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बरखा ऋतु का अनुपम वरदान: सावन मास की सांस्कृतिक एवं धार्मिक महिमा

 

कइसे खेले जाइब सावन में कजरिया,

बदरिया घेरि आइल ननदी…।

तू त चललू अकेली, केहू सँगे ना सहेली;

गुंडा घेरि लीहें तोहरी डगरिया…

बदरिया घेरि आइल ननदी।

​संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप के लोक-मानस, कृषि और अध्यात्म को यदि कोई एक महीना सबसे गहरे स्तर पर प्रभावित करता है, तो वह है पावन सावन (श्रावण) का महीना। यह केवल एक कालखंड नहीं, बल्कि प्रकृति के शृंगार, महादेव की भक्ति और विरह-मिलन के गीतों का उत्सव है। आषाढ़ की तपती प्रतीक्षा के बाद, सावन भारतीय जीवन में नवजीवन का संचार बनकर बरसता है।

 

भौगोलिक, खगोलीय और क्षेत्रीय कैलेंडर में सावन

​भारतीय राष्ट्रीय पंचांग (Saka Calendar), जो सूर्य और चंद्रमा की गतियों पर आधारित है, उसके अनुसार सावन वर्ष का पाँचवाँ महीना होता है। परंतु, दक्षिण एशियाई उपमहाद्वीप के विभिन्न क्षेत्रीय कैलेंडरों में इसकी गणना बड़ी दिलचस्प है:

​नेपाल और बंगाल: नेपाल के आधिकारिक कैलेंडर (विक्रम संवत) और बंगाली नववर्ष कैलेंडर (पोइला बैशाख से शुरू) के हिसाब से यह साल का चौथा महीना होता है।

​मानसून का आधार: खगोलीय रूप से इस महीने में आकाश श्रावण नक्षत्र से युक्त होता है, इसीलिए इसे ‘श्रावण’ कहा जाता है। ऋतु चक्र के अनुसार, आषाढ़ के बाद सावन बरखा ऋतु का दूसरा और सबसे मुख्य महीना है, जब मानसून पूरी तरह से भारतीय उपमहाद्वीप को अपनी आगोश में ले लेता है।

 

​कृषि प्रधान जीवन और बरखा का महत्व

​भारत की आत्मा गाँवों में बसती है और गाँवों का जीवन मॉनसून पर निर्भर है। सावन आते ही सूखी धरती हरी चुनरी ओढ़ लेती है। यह वह समय होता है जब किसान अपने खेतों में धान की फसल की रोपनी की शुरुआत करते हैं। खेतों में जमा पानी, मेंढकों की टरटराहट और मिट्टी की सोंधी महक भारतीय ग्रामीण जीवन को जीवंत बना देती है। सावन की झड़ी केवल प्यास नहीं बुझाती, बल्कि देश के अन्न भंडार और समृद्धि का मार्ग भी प्रशस्त करती है।

 

आध्यात्मिक पक्ष: शिव-पार्वती की आराधना और व्रत विधान

​धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से सावन मास को सर्वश्रेष्ठ और परम पवित्र माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, यह पूरा महीना भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा-अर्चना के लिए सर्वोत्तम है। मान्यता है कि इसी महीने में माता पार्वती ने कठोर तपस्या करके शिव जी को पति रूप में प्राप्त किया था।

सावन की सोमवारी: सावन के प्रत्येक सोमवार (सोमवारी) को व्रत रखने का विशेष विधान है। इस दिन शिवभक्त शिवालयों में जाकर शिवलिंग पर गंगाजल, बेलपत्र, धतूरा और दूध अर्पित करते हैं।

मंगला गौरी व्रत: सोमवारी जहाँ महादेव को समर्पित है, वहीं सावन के प्रत्येक मंगलवार को माता पार्वती की प्रसन्नता के लिए “मंगला गौरी व्रत” रखने का विधान है। यह व्रत सौभाग्य, सुहाग की लंबी आयु और जीवन की बाधाओं को दूर करने वाला माना गया है।

 

​सावन मास के मुख्य त्यौहार और मेले

​सावन का महीना लोक-उत्सवों का महीना है। इस दौरान भारत की सांस्कृतिक विविधता इन त्योहारों के रूप में बिखरती है:

हरियाली तीज: सावन शुक्ल तृतीया को मनाया जाने वाला यह त्योहार प्रकृति के नव-शृंगार और सुहाग का प्रतीक है। महिलाएँ पैरों में महावर लगाती हैं, झूला झूलती हैं और लोकगीत गाती हैं।

नागपंचमी: सावन मास के प्रमुख त्योहारों में से एक, जहाँ प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व को स्वीकारते हुए नाग देवता की पूजा की जाती है।

​रक्षाबंधन (श्रावणी पूर्णिमा): सावन के अंतिम दिन, यानी पूर्णिमा को भाई-बहन के पवित्र प्रेम का प्रतीक ‘रक्षाबंधन’ मनाया जाता है। इसी दिन वैदिक परंपरा में ‘श्रावणी उपाकर्म’ भी होता है।

​विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेला: सावन के पूरे महीने बिहार के सुल्तानगंज से लेकर झारखंड के बाबाधाम (देवघर) तक १०५ किलोमीटर की दूरी ‘बोल-बम’ के नारों से गुंजायमान रहती है। लाखों ‘काँवरिया’ सुल्तानगंज से उत्तरवाहिनी गंगा का जल लेकर पैदल बाबा बैद्यनाथ को जल अर्पण करने निकलते हैं। यह विश्व का सबसे लंबा पैदल धार्मिक मेला माना जाता है।

 

लोक संस्कृति का प्राण: कजरी गायन

​सावन की बात हो और ‘कजरी’ का ज़िक्र न हो, ऐसा संभव ही नहीं है। कजरी मुख्य रूप से बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश (पूर्वांचल) का अत्यंत प्रसिद्ध और पारंपरिक लोकगीत है। सावन के झूलों और रिमझिम फुहारों के बीच विरह, प्रेम और सामाजिक ताने-बाने को समेटे हुए कजरी गाई जाती है।

​समय के साथ कजरी केवल चौपालों तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह अर्ध-शास्त्रीय गायन (Semi-Classical) की एक अनूठी विधा के रूप में विकसित हुई। इसके शास्त्रीय स्वरूप को सहेजने और निखारने में बनारस घराने का बहुत बड़ा और विशेष दखल है। सावन के सन्नाटे में जब ढोलक और मंजीरे की थाप पर कजरी के सुर गूँजते हैं, तो पूरा वातावरण रसमयी हो जाता है।

​”केतने जना खइहें गोली,

केतने जइहें फँसिया डोरी;

केतने जना पीसिहें जेहल में चकरिया…

बदरिया घेरि आइल ननदी।”

​यह केवल विरह का गीत नहीं है, बल्कि इसमें भारत के स्वतंत्रता संग्राम के समय के उस दौर की भी झलक मिलती है, जब सावन के गीतों के माध्यम से भी देशप्रेम और क्रांति की बातें लोक-मानस तक पहुँचाई जाती थीं।

 

निष्कर्ष

​सावन मास प्रकृति, संस्कृति और अध्यात्म का वह अनुपम कोलाज है जो मनुष्य को ईश्वर के और करीब लाता है। यह सिखाता है कि जीवन में कितनी भी शुष्कता (गर्मी) क्यों न आए, धैर्य रखने पर सावन की फुहारें खुशियों की फसल बनकर ज़रूर बरसती हैं।

बोलिए…

बम भोले…

बम-बम भोले…

भोले बाबा पार करेगा!

 

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