ताजमहल का ऐतिहासिक सच (भाग-४): गुंबद पर स्थित कलश (त्रिशूल), स्थापत्य की हिंदू कड़ियाँ और विवाद का कानूनी भविष्य
(नोट: यह आलेख इस श्रृंखला का चौथा और अंतिम भाग है। पहले तीन भागों में हमने अदालती मुकदमों, शाहजहाँ के दरबारी ग्रंथ ‘बादशाहनामा’ के लिखित साक्ष्यों और ताजमहल के नीचे बंद २२ कमरों के रहस्यों का सिलसिलेवार विश्लेषण किया था। इस अंतिम भाग में हम ताजमहल की बाहरी बनावट में दिखने वाले हिंदू स्थापत्य के प्रतीकों और इस महा-विवाद के संभावित कानूनी व सामाजिक समाधान पर चर्चा करेंगे।)
ताजमहल के बंद तहखानों से बाहर निकलकर जब हम इसके विशाल और भव्य मुख्य गुंबद (Main Dome) की ओर नजर उठाते हैं, तो स्थापत्य कला का एक और अनसुलझा विरोधाभास सामने आता है। हिंदू पक्षकारों और पारंपरिक वास्तुकारों का दावा है कि ताजमहल के शीर्ष पर चमकने वाला कलश और उसकी संपूर्ण बाहरी रूपरेखा शुद्ध रूप से सनातन मंदिर वास्तुकला (Temple Architecture) के सिद्धांतों पर आधारित है, जिसे मुगलों ने केवल आंशिक रूप से रूपांतरित किया था।
आइए इस अंतिम भाग में मुख्य गुंबद, उस पर स्थित कलश (त्रिशूल) के विवाद और इस ऐतिहासिक मुकदमे के भविष्य को गहराई से समझते हैं।
१. मुख्य गुंबद पर स्थित कलश और त्रिशूल का रहस्य
ताजमहल के सबसे ऊपरी हिस्से पर एक विशाल धात्विक कलश (Finial) स्थापित है। १९वीं सदी की शुरुआत तक यह कलश शुद्ध सोने का हुआ करता था, जिसे बाद में तांबे (Copper) से बदल दिया गया। हिंदू पक्षकार इस कलश की बनावट को लेकर निम्नलिखित प्रमाण प्रस्तुत करते हैं:
- त्रिशूल और पूर्ण कुंभ का आकार: यदि इस कलश की बनावट को ध्यान से देखा जाए, तो यह पारंपरिक इस्लामी ‘चाँद-तारे’ (Crescent and Star) की आकृति से बिल्कुल अलग है। यह एक उलटे रखे हुए कमल के ऊपर ‘पूर्ण कलश’ (Amrita Kalasha) और उसके ऊपर एक उर्ध्वगामी त्रिशूल (Trident) जैसी आकृति है। त्रिशूल सीधे तौर पर भगवान शिव का मुख्य आयुध है।
- कलश का रेखाचित्र (Ground Inscription): ताजमहल के पूर्वी प्रांगण (Courtyard) की फर्श पर इस विशाल कलश का एक वास्तविक आकार का रेखाचित्र (Full-scale layout) चूने के पत्थरों से उकेरा गया है। हिंदू शोधकर्ताओं के अनुसार, इस रेखाचित्र को ध्यान से देखने पर नारियल की आकृति, आम के पत्ते और शिव मंदिर के ‘गगनचुम्बी त्रिशूल’ की रूपरेखा साफ दिखाई देती है।
- इस्लामिक वास्तुकला में विसंगति: तुर्की, ईरान या अरब देशों के पारंपरिक इस्लामी स्मारकों में गुंबद के ऊपर इस प्रकार के ‘कलश और नारियल’ जैसी आकृतियों का कोई ऐतिहासिक या धार्मिक उल्लेख नहीं मिलता। यह विशुद्ध रूप से भारतीय हिंदू शिल्पशास्त्र (जैसे समरांगण सूत्रधार) का हिस्सा है।
[ ताजमहल का मुख्य गुंबद ]
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(शीर्ष पर स्थित धात्विक कलश)
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[हिंदू पक्षकारों का दावा] [मुगल इतिहास का पक्ष]
• यह 'पूर्ण कलश' और 'त्रिशूल' है। • यह मुगल-इंडो शैली का 'चाँद' है।
• पारंपरिक शिव मंदिरों का अनिवार्य अंग। • शाहजहाँ ने भारतीय कारीगरों की कला को अपनाया।
२. स्थापत्य कला की अन्य महत्वपूर्ण हिंदू कड़ियाँ
इतिहासकार पी. एन. ओक की थ्योरी और इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित मुकदमों में ताजमहल के बाहरी और आंतरिक स्थापत्य से जुड़ी कई अन्य कड़ियों का भी उल्लेख है:
क) अष्टकोणीय योजना (Ashtakonya/Octagonal Layout)
ताजमहल की मुख्य इमारत और उसके चारों कोनों पर बनी मीनारें एक अष्टकोणीय (आठ कोनों वाले) चबूतरे पर टिकी हैं। हिंदू स्थापत्य कला और वास्तुशास्त्र के अनुसार, भगवान शिव को ‘अष्टमूर्ति’ कहा जाता है और संसार की आठों दिशाओं के रक्षकों (दिक्पालों) को संतुष्ट करने के लिए महत्वपूर्ण शिव मंदिरों का निर्माण अष्टकोणीय गर्भगृह के रूप में किया जाता था।
ख) चार मीनारों का रहस्य
ताजमहल के चारों कोनों पर बनी मीनारें (Minarets) मुख्य इमारत से बिल्कुल अलग और बाहर की तरफ झुकी हुई हैं। मुख्यधारा के इतिहासकार इसे भूकंप से मुख्य इमारत को बचाने की तकनीक बताते हैं। हालांकि, हिंदू पक्ष का तर्क है कि ये मीनारें मूल रूप से मंदिर परिसर के चारों कोनों पर स्थित ‘चार स्तंभ’ या प्रहरी बुर्ज थे, जिन्हें बाद में ऊपर से अज़ान देने वाली मीनारों की तरह नया रूप दे दिया गया।
ग) मुख्य कक्ष से पानी की बूंदों का टपकना
ताजमहल के केंद्रीय कक्ष (जहाँ शाहजहाँ और मुमताज की कब्रें हैं) के ठीक ऊपर मुख्य गुंबद के केंद्र से बारिश के दिनों में पानी की बूंदों के टपकने की ऐतिहासिक घटनाएं दर्ज हैं। हिंदू परंपरा में किसी शव के मकबरे पर पानी टपकना अशुभ माना जाता है, जबकि शिव मंदिरों में शिवलिंग के ठीक ऊपर स्थापित ‘जलाधारी’ से लगातार जल की बूंदें गिराने की सदियों पुरानी परंपरा है।
३. इस महा-विवाद का कानूनी भविष्य और समाधान
ताजमहल को ‘तेजो महालय’ शिव मंदिर घोषित करने की कानूनी लड़ाई अब अपने सबसे निर्णायक दौर में पहुंच चुकी है। जुलाई २०२६ में इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा केंद्र सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को जारी किए गए नोटिस के बाद इस मामले में तीन संभावित कानूनी रास्ते दिखाई देते हैं:
१. एएसआई का नया वैज्ञानिक सर्वेक्षण (GPR / Carbon Dating)
अयोध्या के श्री राम जन्मभूमि मामले और वाराणसी के ज्ञानवापी परिसर की तर्ज पर, अदालत आने वाले समय में ताजमहल के बंद २२ कमरों और उसके आधारभूत ढांचे का जीपीआर (Ground Penetrating Radar) सर्वेक्षण करने का आदेश दे सकती है। बिना किसी तोड़-फोड़ के की जाने वाली यह आधुनिक वैज्ञानिक जांच दूध का दूध और पानी का पानी कर सकती है।
२. ‘प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट, १९९१’ (Places of Worship Act) का पेंच
इस विवाद में सबसे बड़ा वैधानिक मोड़ ‘प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट, १९९१’ है, जो १५ अगस्त १९४७ से पहले के किसी भी धार्मिक स्थल के स्वरूप को बदलने पर रोक लगाता है। हालांकि, ताजमहल वर्तमान में संस्कृति मंत्रालय के तहत एक ‘राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक’ (Protected Monument) है, इसलिए कुछ कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि प्राचीन स्मारक अधिनियम (Ancient Monuments Act, १९५८) के तहत इस पर विशेष सुनवाई संभव है।
आलेख श्रृंखला का समापन
ताजमहल केवल सफ़ेद संगमरमर की एक खूबसूरत इमारत नहीं है, बल्कि यह भारतीय इतिहास के दो अलग-अलग कालखंडों, संस्कृतियों और आस्थाओं का महा-संगम और टकराव है। जहाँ एक तरफ दुनिया इसे मुगलों के प्रेम का प्रतीक मानती है, वहीं दूसरी तरफ करोड़ों हिंदुओं की आस्था इसे ‘भगवान श्री अग्रेश्वर महादेव’ का पवित्र स्थान मानती है। आने वाले समय में न्यायालय का निर्णय और वैज्ञानिक साक्ष्य ही इस सदियों पुराने रहस्य पर से अंतिम पर्दा उठा पाएंगे।
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