फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ का ‘मैला आँचल’: लोक-संस्कृति की सोंधी महक या सनातन संस्थाओं पर आघात का आंचल?
बिहार के पूर्णिया ज़िले के ‘मेरीगंज’ गाँव की पृष्ठभूमि पर लिखे गए इस उपन्यास में स्वतंत्रता के आसपास के ग्रामीण भारत का चित्रण है। लेकिन इस अंचल का ‘आँचल’ मैला कैसे हुआ और इसे किसने मैला दिखाया—इसका सच तीन प्रमुख बिंदुओं में स्पष्ट होता है:
१. कबीरमठ का प्रसंग: धार्मिक/सांस्कृतिक संस्थाओं का अश्लील चरित्र-हनन
उपन्यास में गाँव के कबीरमठ को केंद्र बनाकर रेणु ने जो दृश्य प्रस्तुत किए हैं, वे प्रगतिशील लेखकों की सनातन-विरोधी मानसिकता का क्लासिक उदाहरण हैं।
प्रोजेक्टेड प्लॉट: मठ का महंत साहब (साहबदास) और उसका चेला रामदास—दोनों ही व्यभिचारी, कामुक, और संपत्ति के भूखे दिखाए गए हैं। मठ की सेविका ‘लछमी’ (लक्ष्मी) को भोग की वस्तु बनाया जाता है। महंत की मृत्यु के बाद रामदास और सेवकों में गद्दी और लछमी के लिए घिनौना संघर्ष होता है।
पोस्टमार्टम: वामपंथी साहित्य का यह पेटेंट फ़ॉर्मूला है कि गाँव या समाज की किसी भी पारंपरिक, धार्मिक या सांस्कृतिक संस्था को यौन-शोषण, ढोंग और भ्रष्टाचार की मंडी बनाकर पेश किया जाए। क्या भारतीय ग्रामीण जीवन में मठ-मंदिर केवल वासना के केंद्र थे? कबीरपंथ जैसी परंपरा—जिसने समाज को जोड़ने और कुरीतियों पर प्रहार करने का काम किया—उसके केंद्र को पूरी तरह पतित दिखाकर रेणु ने पाठक के मन में पारंपरिक धार्मिक संरचनाओं के प्रति केवल घृणा और जुगुप्सा (Disgust) पैदा की।
२. कम्युनिस्ट/सोशलिस्ट पात्रों का ‘मसीहा’ रूप (बावनदास और बासुदेव)
गाँव में एक तरफ जहाँ पारंपरिक समाज, जातिगत पंचायतें और धार्मिक मठ पूरी तरह भ्रष्ट, अज्ञानी और शोषक दिखाए गए हैं, वहीं दूसरी तरफ क्रांति का बिगुल बजाने वाले पात्रों का चित्रण देखिए:
बावनदास और सोशलिस्ट/कम्युनिस्ट कार्यकर्ता: बावनदास को एक त्यागी, निस्वार्थ, आदर्शवादी और लगभग ‘संत’ की तरह प्रस्तुत किया गया है। वह पूरे गाँव के उद्धार का बीड़ा उठाता है।
डॉक्टर प्रशांत: शहर से आया प्रगतिशील, आधुनिक और वैज्ञानिक सोच वाला डॉक्टर—जो गाँव की अज्ञानता के अंधेरे में ज्ञान का दीप जलाता है।
पोस्टमार्टम: यह पूरी तरह से ‘वामपंथी मसीहा-सिंड्रोम’ (Leftist Savior Complex) है। रेणु यह स्थापित करना चाहते हैं कि ग्रामीण भारत का अपना कोई धर्म, ज्ञान या विवेक नहीं है; उनका उद्धार केवल वामपंथी/समाजवादी क्रांति और आधुनिक धर्मनिरपेक्ष बौद्धिक ही कर सकते हैं।
३. ‘जातिगत विद्वेष’ को स्वाभाविक और शाश्वत दिखाना
‘मेरीगंज’ गाँव विभिन्न जातियों के टोले (राजपूत टोला, कायस्थ टोला, यादव टोला, तांती टोला) में बँटा हुआ है।
प्रोजेक्टेड प्लॉट: रेणु ने गाँव के हर टोले को एक-दूसरे के खिलाफ षड्यंत्र रचते, कटुता फैलाते और एक-दूसरे को नीचा दिखाते हुए चित्रित किया है।
पोस्टमार्टम: ग्रामीण भारत में जातियों के बीच जहाँ परस्पर निर्भरता (Interdependence) और ‘सह-अस्तित्व’ का ताना-बाना भी था, उसे पूरी तरह गायब कर दिया गया। रेणु ने गाँव को केवल संकीर्णता और विद्वेष की प्रयोगशाला बनाकर पेश किया, जिससे यह संदेश जाए कि पारंपरिक भारतीय समाज में ‘समरसता’ संभव ही नहीं है और इसे उखाड़ फेंकना ही एकमात्र विकल्प है।
निष्कर्ष (The Bottom Line)
‘मैला आँचल’ केवल आंचलिकता का सौंदर्य-शास्त्र नहीं है, बल्कि आंचलिकता की आड़ में परोसा गया प्रगतिशील एजेंडा है।
इस उपन्यास ने:
१. कबीरमठ जैसे पारंपरिक-धार्मिक केंद्रों का चरित्र-हनन करके उन्हें वासना का अड्डा सिद्ध किया।
२. वामपंथी/सोशलिस्ट विचारकों और पात्रों को गाँव के एकमात्र ‘उद्धारक’ के रूप में स्थापित किया।
३. भारतीय ग्रामीण समाज के ताने-बाने को केवल जातिगत घृणा और अज्ञानता का ढेर बनाकर दिखाया।
तमस का पोस्टमार्टम: विभाजन का ऐतिहासिक सच या हिंदू अपराधबोध गढ़ने का वामपंथी षड्यंत्र?