🎭 गीत: धुंध से उजाले तक
[मुखड़ा]
अटारी पर जो बैठी हैं, वो सदियों की किताबें हैं,
मगर इस ज़ेहन में उलझे, कई अनसुलझे सवाल हैं
चलो अब मोड़ते हैं रुख, इस बहती हुई स्याही का,
बनाते हैं नया मिज़ाज, इस भटके हुए राही का।
[अंतरा १]
कभी उलाहनों की आंच में, जो बदन जलता था,
वही अब तर्कों की भट्टी में, जीत बन के उबलता है।
मैं ढूँढने निकला था सच, पर अहंकार बुन बैठा,
अपनों को ही हराने की, अनजानी ज़िद चुन बैठा।
वो चेहरों की गर्माहट, वो लहू का तेज़ बह जाना,
जीत कर भी फिर अकेले में, खुद ही से लजाना।
(मुखड़े की टेक: चलो अब मोड़ते हैं रुख…)
[अंतरा २]
मगर ओ रातों के राही! तू ये कैसा युद्ध लड़ता है?
किताबों के समंदर में, तू क्यों पतवार कतरता है?
ज्ञान का मकसद तो बस, दिलों में दीए जलाना था,
अपनों को ही झुका कर, तुझे किस दर पर जाना था?
वह जो फटे जूते सा भोला, इतिहास नहीं जानता,
राजनीति के इस शोर में, जो सच-झूठ नहीं पहचानता।
(मुखड़े की टेक: चलो अब मोड़ते हैं रुख…)
[अंतरा ३ / आख़िरी अंतरा]
वह तेरा अपना ही तो है, जो महफ़िल में बैठा है,
उसे नीचा दिखाने में, भला कैसा बड़प्पन है?
बहस की इस कचहरी में, अब हम गवाह न होंगे,
जीत कर अपनों का दिल, हम खुद से जुदा न होंगे।
अब जब भी आंच उठेगी, हम मौन धर जाएंगे,
अहंकार के मुखौटे को, हँस कर उतार आएंगे।
[गीत का निष्कर्ष / टेक]
लिखेंगे दिल के कागज़ पर, एक नया सा अफ़साना,
कि सबसे बड़ी जीत है— खुद अपने अहंकार को हराना।