🎬 भारतीय सिनेमा में वामपंथी एजेंडे की पोल: भाग 3 से आगे – भाग 4
अकादमिक और शहरी वामपंथ (2000-2015) – ‘अर्बन नक्सल’ नैरेटिव का उभार
2000 के दशक की शुरुआत तक भारत सूचना प्रौद्योगिकी (IT) और आर्थिक मोर्चे पर तेजी से आगे बढ़ रहा था। अब पुरानी कम्युनिस्ट थ्योरी पूरी तरह अप्रासंगिक हो चुकी थी। इसलिए वामपंथी बुद्धिजीवियों ने दिल्ली के जेएनयू (JNU), जामिया और जादवपुर जैसे विश्वविद्यालयों में पनपने वाली ‘भारत-विरोधी और व्यवस्था-विरोधी’ (Anti-State) विचारधारा को सीधे मुख्यधारा के सिनेमा में इंजेक्ट करना शुरू किया।
अब लड़ाई सिर्फ अमीर-गरीब या धर्म की नहीं थी, बल्कि सीधे तौर पर भारतीय राष्ट्र राज्य (Indian State), भारतीय न्यायपालिका और भारतीय सेना (Indian Army) की संप्रभुता को चुनौती देने की थी।
1. विद्रोहियों का ‘क्रांतिकारीकरण’ और सेना का ‘राक्षसीकरण’
इस दौर में कुछ ऐसे निर्देशकों और लेखकों का उभार हुआ जिन्होंने अपनी बौद्धिक कलात्मकता की आड़ में देश के संवेदनशील हिस्सों (जैसे कश्मीर और नॉर्थ-ईस्ट) में सक्रिय आतंकवादियों और नक्सलियों का महिमामंडन किया।
- हैदर (Haider, 2014): विशाल भारद्वाज की यह फिल्म वामपंथी एजेंडे का सबसे सटीक उदाहरण है। विलियम शेक्सपियर के नाटक ‘हेमलेट’ की आड़ में कश्मीर के आतंकवाद को बेहद चालाकी से सही ठहराया गया। फिल्म में भारतीय सेना को मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वाले क्रूर शोषक के रूप में दिखाया गया, जबकि अलगाववादियों और पत्थरबाजों के प्रति गहरी सहानुभूति बटोरी गई। फिल्म ने सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (AFSPA) को एक विलेन कानून की तरह पेश किया, लेकिन पाकिस्तानी प्रायोजित आतंकवाद और कश्मीरी पंडितों के दर्द पर चुप्पी साध ली।
- दिल से (Dil Se, 1998) और चक्रव्यूह (Chakravyuh, 2012): इन फिल्मों में नॉर्थ-ईस्ट के उग्रवाद और भारत के मध्य भागों में सक्रिय लाल आतंकवाद (Naxalism) को ‘जल-जंगल-जमीन’ की लड़ाई बताकर उनका रोमानीकरण (Romanticize) किया गया। प्रकाश झा की चक्रव्यूह में सीधे तौर पर नक्सली विचारधारा को सही ठहराने वाले संवाद थे, जहाँ राज्य व्यवस्था को पूरी तरह शोषक दिखाया गया था।
2. राज्य (State) के खिलाफ युवाओं को भड़काना
इस दौर की एक और बड़ी प्रवृत्ति थी—युवाओं के मन में राष्ट्र के स्थापित प्रतीकों और लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति पूरी तरह अविश्वास और विद्रोह पैदा करना।
- रंग दे बसंती (Rang De Basanti, 2006): राकेश ओमप्रकाश मेहरा की यह फिल्म सिनेमाई दृष्टि से बहुत लोकप्रिय हुई, लेकिन इसके वैचारिक संदेश को समझना ज़रूरी है। फिल्म में देश के महान क्रांतिकारियों (भगत सिंह, आज़ाद) की तुलना आधुनिक दौर के उन कॉलेज छात्रों से कर दी गई जो व्यवस्था से तंग आकर देश के रक्षा मंत्री की सरेआम हत्या कर देते हैं। फिल्म ने संदेश दिया कि यदि सिस्टम में भ्रष्टाचार है, तो लोकतांत्रिक तरीकों (चुनाव, कानून) के बजाय हिंसा और अराजकता ही एकमात्र रास्ता है। यह सीधे तौर पर नक्सली और अराजकतावादी (Anarchist) सोच को युवाओं के बीच परोसना था।
- हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी (Hazaaron Khwaishein Aisi, 2003): सुधीर मिश्रा की यह फिल्म सीधे तौर पर 1970 के दशक के नक्सली आंदोलन की पृष्ठभूमि पर आधारित थी। इसमें वामपंथी छात्रों के संघर्ष और उनके आदर्शवाद को बहुत ही सुंदर और बौद्धिक जामा पहनाकर पेश किया गया, जबकि नक्सली हिंसा में मारे गए निर्दोष ग्रामीणों और पुलिसकर्मियों की चीखें गायब थीं।
3. ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ का दोहरा मापदंड और यूपीए (UPA) सरकार का मौन
2004 से 2014 के बीच केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए (UPA) सरकार सत्ता में थी। इस दौरान राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (NAC) और अन्य महत्वपूर्ण सरकारी थिंक-टैंक में कई ऐसे ‘बुद्धिजीवियों’ का दबदबा था जिनका झुकाव स्पष्ट रूप से वामपंथ की ओर था।
- पुरस्कारों का बंदरबांट: इस दौर में कश्मीरी अलगाववाद या नक्सली संवेदनाओं को छूने वाली फिल्मों को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में विशेष तरजीह दी गई। फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में ऐसे कट्टपंथी वामपंथी प्रोफेसरों और निदेशकों को बिठाया गया, जिन्होंने आने वाली पीढ़ी के फिल्मकारों के दिमाग में भारत-विरोधी विमर्श को ही ‘असली सिनेमा’ के रूप में स्थापित कर दिया।
- दोगली सेंसरशिप: यदि कोई फिल्म वामपंथी एजेंडे पर सवाल उठाती या देश के पारंपरिक गौरव को दिखाती, तो उसे ‘आउटडेटेड’ या ‘सांप्रदायिक’ कहकर किनारे कर दिया जाता। वहीं दूसरी तरफ, जेएनयू के ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ वाले विमर्श को फिल्मों में ‘बौद्धिक विमर्श’ और ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ के नाम पर खुली छूट दी गई।
इस दौर की पोल-खोल का निष्कर्ष
2000 से 2015 के इस कालखंड ने सिनेमा को ‘अर्बन नक्सल’ प्रोपेगैंडा का सबसे बड़ा प्लेटफॉर्म बना दिया। बंदूक उठाने वाले आतंकियों को कविताएं पढ़ते और गिटार बजाते हुए दिखाया गया, जबकि देश की सीमा पर जान देने वाले भारतीय सैनिकों को क्रूर खलनायक साबित करने की पूरी कोशिश की गई। इस दौर के सिनेमा ने देश की सुरक्षा, संप्रभुता और राष्ट्रवाद की परिभाषा को ही विकृत करने का काम किया।