‘टोबा टेक सिंह’: विभाजन की करुण गाथा या ऐतिहासिक अपराधियों पर पर्दा डालने की चालाकी?
‘टोबा टेक सिंह’ को प्रगतिशील साहित्य में “विभाजन के बेतुकेपन का महान आख्यान” कहा जाता है। इसमें भारत और पाकिस्तान की सरकारों द्वारा पागलों की अदला-बदली के फ़ैसले के बीच बिशन सिंह (टोबा टेक सिंह) नाम के एक सिख पागल की कहानी है, जो अंत में दोनों देशों के बीच की ज़मीन (‘नो मैन्स लैंड’) पर दम तोड़ देता है।
१. ऐतिहासिक अपराध को केवल ‘पागलपन’ का नाम देना
कथानक का खेल: मंटो ने विभाजन की पूरी महा-त्रासदी को दो सरकारों के एक “मूर्खतापूर्ण निर्णय” और जनमानस के “सामूहिक पागलपन” के रूप में पेश किया।
पोस्टमार्टम: १९४७ का विभाजन कोई अचानक भड़का पागलपन नहीं था। यह दशकों से चले आ रहे मुस्लिम लीग के द्वि-राष्ट्र सिद्धांत (Two-Nation Theory), जिन्ना की ‘डायरेक्ट एक्शन’ की हिंसक धमकी और कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा विभाजन की माँग को दिए गए बौद्धिक समर्थन (जैसे ‘अधिकारी थिसिस’) का परिणाम था। मंटो ने पूरे इतिहास को केवल एक ‘पागलपन’ बताकर उन राजनीतिक और वैचारिक आक्रांताओं को पूरी तरह बरी कर दिया, जिन्होंने इस नरसंहार की नींव रखी थी।
२. ‘बिशन सिंह’ के माध्यम से राष्ट्रीय पहचान का निषेध
कथानक का खेल: बिशन सिंह केवल अपने गाँव ‘टोबा टेक सिंह’ को ढूँढता है। उसके लिए भारत या पाकिस्तान का कोई अर्थ नहीं है।
पोस्टमार्टम: मंटो ने यह स्थापित करने का प्रयास किया कि आम नागरिक के लिए राष्ट्र, संस्कृति, भूगोल या स्वतंत्रता का कोई मूल्य नहीं होता; उसके लिए केवल उसका छोटा-सा कस्बा या गाँव ही सत्य है। यह राष्ट्रीय चेतना (National Consciousness) और सांस्कृतिक निष्ठा को ‘अज्ञानता’ सिद्ध करने का वामपंथी प्रयास था।
३. राज्य (State) का दानवीकरण
कथानक का खेल: भारत और पाकिस्तान दोनों की राज्य-सत्ता को संवेदनहीन, मूर्ख और क्रूर दिखाया गया।
पोस्टमार्टम: मंटो ने पीड़ित देश (भारत) और विभाजन थपने वाले विचार (पाकिस्तान) को एक ही पलड़े में रख दिया। आक्रांता और पीड़ित राज्य के अंतर को मिटाकर दोनों को समान रूप से दोषी ठहराना ही प्रगतिशील लेखकों का मुख्य एजेंडा रहा है।
सद्गति का पोस्टमार्टम: सामाजिक यथार्थ का चित्रण या समाज में घृणा फैलाने का एजेंडा?