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राम! राम! राम!

पिछले चार भागों को छोड़कर अगर हम पेरियार की “सच्ची रामायण” को तटस्थ दृष्टि से देखें, तो यह महर्षि वाल्मीकि की रामायण का कोई वैकल्पिक संस्करण नहीं है, बल्कि यह एक ‘राजनैतिक विखंडन’ (Political Deconstruction) है। पेरियार ने रामायण के विशाल सागर से केवल उन बूंदों को चुना जिन्हें वे विषैला सिद्ध कर सकें, जबकि उस सागर के अमृत की उन्होंने जानबूझकर अनदेखी की। इस पुस्तक की गहन समीक्षा के लिए हमें निम्नलिखित स्तंभों पर विचार करना होगा:

 

क. साक्ष्यों का चयनात्मक उपयोग (Selective Cherry-picking)

पेरियार की “सच्ची रामायण” की सबसे बड़ी बौद्धिक कमजोरी यह है कि उन्होंने एक ‘शोधकर्ता’ की तरह नहीं, बल्कि एक ‘अभियोजक’ (Prosecutor) की तरह रामायण को पढ़ा। उन्होंने केवल उन्हीं साक्ष्यों को जनता के सामने रखा जो उनके पहले से निर्धारित ‘राम-विरोधी’ निष्कर्ष की पुष्टि करते थे। इसे ही अकादमिक भाषा में ‘चेरी-पिकिंग’ कहा जाता है।

मानवीय द्वंद्व बनाम दैवीय मर्यादा

पेरियार ने राम के जीवन के उन प्रसंगों को केंद्र में रखा जहाँ राम एक मनुष्य के रूप में कठिन परिस्थितियों या सामाजिक मर्यादाओं के जाल में फँसे नजर आते हैं:

बाली वध: उन्होंने इसे छिपकर किया गया ‘विश्वासघात’ बताया।

सीता परित्याग: उन्होंने इसे एक स्त्री के प्रति ‘क्रूरता’ के रूप में चित्रित किया।

शम्बूक वध: इसे उन्होंने ‘जातिगत दमन’ का प्रतीक बना दिया।

समीक्षा: छोड़े गए प्रसंग और उनका सत्य

यदि पेरियार का उद्देश्य सत्य का अन्वेषण होता, तो वे उन प्रसंगों को कभी नहीं छिपाते जो राम को ‘समावेशी और समरस’ महापुरुष सिद्ध करते हैं। राम के चरित्र में ‘आर्य-विजेता’ होने का कोई चिह्न नहीं मिलता, क्योंकि:

१. सामाजिक समरसता (निषादराज और शबरी): यदि राम उत्तर के अहंकारी विजेता होते, तो वे वनवास के समय सबसे पहले निषादराज गुह (जो समाज के वंचित वर्ग से थे) को गले नहीं लगाते। वाल्मीकि रामायण के अनुसार, राम ने उन्हें अपना ‘प्राण-प्रिय मित्र’ माना। इसी प्रकार, मतंग ऋषि के आश्रम में शबरी (जो वनवासी समाज से थीं) के प्रतीक्षा और प्रेम को स्वीकार करना यह दर्शाता है कि राम के लिए ‘भक्ति’ श्रेष्ठ थी, ‘वर्ण’ नहीं।

२. अहिल्या उद्धार: गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या का उद्धार यह सिद्ध करता है कि राम ने केवल पुरुषों का नहीं, बल्कि समाज द्वारा उपेक्षित और तिरस्कृत स्त्री शक्ति का भी सम्मान पुन: स्थापित किया।

३. वानर और रीछ सेना: पेरियार ने वानरों को ‘पशु’ या ‘गुलाम’ की तरह पेश किया, जबकि राम ने उन्हें सेनापति बनाया और हनुमान जी को अपने छोटे भाई भरत के समान सम्मान दिया। यह ‘क्षेत्रीय वर्चस्व’ की नहीं, बल्कि ‘सहयोग और सह-अस्तित्व’ की कथा है।

निष्कर्ष

पेरियार ने इन प्रसंगों को इसलिए छोड़ दिया क्योंकि ये उनके उस ‘विभाजनकारी’ सिद्धांत की जड़ें काट देते थे, जिसमें वे राम को एक बाहरी हमलावर सिद्ध करना चाहते थे। सत्य यह है कि राम ने जाति, वर्ण और क्षेत्र की सीमाओं को जीतकर भारत को एक सांस्कृतिक सूत्र में पिरोया था। पेरियार की समीक्षा इस अधूरेपन के कारण केवल एक ‘राजनैतिक दुष्प्रचार’ बनकर रह गई।

 

ख. पात्रों का चरित्र हनन (Character Assassination)

पेरियार की “सच्ची रामायण” की सबसे विवादास्पद पद्धति यह रही है कि उन्होंने रामायण के आदर्श पात्रों के चरित्र पर लांछन लगाकर उन्हें ‘दानवी’ स्वरूप देने का प्रयास किया, जबकि वास्तविक अपराधियों को ‘नायक’ के रूप में महिमामंडित किया। किसी भी साहित्य की ऐसी समीक्षा जिसमें नैतिक मूल्यों को पूरी तरह उलट दिया जाए, वह समीक्षा नहीं बल्कि ‘वैचारिक विद्वेष’ कहलाती है।

राम और सीता पर आक्षेप

पेरियार ने अपनी पुस्तक में मर्यादा पुरुषोत्तम राम के चरित्र पर प्रहार करते हुए उन्हें “धूर्त, कामी और क्रूर” राजा के रूप में चित्रित करने की कुचेष्टा की। उन्होंने माँ सीता के पावन चरित्र पर भी ऐसे अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया जो न केवल एक भक्त के लिए, बल्कि किसी भी सभ्य समाज के लिए असहनीय हैं।

पेरियार का तर्क: उनका दावा था कि राम ने केवल अपने वंशवादी अहंकार के लिए युद्ध किया और सीता मात्र एक निमित्त थीं।

सत्य: राम का संपूर्ण जीवन ‘त्याग’ की पराकाष्ठा है। जिस व्यक्ति ने एक वचन के लिए राज्य का त्याग कर दिया और चौदह वर्ष तक वनवासी की तरह जीवन बिताया, उसे ‘कामी’ या ‘सत्तालोभी’ कहना सत्य का गला घोंटने जैसा है। सीता का चरित्र भारतीय नारी के स्वाभिमान और शक्ति का प्रतीक है, जिसे पेरियार ने केवल उत्तर-दक्षिण की राजनीति की बलि चढ़ा दिया।

रावण का अनुचित महिमामंडन

हैरानी की बात यह है कि पेरियार ने रावण द्वारा सीता के अपहरण को एक “वीरतापूर्ण” और “न्यायोचित” कार्य बताया।

पेरियार का तर्क: उनका कहना था कि रावण ने अपनी बहन ‘शूर्पणखा’ के अपमान (नाक काटने) का बदला लेने के लिए सीता का अपहरण किया, अतः वह एक ‘महान भाई’ और ‘न्यायप्रिय राजा’ था।

समीक्षा: साहित्य की किसी भी विधा या नैतिकता के किसी भी पैमाने पर ‘पर-स्त्री का अपहरण’ न्यायोचित नहीं हो सकता।

यदि रावण इतना ही महान था, तो उसने अपनी पत्नी मंदोदरी और भाई विभीषण की सलाह क्यों नहीं मानी?

उसने बलपूर्वक सीता को अपने पास रखने का प्रयास किया, जो स्पष्ट रूप से एक अपराधी की मानसिकता है।

पेरियार ने रावण के उस अहंकार और अत्याचार की पूरी तरह अनदेखी कर दी, जिससे स्वयं लंका की जनता और ऋषि-मुनि त्रस्त थे।

निष्कर्ष

पेरियार का उद्देश्य ऐतिहासिक सत्य को खोजना नहीं, बल्कि सनातनी प्रतीकों के प्रति घृणा उत्पन्न करना था। उन्होंने जानबूझकर ‘खलनायक’ को ‘नायक’ बनाया ताकि वे हिंदू समाज की नैतिक और सांस्कृतिक नींव को हिला सकें। जब आप किसी समाज के आदर्शों (राम-सीता) का चरित्र हनन कर देते हैं, तो वह समाज अपने सांस्कृतिक गौरव से कट जाता है। पेरियार की यह समीक्षा केवल एक नकारात्मक प्रलाप है, जो रामायण के ‘त्याग’, ‘मर्यादा’ और ‘लोक-कल्याण’ वाले मूल दर्शन को समझने में पूरी तरह विफल रही है।

 

ग. ‘आर्य-द्रविड़’ का भ्रामक चश्मा (The Lens of Racial Conflict)

पेरियार की “सच्ची रामायण” का संपूर्ण आधार एक कल्पित भौगोलिक और नस्लीय विभाजन पर टिका है। उन्होंने रामायण को एक पवित्र आध्यात्मिक ग्रंथ के बजाय ‘उत्तर भारतीय आर्यों’ द्वारा ‘दक्षिण भारतीय द्रविड़ों’ पर किए गए आक्रमण और सांस्कृतिक दमन की कहानी के रूप में प्रस्तुत किया।

पेरियार का तर्क: एक कृत्रिम विभाजन

पेरियार ने यह स्थापना की कि राम उत्तर के ‘आर्य’ शोषक थे और रावण दक्षिण का ‘द्रविड़’ रक्षक। उनके अनुसार, रामायण की रचना का उद्देश्य ही दक्षिण की सभ्यता को नीचा दिखाना था। उन्होंने ‘आर्य’ और ‘द्रविड़’ को दो कट्टर दुश्मन नस्लों के रूप में चित्रित किया।

समीक्षा: ऐतिहासिक और शास्त्रीय खंडन

साहित्यिक और ऐतिहासिक साक्ष्य पेरियार के इस नस्लीय सिद्धांत को पूरी तरह नकारते हैं:

१. रावण की वंशावली: वाल्मीकि रामायण के अनुसार रावण ‘द्रविड़’ नहीं था। उसके पिता विश्रवा उत्तर के ऋषि थे और वह स्वयं वेदों का परम ज्ञाता ब्राह्मण था। रावण की माता कैकसी थी। यदि रावण ‘ब्राह्मण’ था, तो पेरियार का उसे ‘द्रविड़ नायक’ कहना उनके अपने ही ब्राह्मण-विरोधी आंदोलन के विरोधाभास को उजागर करता है।

२. सांस्कृतिक अंतर्संबंध: यदि यह उत्तर बनाम दक्षिण का युद्ध था, तो रावण उत्तर के देवता भगवान शिव का परम भक्त क्यों था? और राम ने लंका विजय के बाद दक्षिण के ही एक पात्र विभीषण को राजा क्यों बनाया? ये तथ्य सिद्ध करते हैं कि युद्ध ‘नस्ल’ या ‘क्षेत्र’ के लिए नहीं, बल्कि ‘अधर्म’ के विरुद्ध ‘धर्म’ की स्थापना के लिए था।

३. DNA और आधुनिक विज्ञान: वर्तमान विज्ञान और आनुवंशिक (Genetics) शोध यह स्पष्ट कर चुके हैं कि ‘आर्य’ और ‘द्रविड़’ दो अलग-अलग नस्लें नहीं हैं। भारत के उत्तर और दक्षिण के लोगों का मूल DNA एक ही है। पेरियार ने जिस ‘आर्य आक्रमण’ के सिद्धांत को आधार बनाया, वह वास्तव में ब्रिटिश इतिहासकारों (जैसे मैक्स मूलर) द्वारा भारत को बांटने के लिए गढ़ा गया एक राजनीतिक हथियार था।

सांस्कृतिक सेतु का विनाश

पेरियार ने जानबूझकर उन कड़ियों को काट दिया जो भारत को जोड़ती थीं। राम ने उत्तर (अयोध्या) से दक्षिण (रामेश्वरम) तक की यात्रा करके भारत को एक भौगोलिक और सांस्कृतिक इकाई बनाया था। अगस्त्य मुनि जैसे ऋषि उत्तर से दक्षिण गए और उन्हें दक्षिण में ‘तमिल भाषा का पिता’ माना गया। पेरियार ने इन गौरवशाली संबंधों को ‘सांस्कृतिक साम्राज्यवाद’ का नाम देकर दक्षिण भारतीय मानस में जहर घोलने का काम किया।

निष्कर्ष

पेरियार की समीक्षा एक ऐसे चश्मे से की गई थी जिसमें केवल ‘विभेद’ दिखाई देता था। उन्होंने अध्यात्म की विशालता को राजनीति की संकीर्ण गली में धकेल दिया। राम और रावण का संघर्ष ‘अहंकार’ और ‘मर्यादा’ का संघर्ष था, न कि उत्तर और दक्षिण का। पेरियार का यह ‘नस्लीय चश्मा’ सत्य को देखने में पूरी तरह असमर्थ रहा।

 

घ. दक्षिण भारत की अपनी ‘राम-परंपरा’ की अनदेखी (Ignoring the Indigenous Ram-Tradition of South India)

पेरियार का एक अत्यंत उग्र और भ्रामक दावा यह था कि रामायण तमिल संस्कृति का अपमान है और यह उत्तर भारतीयों द्वारा दक्षिण पर लादी गई एक सांस्कृतिक बेड़ी है। उन्होंने रामायण को ‘विदेशी’ या ‘बाहरी’ विचार के रूप में चित्रित किया। परंतु, दक्षिण भारत का हज़ारों वर्षों का साहित्यिक और धार्मिक इतिहास पेरियार के इस दावे को पूरी तरह झुठला देता है।

तमिल साहित्य और कम्ब रामायण का गौरव

पेरियार की “सच्ची रामायण” से लगभग ८०० वर्ष पूर्व, १२वीं ईस्वी कम्ब ने ‘इरामावतारम’ (कम्ब रामायण) की रचना की थी।

समीक्षा: कम्ब ने राम को किसी “उत्तर भारतीय हमलावर” के रूप में नहीं, बल्कि तमिल संस्कृति के उच्चतम नैतिक मूल्यों के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया। कम्ब रामायण में राम का चरित्र इतना सौम्य और समावेशी है कि उसने पूरे दक्षिण भारत को भक्ति के सूत्र में बांध दिया। पेरियार ने अपनी राजनीति के लिए इस महान तमिल गौरवशाली विरासत की पूरी तरह अनदेखी कर दी।

भक्ति आंदोलन और अलवार-नायनमार संत

दक्षिण भारत ‘भक्ति आंदोलन’ की जन्मस्थली रहा है। ६वीं से ९वीं शताब्दी के दौरान दक्षिण के अलवार संतों (जैसे कुलशेखर अलवार) ने अपनी तमिल रचनाओं (प्रबंधम) में राम के प्रति अगाध श्रद्धा व्यक्त की है।

सत्य: यदि रामायण तमिल विरोधी होती, तो ये तमिल संत राम को अपना आराध्य क्यों मानते? कुलशेखर अलवार तो राम की भक्ति में इतने लीन थे कि वे स्वयं को राम का दास कहते थे। पेरियार ने इन संतों के योगदान और जनता की आस्था को “ब्राह्मणवादी षड्यंत्र” कहकर खारिज कर दिया, जो कि करोड़ों दक्षिण भारतीयों की भावनाओं का अपमान था।

स्थापत्य और लोक कलाओं में राम

दक्षिण भारत के मंदिरों का स्थापत्य (Architecture) रामकथा के बिना अधूरा है। हम्पी के हज़ारा राम मंदिर से लेकर तमिलनाडु के भव्य तंजावुर मंदिरों तक, पत्थर-पत्थर पर रामायण की कहानियाँ उकेरी गई हैं।

समीक्षा: पेरियार ने यह तर्क दिया कि ये मंदिर ‘गुलामी’ के प्रतीक हैं। परंतु, वास्तविकता यह है कि ये मंदिर और यहाँ होने वाली लोक कलाएं (जैसे कर्नाटक का यक्षगान या केरल की कूडियट्टम) यह सिद्ध करती हैं कि रामकथा दक्षिण की मिट्टी में रची-बसी है। यह कोई ‘थोपा हुआ’ विचार नहीं, बल्कि दक्षिण की अपनी अंतरात्मा का हिस्सा है।

 

निष्कर्ष

पेरियार की समीक्षा केवल एक ‘नकारात्मक प्रलाप’ थी, क्योंकि उन्होंने दक्षिण भारत की उस ‘राम-परंपरा’ को जानबूझकर नजरअंदाज किया जो वाल्मीकि से भी अधिक कोमल और स्थानीय रंगों में रंगी हुई थी। उन्होंने तमिल पहचान (Tamil Identity) को राम-विरोध से जोड़ने की कोशिश की, जबकि सत्य यह है कि राम के बिना तमिल साहित्य और संस्कृति का इतिहास अधूरा है। पेरियार की वैचारिक संकीर्णता ने उन्हें एक ऐसे महापुरुष का विरोधी बना दिया जो वास्तव में उत्तर और दक्षिण के बीच का सबसे मजबूत सांस्कृतिक सेतु (Bridge) थे।

 

सच्ची रामायण का सच (उपसंहार) भाग–६

 

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