महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर, भगवान शिव की महिमा को समर्पित विशेष रचना प्रस्तुत है। इसे दो भागों में विभाजित किया है: दार्शनिक लेख और काव्यात्मक प्रवाह।
१. दार्शनिक लेख– शिव: शून्यता और पूर्णता का मिलन
शिव केवल एक आकृति नहीं, बल्कि एक अवस्था हैं। ‘शिव’ का शाब्दिक अर्थ है— “जो नहीं है”। यह उस शून्य (Void) का प्रतीक है जहाँ से सारा ब्रह्मांड उत्पन्न होता है और अंततः जिसमें विलीन हो जाता है।
महाशिवरात्रि का आध्यात्मिक महत्व ‘अंधकार’ के उत्सव में निहित है। जहाँ प्रकाश एक सीमित घटना है, वहीं अंधकार असीम और सर्वव्यापी है। शिव इसी अनंत शून्यता के अधिपति हैं।
लय और सृजन: शिव ‘संहारकर्ता’ कहे जाते हैं, लेकिन यह संहार नकारात्मक नहीं है। यह पुराने के अंत और नए के आगमन की अनिवार्य प्रक्रिया है। बिना रूपांतरण के विकास संभव नहीं।
अर्धनारीश्वर: शिव का यह स्वरूप पुरुष और प्रकृति, यानी ऊर्जा और चेतना के संतुलन का दर्शन देता है। यह बताता है कि पूर्णता केवल विपरीत तत्वों के सामंजस्य में ही है।
वैराग्य और गृहस्थ: श्मशान में वास करने वाले औघड़ दानी भी शिव हैं और हिमालय पर परिवार के साथ रहने वाले महादेव भी। यह दर्शन हमें सिखाता है कि संसार में रहते हुए भी उससे निर्लिप्त कैसे रहा जाए।
महाशिवरात्रि वह रात है जब प्रकृति मनुष्य को उसके उच्चतम आयाम (Consciousness) से जुड़ने में सहायता करती है। यह स्वयं के भीतर के ‘शिवत्व’ को जागृत करने का क्षण है।
२. काव्यात्मक प्रवाह– चंद्रमौलि की गूँज
शिखर हिमालय, शांत निरंतर,
भस्म रमी है तन पर सुंदर।
जटा जूट में गंगा सोहे,
तीन लोक की माया मोहे।
डमरू बाजे, डम-डम-डम-डम,
नाचे शिव कर तांडव अनुपम।
विष का प्याला कंठ उतारा,
नीलकंठ कहलाया प्यारा।
चंद्र भाल पर, सर्प गले में,
अमृत-विष का मेल रगे में।
अघोर रूप, अति शांत मुखमंडल,
भस्म आरती, गूँजे भूमंडल।
शून्य वही है, पूर्ण वही है,
सत्य वही है, शिव ही वही है।
काल भी जिसका दास खड़ा है,
मृत्युंजय वो सबसे बड़ा है।
इस शिवरात्रि, मन मंदिर कर लें,
कण-कण में हम शिव को भर लें।
महाशिवरात्रि की आपको हार्दिक शुभकामनाएँ!