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कमलेश्वर का ‘कितने पाकिस्तान’: वैश्विक शांति का महाकाव्य या इस्लामी कट्टरवाद का छद्म-सेक्युलर बचाव?

 

‘कितने पाकिस्तान’ में कमलेश्वर का मुख्य दावा है कि “पाकिस्तान” केवल एक देश नहीं, बल्कि इंसानी दिलों में विभाजन, संकीर्णता और नफरत का प्रतीक है। परंतु जब लेखक इस नफरत के ‘कारणों’ की तलाश करता है, तो उसका तराज़ू पूरी तरह एकतरफ़ा और पूर्वाग्रही हो जाता है।

 

१. आक्रांताओं का मानवीकरण और ‘इक्वल एट्रोसिटी’ (False Equivalence) का खेल

कमलेश्वर की काल्पनिक अदालत की सबसे बड़ी चालाकी यह है कि वे भारत पर हुए क्रूर इस्लामी आक्रमणों (जैसे बाबर, महमूद गजनवी, तैमूर, औरंगजेब) की तुलना अन्य सामान्य राजनीतिक घटनाओं या सनातन समाज की आंतरिक कमियों से कर देते हैं।

प्रोजेक्टेड प्लॉट: औरंगजेब और बाबर जैसे क्रूर शासकों को केवल “समय की परिस्थितियों के शिकार” या “राजनीतिक महत्वाकांक्षी” के रूप में पेश करना, जबकि उनके धार्मिक जिहाद, मंदिरों के विध्वंस और लाखों सनातनियों के कत्लेआम को गौण कर देना।

पोस्टमार्टम: यह वामपंथी-सेक्युलर खेमे का पेटेंट पैंतरा है जिसे ‘फॉल्स इक्विवेलेंस’ (False Equivalence) कहते हैं। जब आप एक ओर लाखों निर्दोषों की हत्या करने वाले और धार्मिक स्थलों को ढहाने वाले आक्रांताओं को रखते हैं, और दूसरी ओर पीड़ित समाज की स्वाभाविक प्रतिक्रिया को ‘कट्टरता’ घोषित कर दोनों को एक ही तराज़ू में तौलते हैं, तो आप वास्तव में आक्रांता के अपराधों पर पर्दा डाल रहे होते हैं। कमलेश्वर ने यही छद्म-सेक्युलर न्याय परोसा।

 

२. ‘पाकिस्तान’ बनने का दोष भारत/हिंदू समाज पर मढ़ने का षड्यंत्र

उपन्यास का मूल उद्देश्य विभाजन की त्रासदी का निष्पक्ष विश्लेषण करना होना चाहिए था, परंतु कमलेश्वर का झुकाव स्पष्ट दिखता है।

प्रोजेक्टेड प्लॉट: विभाजन के लिए केवल जिन्ना या मुस्लिम लीग की ‘द्वि-राष्ट्र सिद्धांत’ (Two-Nation Theory) और कट्टर धार्मिक पहचान को उत्तरदायी न मानकर, हिंदू महासभा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और सनातन समाज की चेतना को भी बराबर का गुनहगार ठहराना।

पोस्टमार्टम: यह इतिहास के तथ्यों के साथ घोर छल है। १९४० के लाहौर प्रस्ताव से लेकर प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस (Direct Action Day) तक, विभाजन की नींव केवल और केवल इस्लामी पृथकतावाद पर टिकी थी। परंतु कमलेश्वर ने अपनी कलम की बाजीगरी से यह स्थापित करने की कोशिश की कि अगर बहुसंख्यक सनातन समाज अपनी पहचान की बात न करता, तो शायद पाकिस्तान न बनता! यह पीड़ित को ही दोषी ठहराने (Victim Blaming) की कुटिल चेतना है।

 

३. इतिहास का अति-सरलीकरण और सांस्कृतिक निरस्त्रीकरण

उपन्यास में इतिहास के सदियों पुराने संघर्षों को केवल “सत्ताओं का खेल” बताकर खारिज किया गया है।

प्रोजेक्टेड प्लॉट: कमलेश्वर यह संदेश देने की कोशिश करते हैं कि आम जनता (चाहे हिंदू हो या मुस्लिम) हमेशा निर्दोष और भाईचारे वाली थी, और सारा ज़हर केवल राजनेताओं और धार्मिक गुरुओं ने घोला।

पोस्टमार्टम: यह विचार सुनने में बहुत मीठा और ‘गंगा-जमुनी तहज़ीब’ का आदर्श लगता है, परंतु यह समाज को सांस्कृतिक और वैचारिक रूप से निरस्त्र करने की अफीम है। यह विचार जनता को उस वैचारिक और धार्मिक कट्टरता की पहचान करने से रोकता है जिसने बार-बार भारत के टुकड़े किए। इतिहास के यथार्थ को अनदेखा करके झूठी भावुकता परोसना ही इस उपन्यास की सबसे बड़ी असफलता है।

 

निष्कर्ष (The Bottom Line)

कमलेश्वर का ‘कितने पाकिस्तान’ निष्पक्ष साहित्य नहीं, बल्कि छद्म-सेक्युलरिज़्म का वैचारिक प्रचार-ग्रंथ है।

इस उपन्यास ने:

१. विदेशी आक्रांताओं और जिहादी मानसिकता के जघन्य अपराधों का मानवीकरण करके उनका बचाव किया।

२. भारत के विभाजन के ऐतिहासिक अपराध बोध को सनातन समाज की छाती पर मढ़ने का कुचक्र रचा।

३. ‘सद्भाव’ के नाम पर इतिहास के सच को मिटाकर भावी पीढ़ियों को वैचारिक रूप से अज्ञानी और असहाय बनाया।

 

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