images (40)

ओखिल चंद्र सेन: एक संक्षिप्त परिचय

ओखिल चंद्र सेन (Okhil Chandra Sen) २०वीं सदी की शुरुआत में बंगाल के एक साधारण रेल यात्री थे। इतिहास में उनके निजी जीवन के बारे में बहुत अधिक विवरण उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन १९०९ में साहिबगंज रेल डिविजन (बिहार) के तत्कालीन बाबू (रेलवे अधिकारियों) को लिखा गया उनका एक पत्र उनके नाम को अमर कर गया। वे एक जागरूक और मुखर नागरिक थे, जिन्होंने अपनी व्यक्तिगत असुविधा और अपमान को चुपचाप सहने के बजाय व्यवस्था को चुनौती दी। उनका यह पत्र आज भी नई दिल्ली के ‘राष्ट्रीय रेल संग्रहालय’ (National Rail Museum) में ऐतिहासिक धरोहर के रूप में सहेज कर रखा गया है।

 

ओखिल चंद्र सेन का मूल पत्र (The Original Letter)

Dear Sir,

I am arrive by passenger train Ahmedpur station and my belly is too much swelling with jackfruit. I am therefore went to privy. Just I doing the nuisance the guard making whistle blow for train to go off and I am running with lota in one hand and dhoti in the next when I am fall over and expose all my shocking to man and female on the platform. I am got leaved Ahmedpur station. This too much bad, if passenger go to privy can guard not wait five minutes for passenger? I am pray your honor to impose big fine on that guard for public benefit otherwise I am making to publish in the Paper.

Your faithful servant,

Okhil Chandra Sen

 

पत्र का हिंदी अनुवाद

प्रिय महोदय,

मैं पैसेंजर ट्रेन से अहमदपुर स्टेशन पहुँचा। कटहल खाने की वजह से मेरा पेट बहुत ज़्यादा फूल रहा था (पेट खराब था)। इसलिए मैं शौच के लिए गया। अभी मैं निवृत्त हो ही रहा था कि गार्ड ने ट्रेन चलने के लिए सीटी बजा दी। मैं एक हाथ में लोटा और दूसरे हाथ से धोती पकड़े हुए भागा, लेकिन मैं प्लेटफॉर्म पर गिर पड़ा और वहाँ मौजूद सभी पुरुषों और महिलाओं के सामने मेरी भारी फजीहत (शर्मिंदगी) हो गई। मेरी ट्रेन अहमदपुर स्टेशन से छूट गई।

यह बहुत ही बुरी बात है। यदि कोई यात्री शौच के लिए जाता है, तो क्या गार्ड यात्री के लिए पाँच मिनट का इंतज़ार नहीं कर सकता? मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि जनता की भलाई के लिए उस गार्ड पर भारी जुर्माना लगाया जाए, अन्यथा मैं इस बात को समाचार पत्रों में प्रकाशित करवा दूँगा।

आपका वफादार सेवक,

ओखिल चंद्र सेन

 

व्यवस्था पर करारी चोट: एक समीक्षात्मक छोटी रचना

ओखिल चंद्र जी के इस ऐतिहासिक कदम और भारतीय रेल के उस दौर की विडंबना को रेखांकित करती एक लघु काव्य रचना:

 

लोटा, धोती और वो हुकूमत

 

एक हाथ में लोटा थामे, एक हाथ से धोती,

दौड़ रही थी साख देश की, आँख व्यवस्था रोती।

कटहल की वो एक अतिशय, पेट पे भारी आफ़त,

मगर न समझी दर्द मुसाफ़िर, निर्दयी गोरी हुकूमत।

 

आधी-अधूरी छूट गई जो, अहमदपुर की वो सीटी,

प्लेटफ़ॉर्म पर गिरकर बिखरी, मर्यादा की माटी।

एक आम इंसान की बेबसी, जब काग़ज़ पर उतरी,

शाही दफ़्तर की चौखट पर, बनकर चिनगारी बिखरी।

 

अफ़सरशाहों का वो गौरव, एक पत्र ने तोड़ा,

पाँच मिनट का पहरा बदला, रुख़ गाड़ी का मोड़ा।

साहिबगंज के बाबू चौंके, लंदन तक थी हलचल,

एक लोटे की ताकत ने तब, बदल दिया था हर पल।

 

आज खड़े डिब्बों में जो हम, पाते हैं आराम,

ओखिल बाबू के उस खत को, शत-शत है प्रणाम।

 

पत्र के बाद हुकूमत की हलचल और ऐतिहासिक सुधार (निष्कर्ष)

ओखिल चंद्र सेन जी का यह पत्र महज़ एक शिकायत नहीं, बल्कि औपनिवेशिक सत्ता के मुंह पर आम भारतीय की बेबसी और गुस्से का एक ऐसा जीवंत दस्तावेज़ था जिसे अंग्रेज़ अधिकारी नज़रअंदाज़ नहीं कर सके। इस पत्र के मिलते ही साहिबगंज रेल डिविजन और तत्कालीन ‘रेलवे बोर्ड’ (Railway Board) में खलबली मच गई।

शुरुआत में भले ही इसे एक मजाकिया और अजीबोगरीब शिकायत के रूप में देखा गया, लेकिन जल्द ही ब्रिटिश हुकूमत को यह अहसास हो गया कि लंबी दूरी की यात्राओं में बुनियादी सुविधाओं का न होना उनके ‘सभ्य और आधुनिक’ होने के दावों पर एक बड़ा धब्बा है। साथ ही, ओखिल बाबू द्वारा पत्र को ‘समाचार पत्रों में छपवाने’ की चेतावनी ने आग में घी का काम किया, क्योंकि अंग्रेज़ सरकार उस दौर में भारतीय मीडिया में अपनी थू-थू नहीं चाहती थी।

 

प्रशासनिक कदम और स्थायी सुधार:

इस पत्र के संज्ञान में आते ही रेलवे प्रशासन ने तुरंत अहमदपुर स्टेशन के उस गार्ड से जवाब-तलब किया। इसके तुरंत बाद, रेल महानिदेशक (Director General of Railways) ने एक ऐतिहासिक आदेश जारी किया। वर्ष १९०९-१९१० के बीच, ‘ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे’ और अन्य रेल कंपनियों को अपनी सभी लंबी दूरी की ट्रेनों के तीसरे दर्जे (Third Class) के डिब्बों में अनिवार्य रूप से शौचालय (Privy) बनाने के निर्देश दिए गए। इससे पहले शौचालय की सुविधा केवल प्रथम श्रेणी (First Class) के गिने-चुने यूरोपीय यात्रियों के लिए ही उपलब्ध थी।

 

निष्कर्ष:

इस प्रकार, एक साधारण से दिखने वाले ‘लोटे और धोती’ के प्रसंग ने भारतीय रेल के इतिहास में सबसे बड़ा व्यावहारिक और मानवीय सुधार कर डाला। आज जब हम भारतीय रेल के आधुनिक डिब्बों, वातानुकूलित श्रेणियों और जैव-शौचालय (Bio-Toilets) जैसी तकनीकों का लाभ उठाते हैं, तो हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि इस सहूलियत के पीछे अहमदपुर स्टेशन पर गिरी ओखिल बाबू की मर्यादा और उनकी वह बेबाक कलम थी, जिसने सोई हुई हुकूमत को जगाकर रख दिया था।

 

 

भारतीय रेल का इतिहास: १८५३ की पहली ट्रेन से लेकर आज तक के विस्मयकारी तथ्य

 

 

About The Author

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *