धर्म साथ-साथ चल सकते हैं। वेदान्त का मूल सिद्धांत—अवैयक्तिक ईश्वर की आधारभूत धारणा, सीमा के भीतर निहित असीम अनंत और ब्रह्मांड की समस्त दृश्य-अदृश्य वस्तुओं का पारस्परिक मौलिक संबंध—आधुनिक भौतिकी (Physics) के सर्वथा अनुकूल है। उन्होंने सभ्यता को ‘मनुष्य में पहले से ही विद्यमान दिव्यता के प्रतिरूप’ के रूप में परिभाषित किया। उनके इस तार्किक दृष्टिकोण ने पश्चिम के महान वैज्ञानिकों और बुद्धिजीवियों को गहरे तक प्रभावित किया, जिनमें वैज्ञानिक निकोला टेस्ला, सुप्रसिद्ध दार्शनिक विलियम जेम्स, दार्शनिक लियो टॉल्स्टॉय, अभिनेत्री सारा बर्नहार्ड और रोम्यां रोलां प्रमुख थे। सुप्रसिद्ध ब्रिटिश भारतविद ए. एल. बाशम ने विवेकानंद को इतिहास का वह प्रथम व्यक्ति माना, जिन्होंने पूर्व की आध्यात्मिक संस्कृति का पश्चिम को एक मित्रतापूर्ण और तार्किक प्रत्युत्तर दिया।
अंतरराष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद के मसीहा
स्वामी विवेकानंद केवल भारत की स्वतंत्रता और अस्मिता के ही प्रणेता नहीं थे, बल्कि वे आधुनिक विश्व के प्रथम ‘अंतरराष्ट्रवादी’ (Internationalist) भी थे। राष्ट्रों के बीच शांति, समन्वय और न्यायसंगत संबंध स्थापित करने के लिए उन्होंने ‘लीग ऑफ नेशन्स’ (League of Nations) की स्थापना से भी दशकों पूर्व, वर्ष १८९७ में ही अंतर्राष्ट्रीय संगठनों और संधियों का पुरज़ोर आह्वान किया था। यही कारण है कि महर्षि अरविंद घोष, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, रबींद्रनाथ टैगोर और महात्मा गांधी जैसी महान विभूतियों ने स्वामी विवेकानंद को ‘भारत की आत्मा को जाग्रत करने वाला’ और ‘भारतीय राष्ट्रवाद का वास्तविक मसीहा’ स्वीकार किया।
अतीत के झरोखे से: बीबीसी संवाददाता का संस्मरण
पश्चिम को योग, ध्यान और प्राणायाम से वैज्ञानिक रूप से परिचित कराने वाले स्वामी विवेकानंद की स्मृतियाँ आज भी अमेरिका के कई घरों में सुरक्षित हैं। न्यूयॉर्क में स्थित वह विख्यात भवन, जहाँ स्वामी विवेकानंद कुछ समय के लिए ठहरे थे और अपने वेदान्त दर्शन का लेखन किया था, कालांतर में बीबीसी (BBC) की सुप्रसिद्ध संवाददाता ऐमिली ब्युकानन का पैतृक घर बना। ऐमिली ब्युकानन लिखती हैं कि १९७० के दशक में उनके लिए उस पुराने घर, हवा में झूमते पेड़ों और पुरानी यादों के कोई विशेष मायने नहीं थे; परंतु जब उन्हें यह ज्ञात हुआ कि उनका यह घर भारत के सबसे प्रभावशाली और युगांतरकारी आध्यात्मिक शिक्षक की साधना स्थली रहा है, तो उनका नज़रिया पूरी तरह बदल गया।
ऐमिली की परदादी (जिन्हें स्वामी जी आदर से ‘जोई-जोई’ कहकर पुकारते थे) विवेकानंद की अनन्य शिष्या और मित्र थीं। उस रूढ़िवादी दौर में, जब श्वेत महिलाओं और अश्वेत भारतीयों का एक साथ यात्रा करना वर्जित माना जाता था, ब्युकानन परिवार ने रूढ़ियों को तोड़कर स्वामी जी को अपने घर आमंत्रित किया था और उनके ग्रंथों के प्रकाशन में वित्तीय व नैतिक सहायता प्रदान की थी। कैलिफ़ोर्निया के ‘रिट्रीट सेंटर’ में आज भी स्वामी जी का वह पावन शयनकक्ष और भोजन कक्ष एक धरोहर के रूप में सुरक्षित है।
संस्थागत स्थापनाएँ और अमर ग्रंथ
अपने विचारों को संस्थागत और व्यावहारिक रूप देने के लिए स्वामी विवेकानंद ने भारत और विदेशों में कई महत्वपूर्ण केंद्रों की स्थापना की:
रामकृष्ण मिशन (१ मई, १८९७): कलकत्ता में दरिद्र-नारायण की सेवा और आध्यात्मिक चेतना के प्रसार हेतु इसकी स्थापना की गई।
रामकृष्ण मठ, बेलूर (९ दिसंबर, १८९८): गंगा नदी के पावन तट पर संन्यासियों की साधना हेतु मुख्य केंद्र बनाया गया। स्वामी जी ने स्वयं इसके भव्य मंदिर की रूपरेखा तैयार की थी, जिसमें संसार के सभी प्रमुख धर्मों (हिंदू, बौद्ध, इस्लाम और ईसाई) की वास्तुकला का अनूठा समन्वय है।
मायावती अद्वैत आश्रम (१८९९): उनके ब्रिटिश शिष्य कैप्टन सर्वियर और उनकी पत्नी (माता क्रिस्टीन) के सहयोग से उत्तराखंड के चम्पावत (हिमालय) में ‘मायावती अद्वैत आश्रम’ की स्थापना की गई, जो पूर्वी और पश्चिमी शिष्यों का एक पवित्र सम्मिलन केंद्र बना। उत्तराखंड के अल्मोड़ा और चम्पावत क्षेत्र आज भी उनकी विश्राम स्थली के रूप में राष्ट्रीय धरोहर हैं।
कालजयी ग्रंथ: युवाओं और साधकों का मार्ग प्रशस्त करने के लिए स्वामी जी ने ‘कर्मयोग’, ‘राजयोग’, ‘भक्तियोग’ तथा ‘ज्ञानयोग’ जैसे कालजयी और व्यावहारिक ग्रंथों की रचना की, जो आज भी वैश्विक युवा जगत का मार्गदर्शन कर रहे हैं। कन्याकुमारी के समुद्र में निर्मित उनका भव्य स्मारक ‘विवेकानंद रॉक मेमोरियल’ आज भी राष्ट्र के प्रति उनकी महानता की अमर कहानी कह रहा है।
महासमाधि: एक दैदीप्यमान नक्षत्र का अंत
स्वामी विवेकानंद के ओजस्वी व्याख्यानों और निरंतर यात्राओं ने उनके शरीर को शिथिल कर दिया था। जीवन के अंतिम दिनों में वे दमा (Asthma) और शर्करा (Diabetes) जैसी गंभीर शारीरिक व्याधियों से घिर चुके थे। उन्होंने पहले ही यह भविष्यवाणी कर दी थी कि ये बीमारियाँ उन्हें ४० वर्ष की आयु पार नहीं करने देंगी। अपने जीवन के अंतिम दिन (४ जुलाई, १९०२) को उन्होंने बेलूर मठ में शुक्ल यजुर्वेद की विस्तृत व्याख्या की और शिष्यों से कहा:
“एक और विवेकानंद चाहिए, यह समझने के लिए कि इस विवेकानंद ने अब तक क्या किया है।”
अपनी नित्य दिनचर्या के अनुसार उन्होंने प्रात: काल दो-तीन घंटे गहन ध्यान किया। ४ जुलाई, १९०२ की सायं बेलूर मठ के अपने कक्ष में वे पुनः ध्यानमग्न अवस्था में बैठ गए और इसी महासमाधि की स्थिति में इस महान आत्मा ने अपने नश्वर शरीर का परित्याग कर दिया। उनके शिष्यों और अनुयायियों ने उनकी स्मृति में बेलूर मठ में एक भव्य मंदिर बनवाया और समूचे विश्व में उनके विचारों के प्रसार के लिए १३० से अधिक केंद्रों की स्थापना की।