आक्रोश का दौर (1970-1980) – ‘एंग्री यंग मैन’ और व्यवस्था के खिलाफ नफरत
1970 का दशक आते-आते भारत की राजनीतिक और आर्थिक स्थिति बदहाल हो चुकी थी। बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार चरम पर थे। साल 1975 में इंदिरा गांधी सरकार द्वारा लगाए गए आपातकाल (Emergency) ने देश के लोकतांत्रिक ढांचे को हिलाकर रख दिया था। इस राजनीतिक और सामाजिक आक्रोश को भांपकर वामपंथी विचारकों ने सिनेमाई परदे पर एक नया मोहरा उतारा—“एंग्री यंग मैन” (Angry Young Man)।
यह सिर्फ एक फिल्मी किरदार नहीं था, बल्कि कानून, न्यायपालिका, उद्योगपतियों और स्थापित व्यवस्था के खिलाफ आम जनता के गुस्से को कम्युनिस्ट क्रांति की तरफ मोड़ने का एक बहुत ही सुविचारित औजार था।
1. सलीम-जावेद की जोड़ी और ‘वर्ग संघर्ष’ का महिमामंडन
इस दौर में पटकथा लेखन पर सलीम खान और जावेद अख्तर (सलीम-जावेद) की जोड़ी का एकाधिकार था। जावेद अख्तर के पिता जान निसार अख्तर और उनके ससुर कैफ़ी आज़मी कम्युनिस्ट आंदोलन (IPTA) के शीर्ष स्तंभ थे। विरासत में मिली इसी वामपंथी विचारधारा को उन्होंने अमिताभ बच्चन के किरदारों के जरिए परदे पर उतारा।
- दीवार (Deewaar, 1975): इस फिल्म का नायक ‘विजय’ (अमिताभ बच्चन) एक मिल मजदूर का बेटा है जो बाद में स्मगलर बन जाता है। फिल्म में न्यायपालिका, पुलिस और भगवान को पूरी तरह लाचार या विलेन के रूप में दिखाया गया। संदेश यह दिया गया कि यदि व्यवस्था भ्रष्ट है, तो कानून तोड़ना और अपराध का रास्ता चुनना जायज है। यह शुद्ध रूप से मार्क्सवादी थ्योरी थी जो कहती है कि पूंजीवादी व्यवस्था को उखाड़ने के लिए कानून तोड़ना गलत नहीं है।
- त्रिशूल (Trishul, 1978): इस फिल्म में एक सफल बिजनेस टाइकून (संजीव कुमार) को एक धोखेबाज, मतलबी और क्रूर पिता के रूप में दिखाया गया, जबकि उसका नाजायज बेटा (अमिताभ बच्चन) उसे बर्बाद करने की कसम खाता है। यहाँ फिर से ‘सफल उद्योगपति’ को खलनायक और ‘सर्वहारा’ को न्याय की लड़ाई लड़ने वाले के रूप में पेश किया गया।
2. मिल मालिकों का ‘राक्षसीकरण’ और ट्रेड यूनियनों को भगवान बनाना
1970 और 80 के दशक की सैकड़ों फिल्मों (जैसे नमक हलाल, काला पत्थर, लावारिस) की कहानी एक ही ढर्रे पर चलती थी:
- फैक्टरी या कोयला खदान का मालिक (अक्सर सूट-बूट पहने, सिगार पीता हुआ अमीर आदमी) बेहद क्रूर है। वह मजदूरों का खून चूसता है, सुरक्षा उपकरण नहीं देता और मुनाफा कमाता है।
- दूसरी तरफ, कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रेरित ट्रेड यूनियन लीडर को एक मसीहा के रूप में दिखाया जाता था जो लाल झंडा उठाकर हड़ताल करता है।
- राजनीतिक पोल-खोल: परदे पर दिखाई गई इस ‘मजदूर क्रांति’ ने असल जिंदगी में भारत के औद्योगिक विकास की कमर तोड़ दी। मुंबई (तब बॉम्बे) की कपड़ा मिलें, जो कभी देश की आर्थिक रीढ़ थीं, वे इन्हीं वामपंथी ट्रेड यूनियनों (जैसे दत्ता सामंत के आंदोलन) की अंतहीन हड़तालों के कारण हमेशा के लिए बंद हो गईं। लाखों लोग बेरोजगार हो गए, लेकिन बॉलीवुड फिल्मों ने कभी इस बात की पोल नहीं खोली कि इन हड़तालों के पीछे कम्युनिस्ट नेताओं के अपने राजनीतिक और वित्तीय हित थे।
3. इंदिरा गांधी सरकार, सेंसरशिप और मूक सहमति
इस दौर की कांग्रेस सरकार ने फिल्मों के इस वामपंथी झुकाव को रोकने के बजाय इसका राजनीतिक इस्तेमाल किया।
- अमृत नाहटा की ‘किस्सा कुर्सी का’ (1977): इस फिल्म में इंदिरा गांधी और संजय गांधी की आपातकाल की राजनीति पर सीधा व्यंग्य था। सरकार इस कदर डरी हुई थी कि फिल्म के ओरिजिनल प्रिंट्स को सेंसर बोर्ड के दफ्तर से मंगाकर कथित तौर पर जला दिया गया।
- गठजोड़ का सच: सरकार केवल उन फिल्मों को बैन या सेंसर करती थी जो सीधे नेहरू-गांधी परिवार पर हमला करती थीं। लेकिन जो फिल्में देश के पूंजीपतियों को गाली देती थीं, न्याय व्यवस्था का मजाक उड़ाती थीं या सामाजिक ताने-बाने को तोड़ती थीं, उन्हें सेंसर बोर्ड आसानी से पास कर देता था। कारण साफ था—जितना ज्यादा जनता पूंजीपतियों से नफरत करेगी, सरकार के लिए बैंकों का राष्ट्रीयकरण और समाजवादी नीतियां लागू करना उतना ही आसान होगा।
4. समानांतर सिनेमा (Parallel Cinema) और ‘बौद्धिक’ प्रोपेगैंडा
70 के दशक में मुख्यधारा के सिनेमा के साथ-साथ ‘आर्ट सिनेमा’ या समानांतर सिनेमा का उभार हुआ, जिसे पूरी तरह से सरकारी संस्था NFDC (National Film Development Corporation) द्वारा फंड किया जाता था।
- चेहरे: श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी, शबाना आज़मी, नसीरुद्दीन शाह और ओम पुरी इस आंदोलन के मुख्य चेहरे थे।
- एजेंडे का स्वरूप: अंकुर (1974), निशांत (1975), और आक्रोश (1980) जैसी फिल्मों में ग्रामीण भारत, सामाजिक व्यवस्था और पारंपरिक हिंदू समाज को इस कदर दमनकारी और क्रूर दिखाया गया जैसे वहाँ मानवता बची ही न हो। इन फिल्मों को अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में भेजकर भारत की एक अत्यंत पिछड़ी और हिंसक छवि दुनिया के सामने पेश की गई, जिसे वामपंथी बुद्धिजीवियों ने ‘सच्चा सिनेमा’ कहकर प्रचारित किया।
इस दौर की पोल-खोल का निष्कर्ष
1970 और 1980 के दशक के सिनेमा ने भारतीय युवाओं के भीतर एक गहरे ‘सिस्टम के प्रति आक्रोश’ (Anti-Establishment Rage) को जन्म दिया। इस आक्रोश का इस्तेमाल देश के औद्योगिक विकास को रोकने और ट्रेड यूनियन की गुंडागर्दी को सामाजिक स्वीकृति दिलाने के लिए किया गया। उद्योगपतियों को खलनायक बनाने की जो शुरुआत 50 के दशक में हुई थी, वह इस दौर में अपने चरम पर पहुँच गई।