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शून्यता और सप्तरंग

होली केवल वसंत का उत्सव नहीं, बल्कि अस्तित्व के उत्सव की एक दार्शनिक घोषणा है। यह पर्व हमें सिखाता है कि जीवन एक ‘कोरा कैनवास’ है, जिस पर नियति अपने रंग बिखेरती है, लेकिन उन रंगों के बीच अपनी ‘मौलिकता’ को बचाए रखना ही सबसे बड़ी साधना है।

 

१. विसर्जन की कला: अहंकार की आहुति

दार्शनिक रूप से, ‘होलिका दहन’ केवल एक पौराणिक घटना का स्मरण नहीं है, बल्कि यह स्व-विसर्जन की प्रक्रिया है। अग्नि का गुण है—रूपांतरण। वह लकड़ी को राख बनाकर उसके स्थूल रूप को समाप्त कर देती है। ठीक इसी तरह, जब हम अपने भीतर की ईर्ष्या, क्रोध और ‘मैं’ के भाव को इस उत्सव की अग्नि में झोंक देते हैं, तो जो शेष बचता है, वह है—शुद्ध चैतन्य। राख (भस्म) हमें याद दिलाती है कि अंततः यह शरीर और इसके सारे अभिमान मिट्टी में ही मिल जाने हैं, इसलिए जो क्षण अभी हाथ में है, उसे प्रेम के रंग में रंगना ही बुद्धिमानी है।

 

2. विविधता में एकता का ‘अद्वैत’

संसार सप्तरंगी है। लाल रंग ‘शक्ति’ का है, पीला ‘ज्ञान’ का, नीला ‘विशालता’ का और हरा ‘प्रकृति’ का। सामान्य दिनों में हम इन रंगों को अलग-अलग श्रेणियों में देखते हैं—जैसे समाज जातियों, धर्मों और वर्गों में बँटा है। लेकिन होली के दिन, जब गुलाल हवा में उड़ता है, तो वह चेहरों की पहचान मिटा देता है। रंग लगने के बाद न कोई राजा रहता है, न रंक; न ब्राह्मण, न शूद्र। यह ‘अद्वैत’ की साक्षात अनुभूति है—जहाँ ‘भेद’ समाप्त हो जाता है और केवल ‘अभेद’ शेष रहता है। यह हमें सिखाता है कि हमारी बाहरी विभिन्नताएँ केवल ऊपरी आवरण हैं, भीतर से हम सब एक ही ऊर्जा का हिस्सा हैं।

 

3. ‘बुरा न मानो’ का जीवन दर्शन

“बुरा न मानो होली है”—यह वाक्य सुनने में साधारण लगता है, पर इसके भीतर क्षमा और स्वीकार्यता का महान दर्शन छिपा है। यह हमें ‘स्थितप्रज्ञ’ होने की प्रेरणा देता है। जीवन में कई बार अनचाहे रंग (दुख, असफलता, अपमान) हमारे ऊपर डाले जाते हैं। यह दर्शन कहता है कि उन रंगों को सहजता से स्वीकार करो, उन पर प्रतिक्रिया देकर अपनी शांति भंग मत करो। जैसे शाम होते ही हम रंग धोकर साफ हो जाते हैं, वैसे ही मन पर लगे कड़वाहट के रंगों को भी धो डालना चाहिए ताकि हृदय फिर से ‘कोरा’ और ‘निर्मल’ हो सके।

 

4. शून्य से पूर्ण की यात्रा

सफेद रंग (जो अक्सर होली के कपड़ों का आधार होता है) पूर्णता और शून्यता दोनों का प्रतीक है। जब सारे रंग मिलते हैं, तो वे अंततः गहरे धूसर या मिट्टी के रंग में बदल जाते हैं। यह इस बात का संकेत है कि जीवन के तमाम अनुभवों (सुख-दुख) का निचोड़ समता है। जो व्यक्ति रंगों के बीच रहकर भी निर्लिप्त रहना सीख जाता है, वही वास्तव में होली मनाता है।

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