🎬 भारतीय सिनेमा में वामपंथी एजेंडे की पोल: भाग 2 से आगे – भाग 3
तुष्टिकरण और सेक्युलर नैरेटिव (1990-2000) – सांस्कृतिक पहचान को मिटाने का प्रयास
1991 में सोवियत संघ (USSR) के बिखरने से दुनिया भर के वामपंथियों का वैचारिक गॉडफादर खत्म हो चुका था। उसी समय भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था को खोल दिया, जिससे देश में समृद्धि आने लगी। अब वामपंथियों के लिए ‘गरीबी का रोना’ रोकर या पूंजीपतियों को विलेन बनाकर जनता को भड़काना आसान नहीं रह गया था।
इसलिए, वामपंथी बुद्धिजीवियों ने पश्चिम के ‘सांस्कृतिक मार्क्सवाद’ (Cultural Marxism) को अपनाया। इसके तहत उन्होंने भारतीय समाज के बहुसंख्यक वर्ग की धार्मिक पहचान, परंपराओं और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों को निशाना बनाना शुरू किया। इसमें उन्हें तत्कालीन सरकारों की तुष्टिकरण (Appeasement) की राजनीति का पूरा सहयोग मिला।
1. हिंदू धार्मिक प्रतीकों का ‘रूढ़िवादीकरण’ और स्टीरियोटाइपिंग
90 के दशक के बाद बॉलीवुड फिल्मों में एक बहुत ही सूक्ष्म लेकिन खतरनाक खेल (Subliminal Messaging) शुरू हुआ, जिसे दर्शकों ने धीरे-धीरे सामान्य मान लिया:
- तिलक और चोटी वाले विलेन: फिल्मों में यदि कोई भ्रष्ट राजनेता, धोखेबाज तांत्रिक, क्रूर जमींदार या लालची व्यापारी दिखाना होता था, तो उसे अनिवार्य रूप से माथे पर बड़ा सा तिलक लगाए, हाथ में कलावा बांधे और पूजा-पाठ करते हुए दिखाया जाता था (जैसे- सूर्यवंशम में के.पी. सिंह, या कोयला और करण-अर्जुन के विलेन)।
- पंडितों और पुजारियों का मजाक: मंदिर के पुजारियों को या तो लालची, कायर या मजाकिया चरित्र के रूप में पेश किया जाने लगा।
- इसके विपरीत नैरेटिव: इसके ठीक उलट, अन्य मजहबों के धार्मिक प्रतीकों को हमेशा अत्यंत पवित्र, देशभक्त, न्यायप्रिय और सूफीवाद के चश्मे से बेहद शांत दिखाया जाता था। समाज में यह संदेश गहरे बैठाया गया कि सनातन परंपराएं पिछड़ी और दमनकारी हैं, जबकि ‘सेक्युलरिज्म’ ही एकमात्र आधुनिक सोच है।
2. आतंकवाद का ‘मानवीयकरण’ (Humanization of Terrorism)
1990 के दशक में जब कश्मीर घाटी जिहादी आतंकवाद की आग में जल रही थी, कश्मीरी पंडितों का नरसंहार और पलायन हो रहा था, तब बॉलीवुड ने आतंकवाद के असली चेहरे को छिपाने के लिए एक नैरेटिव गढ़ा—“आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता, वह तो भटका हुआ युवा है।”
- रोज़ा (Roja, 1992) और बॉम्बे (Bombay, 1995): मणिरत्नम की इन फिल्मों ने मुख्यधारा में इस विमर्श को स्थापित किया कि चरमपंथी या दंगाई व्यवस्था के सताए हुए लोग हैं।
- मिशन कश्मीर (Mission Kashmir, 2000) और फ़िज़ा (Fiza, 2000): इन फिल्मों में दिखाया गया कि कैसे नायक (ऋतिक रोशन) प्रशासनिक कमियों, पुलिस की ज्यादती या व्यक्तिगत त्रासदी के कारण हथियार उठाता है। आतंकवादियों को क्रूर हत्यारों के बजाय ‘परिस्थितियों के शिकार मासूम लड़के’ के रूप में पेश किया गया। दर्शकों के मन में देश की रक्षा करने वाले सुरक्षा बलों के बजाय आतंकवादियों के प्रति सहानुभूति पैदा करने की यह एक गहरी वामपंथी साजिश थी।
3. ‘सॉफ्ट पॉवर’ के जरिए सांस्कृतिक विस्मृति (Cultural Amnesia)
90 के दशक में यश चोपड़ा, करण जौहर और सूरज बड़जात्या की भव्य एनआरआई (NRI) फिल्मों का दौर शुरू हुआ। इन फिल्मों ने एक नया ‘ग्लैमरस सेक्युलरिज्म’ परोसा:
- फिल्मों में करवा चौथ या शादियां तो बड़े पैमाने पर दिखाई गईं, लेकिन उनके पीछे की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक गहराई को पूरी तरह गायब कर दिया गया।
- राष्ट्रवाद को केवल ‘भारत माता की जय’ कहने या क्रिकेट मैच जीतने तक सीमित कर दिया गया। देश के वास्तविक इतिहास, आक्रांताओं के अत्याचारों और महान राजाओं (जैसे महाराणा प्रताप, शिवाजी महाराज, या चोल राजवंश) के गौरवशाली इतिहास को पूरी तरह से दबा दिया गया, ताकि युवा पीढ़ी अपनी वास्तविक जड़ों से कट जाए।
4. कांग्रेस और गठबंधन सरकारों की ‘पुरस्कार और पद’ की राजनीति
इस दौर की केंद्र सरकारों को अपने वोट बैंक को सुरक्षित रखने के लिए एक ऐसे नैरेटिव की जरूरत थी जो बहुसंख्यक समाज को आत्मग्लानि (Guilt) में रखे और अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना पैदा करे।
- गठजोड़ का सच: वामपंथी फिल्मकारों, लेखकों और इतिहासकारों ने सरकार के लिए यह नैरेटिव तैयार किया। बदले में सरकारों ने इन विचारकों को राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम (NFDC), फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII), और राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की जूरी में शीर्ष पदों से नवाजा।
- एक खास इकोसिस्टम तैयार किया गया, जहाँ केवल उसी फिल्म या कलाकार को ‘प्रतिष्ठित’ माना जाता था जो सरकार के सेक्युलर एजेंडे पर खरा उतरता था। देश की संप्रभुता या बहुसंख्यक समाज की पीड़ा पर बात करने वालों को ‘सांप्रदायिक’ कहकर दरकिनार कर दिया जाता था।
इस दौर की पोल-खोल का निष्कर्ष
1990 और 2000 के दशक के सिनेमा ने भारतीय जनमानस को वैचारिक रूप से भ्रमित किया। इसने आतंकवाद की भयावहता को कम करके आंका, देश के सुरक्षा बलों की छवि को संदिग्ध बनाया और सनातन समाज को अपनी ही परंपराओं के प्रति हीनभावना से भर दिया। यह ‘सेक्युलरिज्म’ का वह नकाब था जिसके पीछे पूरी तरह से भारत की सांस्कृतिक रीढ़ को तोड़ने का वामपंथी एजेंडा काम कर रहा था।