परिचय
युयुत्सु, महाभारत के प्रमुख और अद्वितीय पात्रों में से एक थे। वह हस्तिनापुर नरेश धृतराष्ट्र के पुत्र थे, लेकिन उनका स्थान कौरवों और पांडवों के बीच धर्म-संकट के कारण विशेष है। युयुत्सु को इसलिए याद किया जाता है क्योंकि महाभारत युद्ध शुरू होने से ठीक पहले, उन्होंने अपने भाइयों (कौरवों) की सेना का साथ छोड़कर पांडव सेना में शामिल होने का ऐतिहासिक निर्णय लिया।
जन्म और आरंभिक जीवन
धृतराष्ट्र के पुत्र युयुत्सु का जन्म
युयुत्सु का जन्म तब हुआ जब गांधारी गर्भवती थीं। उनकी माता गांधारी की एक वणिक वर्ग की दासी थीं, जिसकी सेवा से प्रसन्न होकर धृतराष्ट्र ने उससे सहवास किया। इसी संबंध के परिणामस्वरूप युयुत्सु का जन्म हुआ। चूँकि वह सीधे धृतराष्ट्र के पुत्र थे, इसलिए उन्हें राजकुमारों जैसा सम्मान, उच्च शिक्षा, और अधिकार प्राप्त हुए।
पांडव पक्षीय योद्धा और धर्मनिष्ठा
युयुत्सु की धर्मनिष्ठा और दुर्योधन से विरोध
महात्मा विदुर की तरह ही युयुत्सु भी उच्च कोटि के धर्मात्मा थे। वह अपने सौतेले भाई दुर्योधन और अन्य कौरवों की अन्यायपूर्ण और अनुचित गतिविधियों को बिल्कुल भी पसंद नहीं करते थे, और अक्सर उनका खुलकर विरोध करते थे। इस कारण कौरव उनका अनादर करते और मज़ाक उड़ाते थे। युयुत्सु ने अपनी ओर से महाभारत युद्ध रोकने के अनेक प्रयास किए, पर सफल नहीं हो सके।
युद्ध से पहले पक्ष-परिवर्तन
जब युद्ध प्रारंभ हुआ, तो युयुत्सु आरम्भ में कौरवों की ओर ही थे। लेकिन युद्ध शुरू होने से पहले, धर्मराज युधिष्ठिर ने कौरव सेना को संबोधित करते हुए एक ऐतिहासिक घोषणा की:
“मेरा पक्ष धर्म का है। जो धर्म के लिए लड़ना चाहते हैं, वे अभी भी मेरे पक्ष में आ सकते हैं। मैं उनका स्वागत करूंगा।”
इस धर्म के आह्वान को सुनकर, केवल युयुत्सु ही थे जिन्होंने विचार किया, और तुरंत अपनी सेना (कौरव पक्ष) से निकलकर पांडवों की सेना की ओर आ गए। युधिष्ठिर ने उन्हें गले लगाकर उनका स्वागत किया। इस निर्णय ने युयुत्सु को धर्म के पथ पर चलने वाले धृतराष्ट्र पुत्र के रूप में अमर कर दिया।
रणनीतिक भूमिका: युद्ध में युयुत्सु का कार्य
युधिष्ठिर द्वारा सौंपा गया महत्वपूर्ण दायित्व
युधिष्ठिर एक दूरदर्शी रणनीतिकार थे। उन्होंने युयुत्सु की ईमानदारी और प्रबंधन क्षमता को समझते हुए, उन्हें सीधे युद्ध के मैदान में नहीं उतारा। इसके बजाय, उन्हें एक अत्यंत महत्वपूर्ण रणनीतिक कार्य सौंपा गया:
योद्धाओं के लिए हथियारों और रसद की आपूर्ति व्यवस्था का प्रबंधन।
युयुत्सु ने पांडवों की ७ अक्षौहिणी सेना की आपूर्ति का दायित्व पूरी ज़िम्मेदारी से निभाया। उनके कुशल प्रबंधन के कारण, युद्ध के दौरान पांडव पक्ष को कभी भी हथियारों या रसद की कमी नहीं हुई। यह भूमिका युद्ध जीतने में उतनी ही महत्वपूर्ण थी, जितनी कि सीधे युद्ध में लड़ना।
युद्धोपरांत जीवन और विरासत
युयुत्सु: १८ जीवित योद्धाओं में से एक
युयुत्सु उन १८ योद्धाओं में से एक थे जो भीषण महाभारत युद्ध के बाद जीवित बचे थे।
मंत्री : युद्ध समाप्त होने पर, महाराजा युधिष्ठिर ने उन्हें अपना मंत्री बनाया।
परीक्षित के संरक्षक: जब पांडव सशरीर स्वर्ग जाने लगे, तो युधिष्ठिर ने परीक्षित को राजा बनाया और युयुत्सु को उनका संरक्षक (गार्डियन) नियुक्त किया।
पुत्र धर्म: धृतराष्ट्र की मृत्यु के बाद, युयुत्सु ने ही उन्हें मुखाग्नि देकर एक सच्चे पुत्र का धर्म निभाया।
वंशज
ऐसी मान्यता है कि वर्तमान समय में उत्तरप्रदेश के पश्चिमी और राजस्थान के पूर्वी भागों में निवास करने वाले जाट जाति के लोग, उन्हीं धर्मात्मा महात्मा युयुत्सु के वंशज हैं।
विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’