🎬 भारतीय सिनेमा में वामपंथी एजेंडे की पोल: भाग 4 से आगे – भाग 5
एजेंडे की हार और नया विमर्श (2015 से आज तक) – जनता की जागृति और नैरेटिव का पलटना
साल 2015 के बाद का दौर भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक बड़े सांस्कृतिक पुनर्जागरण (Cultural Awakening) के रूप में दर्ज किया गया है। स्मार्टफोन और सस्ते इंटरनेट (जियो क्रांति) के आने से सूचनाओं पर वामपंथी बुद्धिजीवियों का एकाधिकार समाप्त हो गया। सोशल मीडिया (X/ट्विटर, यूट्यूब) ने आम दर्शकों को एक ऐसा मंच दे दिया जहाँ वे फिल्मों के भीतर छिपे ‘सबलिमिनल मैसेजिंग’ (Subliminal Messaging) यानी छिपे हुए वैचारिक एजेंडे को डिकोड करने लगे। दशकों से जो खेल परदे के पीछे चल रहा था, वह अब पूरी तरह बेनकाब हो गया।
1. ‘बॉयकॉट बॉलीवुड’ और एजेंडे की आर्थिक रीढ़ पर प्रहार
सोशल मीडिया पर आम जनता ने बॉलीवुड के उस विशिष्ट इकोसिस्टम के खिलाफ मोर्चा खोल दिया जो केवल एक विशेष समुदाय के तुष्टिकरण और सनातनी प्रतीकों के अपमान पर टिका था।
- छिपे हुए एजेंडे की पहचान: दर्शकों ने यह सवाल उठाना शुरू किया कि आखिर क्यों हर फिल्म में विलेन को ही तिलकधारी दिखाया जाता है? क्यों हर समस्या के पीछे हिंदू रूढ़िवादिता को ही दोष दिया जाता है? पीके (PK) जैसी फिल्मों में हिंदू देवी-देवताओं के चित्रण पर तीखी प्रतिक्रिया हुई।
- आर्थिक चोट: ‘बॉयकॉट बॉलीवुड’ (Boycott Bollywood) केवल एक सोशल मीडिया ट्रेंड नहीं था, बल्कि यह दर्शकों का वैचारिक विद्रोह था। बड़े-बड़े सुपरस्टार्स की करोड़ों रुपये के बजट वाली फिल्में, जिनमें पुराना ‘सेक्युलर प्रोपेगैंडा’ या ‘अल्पसंख्यक पीड़ित कार्ड’ खेला गया था, वे बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिरीं। बॉलीवुड के फिल्मकारों को समझ आ गया कि अब जनता को मूर्ख बनाना मुमकिन नहीं है।
2. इतिहास का पुनरावलोकन और ‘द कश्मीर फाइल्स’ का धमाका
2015 के बाद भारतीय सिनेमा ने आखिरकार उन कड़वे सत्यों को दिखाना शुरू किया, जिन्हें वामपंथी इतिहासकारों और निर्देशकों ने दशकों तक दबाकर रखा था।
- द कश्मीर फाइल्स (The Kashmir Files, 2022): विवेक अग्निहोत्री की इस फिल्म ने भारतीय सिनेमा के इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया। जिस कश्मीरी पंडितों के नरसंहार और पलायन को बॉलीवुड ने 30 साल तक ‘अव्यवस्था’ या ‘भटके हुए युवाओं की मजबूरी’ कहकर छिपाया था, उसे इस फिल्म ने क्रूर सच्चाई के साथ परदे पर उतारा। फिल्म ने जेएनयू (JNU) के उस ‘अर्बन नक्सल’ और आजादी वाले नैरेटिव की पूरी पोल खोलकर रख दी जो आतंकवादियों का बौद्धिक बचाव करता था। बिना किसी बड़े स्टार और बिना किसी सरकारी वित्तीय सहायता (सुरुआती दौर में) के, इस फिल्म को देश की जनता ने अपनी गोद में उठा लिया और यह एक ऑल-टाइम ब्लॉकबस्टर बनी।
- द केरल स्टोरी (The Kerala Story, 2023) और आर्टिकल 370 (Article 370, 2024): इन फिल्मों ने सीधे तौर पर धर्मांतरण, वैश्विक आतंकवाद के जाल और कश्मीर के राजनीतिक सच को निर्भीकता से जनता के सामने रखा। ये फिल्में इस बात का प्रमाण थीं कि वामपंथी नैरेटिव अब पूरी तरह रक्षात्मक मुद्रा में आ चुका है।
3. दक्षिण भारतीय सिनेमा (साउथ) से सांस्कृतिक गौरव की सीख
बॉलीवुड की इस वैचारिक हार में दक्षिण भारतीय सिनेमा (विशेषकर तेलुगु, तमिल और कन्नड़ फिल्मों) ने एक बहुत बड़ी भूमिका निभाई।
- सांस्कृतिक गौरव का जश्न: जहाँ बॉलीवुड अपनी संस्कृति को दिखाने में हीनभावना (Complex) महसूस करता था, वहीं बाहुबली, आरआरआर (RRR), कांतारा (Kantara), और कार्तिकेय 2 जैसी फिल्मों ने भारतीय इतिहास, सनातन परंपराओं, लोक देवताओं और राष्ट्रवाद को अत्यंत भव्य और गौरवशाली रूप में प्रस्तुत किया।
- वैश्विक स्वीकार्यता: इन फिल्मों ने साबित कर दिया कि अपनी जड़ों से जुड़कर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता पाई जा सकती है (जैसे RRR का ऑस्कर जीतना)। इसने बॉलीवुड के इस वामपंथी भ्रम को हमेशा के लिए तोड़ दिया कि ‘आधुनिक’ दिखने के लिए अपनी संस्कृति को गाली देना ज़रूरी है।
4. राजनीतिक समीकरणों का बदलना और इकोसिस्टम का बिखरना
केंद्र में राष्ट्रवादी विचारधारा वाली सरकार के आने और जनता के लगातार दबाव के कारण, फिल्मों को मिलने वाला वह पुराना ‘वामपंथी सरकारी संरक्षण’ पूरी तरह समाप्त हो गया।
- संस्थानों का शुद्धीकरण: FTII, सेंसर बोर्ड और राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की जूरियों से उस पुराने वामपंथी सिंडिकेट को बाहर किया गया जो केवल एक विशेष विचारधारा की फिल्मों को प्रमोट करता था। अब पुरस्कार कला और राष्ट्र के प्रति प्रतिबद्धता के आधार पर मिलने लगे, न कि इस आधार पर कि फिल्म कितनी ‘लेफ्ट-लीनिंग’ है।
- नेताओं और अभिनेताओं की घबराहट: वामपंथी झुकाव वाले कई बड़े फिल्मकार और अभिनेता अब खुलकर प्रोपेगैंडा फिल्में बनाने से डरने लगे हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि जनता का आर्थिक बहिष्कार उनके पूरे करियर को खत्म कर सकता है।
🏁 इस संपूर्ण श्रृंखला का महा-निष्कर्ष
1940 के दशक में इप्टा (IPTA) से शुरू हुआ वामपंथी एजेंडा, जिसने नेहरूवादी समाजवाद का सहारा लेकर अमीरों और जमींदारों का खलनायकीकरण किया, 70 के दशक में ‘एंग्री यंग मैन’ के जरिए ट्रेड यूनियन की अराजकता को सही ठहराया, 90 के दशक में ‘सेक्युलर तुष्टिकरण’ की आड़ में आतंकवाद का मानवीयकरण किया और 2000 के दशक में ‘अर्बन नक्सल’ बनकर भारतीय सेना पर सवाल उठाए—वह पूरा का पूरा वैचारिक किला 2020 का दशक आते-आते ढह चुका है।
आज का भारतीय सिनेमा अधिक जागरूक, अपनी संस्कृति के प्रति गौरवान्वित और राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति संवेदनशील है। यह इस बात का प्रमाण है कि लोकतंत्र में अंततः जीत ‘जनता के नैरेटिव’ की होती है, किसी थोपे गए ‘बौद्धिक प्रोपेगैंडा’ की नहीं।