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रिसालदार बदलू सिंह: प्रथम विश्व युद्ध में अदम्य शौर्य और सर्वोच्च बलिदान की अमर गाथा
लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’
भूमिका: वैश्विक पटल पर भारतीय पराक्रम के प्रतीक
भारतीय सैन्य इतिहास ऐसे जांबाज योद्धाओं की गाथाओं से समृद्ध है, जिन्होंने अपनी मातृभूमि के गौरव और सैन्य मर्यादा की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति हंसते-हंसते दे दी। ऐसे ही एक अद्वितीय और अप्रतिम योद्धा थे—रिसालदार बदलू सिंह। वे प्रथम विश्व युद्ध के उन गिने-चुने और महान भारतीय सैनिकों में से एक थे, जिन्हें रणभूमि में उनके सर्वोच्च बलिदान, अदम्य साहस और बेमिसाल नेतृत्व के लिए ब्रिटिश साम्राज्य के सर्वोच्च सैन्य सम्मान “विक्टोरिया क्रॉस” (Victoria Cross) से मरणोपरांत नवाजा गया था। बदलू सिंह ने न केवल भारतीय जाट समुदाय की युगीन वीरता को सिद्ध किया, बल्कि वैश्विक पटल पर भारतीय थलसेना की धाक भी जमाई।
प्राकट्य, परिचय एवं सैन्य जीवन
रिसालदार बदलू सिंह का जन्म १३ जनवरी, १८७६ को अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत (वर्तमान हरियाणा के झज्जर जिले) में स्थित ‘धकला’ नामक ऐतिहासिक ग्राम में एक प्रतिष्ठित हिंदू जाट परिवार में हुआ था। देश सेवा के जज्बे से ओतप्रोत बदलू सिंह भारतीय थलसेना की २९वीं लांसर्स (Lancers) रेजिमेंट से संबद्ध थे, जो युद्धकाल में ‘१४वीं मुर्रेज जाट लांसर्स’ के रूप में कार्यरत थी।
प्रथम विश्व युद्ध (१९१४-१९१८) के दौरान, जब वैश्विक महाशक्तियों के बीच भीषण संघर्ष चल रहा था, तब बदलू सिंह के सैन्य दस्ते को सर्वप्रथम यूरोप के ‘फ्रांस’ मोर्चे पर भेजा गया था। वहाँ की भीषण और विपरीत परिस्थितियों में अपनी युद्ध-कुशलता का लोहा मनवाने के बाद, उन्हें मध्य-पूर्व (मिडिल ईस्ट) के ‘फिलिस्तीन’ मोर्चे पर तैनात किया गया, जहाँ ऑटोमन साम्राज्य के खिलाफ ब्रिटिश मित्र देशों का एक निर्णायक संघर्ष चल रहा था।
जॉर्डन नदी का तट: वह ऐतिहासिक शौर्य गाथा
२३ सितंबर, १९१८ की वह ऐतिहासिक सुबह इतिहास के पन्नों में अमर होने जा रही थी। फिलिस्तीन के मोर्चे पर जॉर्डन नदी के तट और समरिए ग्राम के मध्य स्थित दुश्मन (ऑटोमन सेना) के एक अत्यंत सुदृढ़ और रणनीतिक रूप से मजबूत ठिकाने पर कब्जा करने का उत्तरदायित्व बदलू सिंह के स्क्वॉड्रन (सैन्य दस्ते) को सौंपा गया था।
जैसे ही भारतीय जांबाज दुश्मन की चौकी के निकट पहुँचे, अचानक बाईं ओर स्थित एक छोटी पहाड़ी से मशीनगनों की अंधाधुंध गोलाबारी शुरू हो गई। उस पहाड़ी पर दुश्मन की लगभग २०० इनफैंट्री (पैदल सेना) और घातक मशीनगनें तैनात थीं, जो बदलू सिंह के पूरे स्क्वॉड्रन को अपनी चपेट में ले रही थीं। यदि तुरंत कोई कदम न उठाया जाता, तो पूरा दस्ता भारी क्षति का शिकार हो जाता।
अद्भुत रण-कौशल और आत्मोत्सर्ग
ऐसी भीषण और जानलेवा परिस्थिति में भी रिसालदार बदलू सिंह ने पल भर की भी हिचकिचाहट नहीं दिखाई। अपनी जान की परवाह न करते हुए, उन्होंने तत्काल एक साहसिक निर्णय लिया। उन्होंने अपने साथ मात्र छह अन्य वीर सिपाहियों को लिया और पूरी गति के साथ पहाड़ी पर स्थित दुश्मन के उस मजबूत और घातक ठिकाने की ओर सीधे हमला बोल दिया।
बिना किसी सुरक्षा कवच के, सामने से आ रही गोलियों की बौछार के बीच वे पहाड़ी की चोटी पर जा पहुँचे। जब वे अपने एक हाथ से दुश्मन की एक मुख्य मशीनगन को छीन रहे थे और उस पर कब्जा कर रहे थे, उसी क्षण वे गंभीर रूप से घायल हो गए। अत्यधिक रक्तस्राव होने के बावजूद उनका हौसला कम नहीं हुआ। उनके इस अप्रतिम और सिंह जैसी दहाड़ वाले घातक आक्रमण से दुश्मन सेना इस कदर भयभीत हो गई कि बदलू सिंह के वीरगति को प्राप्त होने से पहले ही वहाँ तैनात सभी मशीनगनधारियों और २०० इनफैंट्री सैनिकों ने आत्मसमर्पण कर दिया। उनके इस अभूतपूर्व प्रयास और साहस के कारण उनका पूरा स्क्वॉड्रन एक निश्चित तबाही से सुरक्षित बच गया।
वीरगति और चिरस्थायी सम्मान
रणभूमि के उसी पावन मोर्चे पर, जहाँ यह वीर योद्धा गिरा, वहीं सैन्य सम्मान के साथ उनकी अंतिम क्रिया संपन्न कर दी गई। यद्यपि उनका पार्थिव शरीर सुदूर मिस्र की धरती में समा गया, परंतु उनकी कीर्ति सदैव के लिए अमर हो गई। मिस्र की राजधानी कैरो (काहिरा) स्थित ‘हेलियोपोलिस वार सेमेट्री’ के ‘हेलियोपोलिस मेमोरियल’ पर उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित किया गया, जो आज भी भारतीय सैनिकों के वैश्विक बलिदान की गवाही देता है।
लंदन गजट (London Gazette) ने २७ नवंबर, १९१८ को उनकी इस प्रशस्ति और अद्भुत साहस का विवरण पूरी दुनिया के सामने प्रकाशित किया। वर्तमान में उनका मूल “विक्टोरिया क्रॉस” पदक लंदन के विख्यात ‘इम्पीरियल वार म्यूजियम’ में प्रतिष्ठित ‘लॉर्ड ऐशक्रॉफ्ट संग्रह’ (Lord Ashcroft Collection) का एक अत्यंत गौरवशाली अंग है।
निष्कर्ष: इतिहास के पन्नों में अमर ‘शौर्यत्व’
अश्विनी भाई, रिसालदार बदलू सिंह का जीवन और उनका सर्वोच्च बलिदान हमें यह याद दिलाता है कि वीरता किसी भूगोल या सीमाओं की मोहताज नहीं होती। एक सच्चे सैनिक के लिए कर्तव्य और अपने साथियों की रक्षा ही सर्वोपरि धर्म होता है। जॉर्डन नदी के तट पर जाट रेजीमेंट के इस योद्धा ने जो पराक्रम दिखाया, वह आने वाली पीढ़ियों को सदैव राष्ट्र-रक्षा और अदम्य साहस की प्रेरणा देता रहेगा।