धार की भोजशाला: भाग-५ (अंतिम भाग) – हाईकोर्ट का ऐतिहासिक अंतिम फैसला, वैधानिक चुनौतियाँ और भविष्य का रुख
(नोट: यह इस विशेष श्रृंखला का पाँचवाँ और अंतिम भाग है। पिछले चार भागों में हमने महाराज भोजदेव परमार के स्वर्णिम काल, अलाउद्दीन खिलजी के बर्बर आक्रमण, वर्ष २००३ के ‘मंगलवार-शुक्रवार’ के पूजा-नमाज़ फॉर्मूले और वर्ष २०२४ के एएसआई वैज्ञानिक सर्वे के अकाट्य साक्ष्यों को समझा था। इस अंतिम भाग में हम समकालीन कानूनी घटनाक्रमों, अदालती फैसलों और इस विवाद के भविष्य का विश्लेषण करेंगे।)
वर्ष २०२४ में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की २१०० पन्नों की वैज्ञानिक रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद धार की भोजशाला का कानूनी पलड़ा पूरी तरह बदल गया था। ज़मीन के नीचे से मिलीं देवी-देवताओं की ९० से अधिक मूर्तियां, ‘ओम सरस्वती नमः’ के शिलालेख और स्तंभों के आधारों ने यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध कर दिया था कि यह स्थान मूल रूप से राजा भोज का ‘सरस्वती सदन’ विश्वविद्यालय ही था। इसी वैज्ञानिक सच्चाई को आधार बनाकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ में इस महा-मुकदमे की अंतिम और निर्णायक बहस शुरू हुई।
आइए इस अंतिम भाग में हाईकोर्ट के ऐतिहासिक फैसले, ‘प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट’ की स्थिति और इस विवाद के संभावित वैधानिक व सामाजिक समाधानों को विस्तार से समझते हैं।
१. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का ऐतिहासिक और निर्णायक फैसला
वर्ष २०२४ की एएसआई रिपोर्ट पर दोनों पक्षों की आपत्तियों और दलीलों को सुनने के बाद, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने इस सदियों पुराने विवाद पर अपना अंतिम और युगांतरकारी फैसला सुनाया:
- धार्मिक स्वरूप का निर्धारण: हाईकोर्ट ने एएसआई के पुरातात्विक और वैज्ञानिक साक्ष्यों को पूरी तरह स्वीकार किया। कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से माना कि धार की भोजशाला का मूल धार्मिक स्वरूप और चरित्र (Religious Character) शुद्ध रूप से एक हिंदू मंदिर का ही है, जिसे बाद के शासकों द्वारा आंशिक रूप से रूपांतरित करने का प्रयास किया गया था।
- २००३ के फॉर्मूले में बदलाव: कोर्ट ने वर्ष २००३ से चले आ रहे मंगलवार को पूजा और शुक्रवार को नमाज़ के ‘साझा फॉर्मूले’ की वैधानिक विसंगतियों को दूर करने का निर्देश दिया। हिंदू पक्षकारों की मांग को स्वीकार करते हुए कोर्ट ने माना कि चूंकि यह स्थान मूलतः विद्या की देवी का मंदिर है, इसलिए इसके भीतर पूर्ण और निर्बाध पूजा का अधिकार बहुसंख्यक समाज का ही बनता है।
२. ‘प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट, १९९१’ (Places of Worship Act) की चुनौती और वैधानिक स्थिति
काशी और मथुरा की तरह ही, मुस्लिम पक्ष (कमाल मौला मस्जिद वेलफेयर सोसाइटी) ने इस मुकदमे के खिलाफ भी ‘प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट, १९९१’ (धार्मिक स्थल कानून) को अपनी मुख्य ढाल बनाया था। उनका तर्क था कि १५ अगस्त १९४७ को चूंकि वहाँ जुमे की नमाज़ होती थी, इसलिए इसका स्वरूप बदला नहीं जा सकता।
अदालत और हिंदू पक्ष का प्रति-तर्क:
- एएसआई नियमों का अपवाद: कानूनी विशेषज्ञों और अदालत के रुख के अनुसार, ‘प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट, १९९१’ की धारा ४(३)(क) के तहत उन प्राचीन स्मारकों, पुरातात्विक स्थलों और अवशेषों को इस कानून के दायरे से बाहर (Exempted) रखा गया है जो ‘प्राचीन स्मारक अधिनियम, १९५८’ के तहत राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक हैं। चूँकि धार की भोजशाला सन १९५१ से ही एएसआई के तहत एक राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक घोषित है, इसलिए इस पर १९९१ के कानून का प्रतिबंध लागू नहीं होता।
- वैज्ञानिक सत्य का महत्व: कोर्ट ने माना कि यह कानून किसी ऐतिहासिक झूठ को कायम रखने के लिए नहीं है। जब विज्ञान (ASI) ने साबित कर दिया कि इमारत की दीवारें और खंभे मंदिर के हैं, तो उसे मस्जिद की संपत्ति नहीं माना जा सकता।
[ प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट, १९९१ (धारा ४) ]
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[ मुस्लिम पक्ष का दावा ] [ अदालत और एएसआई का नियम ]
• १९४७ के स्वरूप के आधार पर केस खारिज हो। • एएसआई संरक्षित स्मारकों पर यह कानून लागू नहीं होता।
• शुक्रवार की नमाज़ का अधिकार बना रहे। • वैज्ञानिक साक्ष्य (ASI Report) ही अंतिम सत्य है।
३. वर्तमान स्थिति: सुप्रीम कोर्ट का रुख और मां वाग्देवी की घर वापसी का प्रयास
हाईकोर्ट के इस कड़े फैसले के खिलाफ मुस्लिम पक्षकारों ने देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) का दरवाजा खटखटाया है।
- सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम आदेश: सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता और क्षेत्र में सामाजिक सौहार्द बनाए रखने के लिए हाईकोर्ट के फैसले के कुछ हिस्सों पर अंतरिम रोक (Stay) लगा रखी है, ताकि मामले की विस्तृत और अंतिम समीक्षा की जा सके। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कोई भी अंतिम कदम उठाने से पहले दोनों पक्षों को अपनी पूरी बात रखने का मौका दिया जाएगा। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने भी एएसआई के वैज्ञानिक निष्कर्षों को खारिज नहीं किया है।
- मां वाग्देवी को भारत लाने के राजनयिक प्रयास: इस कानूनी लड़ाई के समानांतर, भारत सरकार और विभिन्न सांस्कृतिक संगठनों ने लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी मां वाग्देवी (सरस्वती) की मूल प्रतिमा को पुनः भारत (धार) लाने के लिए राजनयिक (Diplomatic) और कानूनी प्रयास तेज कर दिए हैं, ताकि आने वाले समय में जब यह विवाद पूरी तरह सुलझे, तो मां सरस्वती को उनके मूल गर्भगृह में ससम्मान स्थापित किया जा सके।
श्रृंखला का तार्किक निष्कर्ष (Closing Statement)
धार की भोजशाला का यह लंबा सफर हमें यह सिखाता है कि इतिहास की कड़ियों को तलवार के बल पर कुछ समय के लिए दबाया तो जा सकता है, लेकिन उन्हें हमेशा के लिए मिटाया नहीं जा सकता। राजा भोज के काल में गूँजती संस्कृत की ऋचाओं से लेकर, अलाउद्दीन खिलजी की बर्बरता, २००३ का अनोखा पूजा-नमाज़ फॉर्मूला और अंततः २०२४ के आधुनिक जीपीआर (GPR) सर्वे तक—समय ने हर दौर में इस विद्या के मंदिर की गवाही दी है।
यह महा-विवाद अब देश की सर्वोच्च अदालत के समक्ष अपने अंतिम वैधानिक पड़ाव पर है। इतिहास के पुराने घावों को केवल प्रतिशोध से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक सत्य और संवैधानिक मर्यादा के जरिए ही भरा जा सकता है।
न्यायपालिका का आगामी रुख ही यह तय करेगा कि मालवा की ऐतिहासिक धरती पर ज्ञान और स्वर की देवी मां वाग्देवी का यह प्राचीन दरबार अपने पूर्ण और अखंड वैभव को कब और किस रूप में प्राप्त करेगा।
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