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भारतीय अर्थव्यवस्था का सफर मात्र आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह नीतियों, राजनीतिक इच्छाशक्ति और वैश्विक परिस्थितियों के बीच के तालमेल की एक महागाथा है। एक निष्पक्ष शोध की दृष्टि से यदि हम भारत के आर्थिक इतिहास को देखें, तो इसे चार प्रमुख राजनीतिक-आर्थिक कालखंडों में विभाजित किया जा सकता है।

 

भारतीय अर्थव्यवस्था के ऐतिहासिक कालखंड: एक विश्लेषण

क. प्रथम कालखंड (१९४७ – १९९०): नेहरूवादी समाजवाद और ‘लाइसेंस राज’

​यह युग राष्ट्र निर्माण और आत्मनिर्भरता के संकल्प का था। नव-स्वतंत्र भारत के पास संसाधनों की भारी कमी थी, इसलिए सरकार ने ‘कमांड इकोनॉमी’ का रास्ता चुना, जहाँ महत्वपूर्ण उद्योगों पर राज्य का नियंत्रण था।

​योगदान :

​औद्योगिक और शैक्षिक नींव: इसी काल में IITs, IIMs और AIIMS जैसे संस्थानों की स्थापना हुई। ‘भाखड़ा नांगल’ जैसे विशाल बांधों और स्टील प्लांटों (भिलाई, राउरकेला) ने देश को बुनियादी मजबूती दी।

​वैज्ञानिक प्रगति की शुरुआत: डॉ. होमी जहांगीर भाभा और विक्रम साराभाई के नेतृत्व में परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष अनुसंधान (ISRO की नींव) का कार्य शुरू हुआ, जिसने आज भारत को महाशक्ति बनाया है।

​हरित क्रांति (Green Revolution): १९६० के दशक में लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी के नेतृत्व में भारत ने खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भरता हासिल की। यह भुखमरी से जूझते देश के लिए एक बड़ी उपलब्धि थी।

​बैंकिंग समावेशन: १९६९ में बैंकों के राष्ट्रीयकरण से बैंकिंग सेवाएं पहली बार आम जनता और ग्रामीण इलाकों तक पहुँचीं।

​चुनौतियां :

​नौकरशाही का मकड़जाल (License-Quota Raj): व्यापार शुरू करने या उत्पादन बढ़ाने के लिए भी सरकारी अनुमति (लाइसेंस) की आवश्यकता होती थी। इसने उद्यमशीलता का गला घोंट दिया और भ्रष्टाचार को जन्म दिया।

​’हिंदू विकास दर’ का अभिशाप: विकास दर औसतन ३.५% के आसपास बनी रही। वैश्विक स्तर पर अन्य एशियाई देश (जैसे दक्षिण कोरिया, ताइवान) तेजी से आगे निकल गए, जबकि भारत अपनी ही बंद नीतियों में उलझा रहा।

​प्रतिस्पर्धा का अभाव: आयात पर भारी शुल्क और विदेशी निवेश पर रोक के कारण भारतीय उत्पाद वैश्विक गुणवत्ता के मुकाबले पिछड़ गए। उपभोक्ताओं के पास सीमित विकल्प थे (जैसे दशक भर तक एक ही ब्रांड की कार या स्कूटर का इंतज़ार)।

​सार्वजनिक क्षेत्र का बोझ: कई PSUs (सार्वजनिक उपक्रम) घाटे में चलने लगे, जो सरकारी खजाने पर बोझ बन गए। निजी क्षेत्र को संदेह की दृष्टि से देखा गया, जिससे निवेश का माहौल खराब हुआ।

​१९९१ का आर्थिक संकट: विदेशी मुद्रा भंडार इतना कम हो गया कि भारत के पास केवल दो सप्ताह के आयात का पैसा बचा था। राजकोषीय घाटा अनियंत्रित हो गया, जिसने अंततः भारत को अपना सोना गिरवी रखने और उदारीकरण अपनाने पर मजबूर किया।

ख. द्वितीय कालखंड (१९९१ – २००४): उदारीकरण का उदय (राव-मनमोहन और वाजपेयी युग)

१९९१ में पी.वी. नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह ने ‘एलपीजी’ (उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण) की शुरुआत की। इसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने बुनियादी ढांचे (स्वर्णिम चतुर्भुज) और निजीकरण को गति दी।

योगदान:

​लाइसेंस राज की समाप्ति: उद्योगों को सरकारी नियंत्रण से मुक्ति मिली, जिससे ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ की शुरुआत हुई।

​विदेशी मुद्रा भंडार में वृद्धि: १९९१ के संकट (जहाँ सोना गिरवी रखना पड़ा था) के बाद भारत का विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से बढ़ा।

​आईटी और टेलीकॉम क्रांति: वाजपेयी युग में नई टेलीकॉम नीति ने संचार के क्षेत्र में भारत की सूरत बदल दी। ‘स्वर्णिम चतुर्भुज’ ने देश के चार महानगरों को जोड़कर रसद (Logistics) की लागत कम की।

​चुनौतियां:

​असुरक्षित घरेलू उद्योग: वैश्वीकरण के कारण भारतीय छोटे और मध्यम उद्योगों (MSMEs) को अचानक बड़ी विदेशी कंपनियों से सीधा मुकाबला करना पड़ा, जिसके लिए वे तैयार नहीं थे। इससे कई स्थानीय उद्योग बंद हो गए।

​कृषि क्षेत्र की उपेक्षा: सारा ध्यान सेवा (Services) और उद्योग क्षेत्र पर केंद्रित हो गया, जिससे कृषि क्षेत्र की विकास दर धीमी पड़ गई। किसान कर्ज के जाल में फंसने लगे, जो आगे चलकर ग्रामीण संकट का कारण बना।

​बढ़ती आर्थिक असमानता: उदारीकरण ने शहरों में एक नया ‘संपन्न मध्यम वर्ग’ तो पैदा किया, लेकिन अमीर और गरीब के बीच की खाई पहले की तुलना में अधिक चौड़ी होने लगी। विकास का लाभ समान रूप से ग्रामीण अंचलों तक नहीं पहुँच पाया।

​नौकरियों रहित विकास (Jobless Growth): विकास दर तो ६-८% रही, लेकिन उस अनुपात में रोजगार का सृजन नहीं हुआ, क्योंकि विकास का मुख्य चालक आईटी और तकनीक आधारित सेवाएं थीं, जो केवल कुशल श्रमिकों की मांग करती थीं।

​हर्षद मेहता और केतन पारेख घोटाले: शेयर बाजार के खुलेपन और नियामक संस्थाओं (जैसे SEBI) के शुरुआती दौर में होने के कारण बड़े वित्तीय घोटाले हुए, जिसने बैंकिंग प्रणाली और आम निवेशकों के भरोसे को हिला दिया।

ग. तृतीय कालखंड (2004 – 2014): उपभोक्तावाद और अधिकार आधारित विकास

​उदारीकरण के बाद का यह दौर वैश्विक तरक्की और घरेलू कल्याणकारी योजनाओं के मिश्रण का था।

​योगदान:

​मजबूत GDP वृद्धि: इस कालखंड के शुरुआती वर्षों में भारत ने ८–९% की दर से वृद्धि की। वैश्विक मंदी (२००८) के बावजूद भारतीय बैंकिंग तंत्र स्थिर रहा।

​सामाजिक सुरक्षा कानून: मनरेगा (MNREGA), सूचना का अधिकार (RTI) और शिक्षा का अधिकार (RTE) जैसे कानूनों ने नागरिकों को सशक्त बनाया और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नकदी का प्रवाह बढ़ाया।

​मध्यम वर्ग का विस्तार: शहरीकरण और आईटी सेवाओं के विस्तार से एक बड़े क्रय-शक्ति वाले मध्यम वर्ग का उदय हुआ।

​चुनौतियां:

​नीतिगत पंगुता (Policy Paralysis): कार्यकाल के दूसरे हिस्से में बड़े घोटालों (2G, कोयला) के आरोपों और राजनीतिक दबाव के कारण महत्वपूर्ण आर्थिक निर्णय रुक गए।

​उच्च मुद्रास्फीति (Inflation): खाद्य और ईंधन की कीमतें बढ़ने से आम आदमी की बचत पर बुरा असर पड़ा।

​बैंकिंग क्षेत्र में NPA की शुरुआत: ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ के कारण बैंकों ने बिना सोचे-समझे बड़े कर्ज दिए, जो बाद में ‘बैड लोन्स’ (NPA) में बदल गए और आज भी एक समस्या बने हुए हैं।

घ. ​चतुर्थ कालखंड (2014 – वर्तमान): संरचनात्मक सुधार और डिजिटल क्रांति

​यह दौर ‘सुधार’ को ‘डिजिटल’ और ‘डिलीवरी’ से जोड़ने का है।

​योगदान:

​डिजिटल इंडिया: UPI और जनधन-आधार-मोबाइल (JAM) ट्रिनिटी ने भ्रष्टाचार को कम किया और सीधे जनता के खातों में पैसा पहुँचाया।

​ऐतिहासिक सुधार: GST (एक राष्ट्र-एक कर) और दिवाला कानून (IBC) ने व्यापारिक जटिलताओं को कम किया।

​बुनियादी ढांचा: सड़कों, हवाई अड्डों और रेलवे के आधुनिकीकरण पर रिकॉर्ड पूंजीगत व्यय (Capex) किया जा रहा है।

​चुनौतियां:

​निजी निवेश की सुस्ती: सरकार के भारी निवेश के बावजूद, निजी क्षेत्र अभी भी उस गति से निवेश नहीं कर रहा है जिसकी अपेक्षा थी।

​बेरोजगारी और कौशल अंतर: युवा आबादी के लिए पर्याप्त उच्च-गुणवत्ता वाले रोजगार पैदा करना और उन्हें नई तकनीक (AI/Automation) के लिए तैयार करना एक बड़ी चुनौती है।

​आय की असमानता: रिपोर्टों के अनुसार, विकास का लाभ सबसे ऊपरी स्तर पर अधिक केंद्रित हो रहा है, जिससे असमानता की खाई बढ़ रही है।

वर्तमान स्थिति: दुनिया का उभरता हुआ केंद्र

आज भारत विश्व की ५वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना हुआ है। हमारा विदेशी मुद्रा भंडार स्थिर है और मुद्रास्फीति कई विकसित देशों की तुलना में बेहतर नियंत्रित है। भारत अब केवल ‘सर्विसेज’ (IT) पर निर्भर नहीं है, बल्कि सेमीकंडक्टर, रक्षा उत्पादन और नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) का वैश्विक केंद्र बनने की ओर अग्रसर है।

 

भविष्य का पथ: २०३०, २०४० और २०५०

आगामी २०-२५ वर्षों में भारत की स्थिति का शोध-आधारित अनुमान:

२०३० (तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था): अगले ५-६ वर्षों में भारत जापान और जर्मनी को पीछे छोड़कर ३री सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। यहाँ ‘मेक इन इंडिया’ का प्रभाव स्पष्ट दिखेगा।

२०४७ (विकसित भारत): स्वतंत्रता के १००वें वर्ष तक भारत का लक्ष्य ३० ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनना है। इस दौरान भारत की प्रति व्यक्ति आय में भारी उछाल आएगा।

२०५० और उसके बाद: एचएसबीसी और गोल्डमैन सैक्स जैसी संस्थाओं के अनुसार, २०५०-२०७५ के बीच भारत अमेरिका को पीछे छोड़कर चीन के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बन सकता है।

 

वे कंपनियां जो ‘न्यू इंडिया’ का मार्ग प्रशस्त करेंगी

आने वाले दशकों में भारत की आर्थिक रीढ़ ये क्षेत्र और कंपनियां होंगी:

ऊर्जा एवं सस्टेनेबिलिटी : रिलायंस इंडस्ट्रीज, अडाणी ग्रीन, टाटा पावर – भारत को ऊर्जा आयातक से निर्यातक बनाएंगे।

तकनीक एवं चिप निर्माण : टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स, वेदांता – इलेक्ट्रॉनिक्स में आत्मनिर्भरता।

बुनियादी ढांचा और निर्माण : L&T, JSW स्टील – वैश्विक स्तर के इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण।

डिजिटल एवं फिनटेक :  Jio, NPCI (UPI), जोमैटो – डिजिटल इकोनॉमी का लोकतंत्रीकरण।

रक्षा उत्पादन : HAL, मझगांव डॉक – रक्षा निर्यात में भारत का दबदबा।

 

निष्कर्ष: सरकारों के सहयोग का विवेचन

शोध का सारांश यह है कि भारत की सफलता किसी एक सरकार की नहीं, बल्कि एक ‘क्रमिक उत्तराधिकार’ (Succession of Policy) की परिणति है:

१. नेहरू-गांधी युग ने वह शैक्षणिक और औद्योगिक ‘बेस’ दिया जिस पर बाद की इमारतें बनीं।

२. राव-मनमोहन युग ने बेड़ियाँ खोलीं और निजी प्रतिभा को मौका दिया।

३. वाजपेयी युग ने कनेक्टिविटी और सड़कों के जरिए देश को जोड़ा।

४. मोदी युग ने उस ढांचे को ‘डिजिटल’ किया और विनिर्माण  को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लायक बनाया।

आगामी २० वर्षों में भारत की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह अपने ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ यानी अपनी युवा आबादी को कितना कुशल बना पाता है और ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ को जमीनी स्तर तक कितना ले जा पाता है।

भारत अब ‘उभरती हुई अर्थव्यवस्था’ नहीं है, बल्कि वह अब वैश्विक आर्थिक व्यवस्था का एक ‘अनिवार्य स्तंभ’ बन चुका है।

 

 

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