मोहन राकेश का ‘आषाढ़ का एक दिन’: सांस्कृतिक नायक की अमर गाथा या कालिदास का चरित्र-हनन?
‘आषाढ़ का एक दिन’ संस्कृत के महान कवि कालिदास और उनके गाँव की प्रेमिका मल्लिका के संबंधों पर आधारित है। इसमें दिखाया गया है कि उज्जैलिनी के राज्याश्रय में जाकर कालिदास ‘मातृगुप्त’ बन जाते हैं, अपनी जड़ों को भूल जाते हैं, और अंत में एक टूटे हुए, कुंठित व्यक्ति की तरह मल्लिका के पास लौटते हैं।
१. कालिदास जैसे महान सांस्कृतिक प्रतीक का बौनापन और कायरता
कालिदास भारतीय साहित्य के शिखर-पुरुष हैं, जिनकी कृतियों (अभिज्ञानशाकुंतलम्, मेघदूतम्, रघुवंशम्) में भारत का ओज, सौंदर्य और उदात्त जीवन-मूल्य झलकता है।
पोस्टमार्टम: मोहन राकेश ने कालिदास को एक असहाय, निर्णय न ले सकने वाले, कायर और अपनी जिम्मेदारियों से भागने वाले (Escapist) प्रेमी के रूप में दिखाया। जो कवि पूरे विश्व को अमर काव्य दे गया, उसे अपनी ही भावनाओं का दास और दुर्बल चरित्र सिद्ध कर दिया गया। यह भारतीय इतिहास और साहित्य के महानायकों को बौना सिद्ध करने की वामपंथी-आधुनिकतावादी सनक थी।
२. ‘कला बनाम राजसत्ता/कर्तव्य’ का झूठा द्वंद्व
नाटक में यह स्थापित करने का प्रयास किया गया है कि राजसत्ता, वैभव और सामाजिक दायित्व किसी भी कलाकार की मौलिकता को नष्ट कर देते हैं।
पोस्टमार्टम: ऐतिहासिक रूप से भारत में कला और राजसत्ता का संबंध शोषक और शोषित का नहीं रहा। विक्रमादित्य के दरबार के नवरत्नों में कालिदास का स्थान भारत के सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक था। मोहन राकेश ने आधुनिक मार्क्सवादी चश्मा पहनकर प्राचीन भारत के इस मधुर संबंध को ‘कलाकार के शमन’ (Suppression of Artist) के रूप में मरोड़ दिया।
३. ‘मल्लिका’ के माध्यम से स्त्री-उत्पीड़न का प्रायोजित नैरेटिव
मल्लिका (नायिका) कालिदास के लिए सब कुछ त्याग देती है, अंत में एक अनचाहे व्यक्ति (विलोम) के साथ रहने को मजबूर होती है और वेश्यावृत्ति/गरीबी के गर्त में गिर जाती है।
पोस्टमार्टम: मोहन राकेश ने मल्लिका के माध्यम से भारतीय समाज और परंपरा को यह संदेश दिया कि समर्पण, प्रेम और निष्ठा का अंत केवल तबाही और शोषण में होता है। उन्होंने आधुनिकतावादी ‘विषाद’ (Modern Despair) को जबरन भारतीय लोक-जीवन पर थोप दिया।
निष्कर्ष (The Bottom Line)
मोहन राकेश का ‘आषाढ़ का एक दिन’ कोई सांस्कृतिक गौरव का नाटक नहीं है, बल्कि भारत के सबसे महान कवि के चरित्र-हनन और पश्चिमी ‘अस्तित्ववादी निराशा’ (Existential Melancholy) का भारतीयकरण करने की कोशिश है।
सद्गति का पोस्टमार्टम: सामाजिक यथार्थ का चित्रण या समाज में घृणा फैलाने का एजेंडा?