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📜 1924-25 का विवाद: बन्दा वैरागी धर्म का शत्रु या रक्षक?

​1924-25 में, पंजाब के प्रमुख नेता डॉ. सत्यपाल (जो ‘रौलेट एक्ट’ आंदोलन में विख्यात थे) ने भाई परमानन्द की पुस्तक ‘बन्दा वैरागी’ के संदर्भ में बन्दा को ‘हिन्दू धर्म के विपरीत आचरण करने वाला’ कहा।

​विवाद का कारण: बन्दा वैरागी ने मुसलमानों के विरुद्ध जो निर्दयता दिखाई थी (जैसा कि कथित है), उसके कारण देश के बड़े वर्ग (हिन्दू, मुसलमान, और सिख) में यह धारणा थी कि वह धर्म के शत्रु थे।

​भाई परमानन्द का दृष्टिकोण: उन्होंने अपनी पुस्तक में बन्दा वैरागी को ‘हिन्दू धर्म के रक्षक’ की उपाधि दी।

 

​🏰 मुगल शासन में हिन्दुओं की स्थिति (16वीं से 18वीं शताब्दी)

​बन्दा वैरागी के कार्यों का सही मूल्यांकन करने के लिए, मुगल साम्राज्य के दौरान हिन्दुओं की स्थिति को समझना आवश्यक है:

​1. प्रारम्भिक अत्याचार (जहाँगीर और शाहजहाँ)

​मुगलों का शासन स्थापित होने के बाद, हिन्दुओं को क्रीत दास (खरीदे हुए गुलाम) की तरह माना जाता था। स्वार्थी हिन्दुओं के सहयोग से ही मुगलों ने करोड़ों हिन्दुओं पर शासन किया।

​अकबर का काल: शुरुआत में, विस्तार के दौरान अकबर ने कुछ हद तक सहयोग दिखाया—जज़िया और तीर्थ-यात्रा कर हटा दिया गया।

​राज्य सुदृढ़ होने पर: ज्यों-ज्यों राज्य सुदृढ़ होता गया, हिन्दुओं का उत्पीड़न बढ़ता गया।

​जहाँगीर का राज्य: गुरु अर्जुन देव के बलिदान से प्रारम्भ हुआ। गुरु हरगोबिंद को भी बंदी बनाया गया।

​शाहजहाँ का राज्य: पक्का सुन्नी मुसलमान होने के कारण वह धार्मिक पक्षपात करता था।

​स्कूलों के इतिहास में भी उसका धार्मिक पक्षपात दर्ज है।

​यूरोपीय यात्री डैलावैली के अनुसार, शाहजहाँ ने रुपया लेकर खम्भात में गो-हत्या बंद की, जिससे अनुमान लगाया जा सकता है कि सामान्यतः वह कितना कठोर रहा होगा।

​उसकी पत्नी मुमताज महल को विधर्मियों (हिन्दुओं और ईसाइयों) के प्रति निर्मम हत्याएँ कराने का कारण बताया जाता है।

​2. औरंगज़ेब के शासन में चरम अत्याचार

​डॉ. आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव अपनी पुस्तक The Mughul Empire में औरंगज़ेब के शासन का वर्णन करते हैं:

​१. इस्लामी सिद्धांत पर शासन: औरंगज़ेब का उद्देश्य भारत को दारा-उल-हरब (काफ़िरों का देश) से दारा-उल-इस्लाम (इस्लाम का देश) बनाना था।

२. ​मजहबी प्रचार में राज्य शक्ति का उपयोग: उसने राज्य की पूरी शक्ति इस्लाम के प्रचार में लगा दी।

३. ​मंदिरों और विद्यालयों का विनाश:

​पुराने मंदिरों की मरम्मत पर रोक लगाई गई।

​सभी प्रांतों के हाकिमों को काफिरों के सभी विद्यालय और मंदिर गिराने का सख्त आदेश दिया गया।

​मुहतासिव (इस्लामी नियमों का पालन कराने वाले) घूम-घूम कर मूर्तियाँ और मंदिर विनष्ट करते थे।

​काशी का विश्वनाथ मंदिर, मथुरा का केशव देव मंदिर, और पाटन का सोमनाथ मंदिर गिराकर ज़मीन में मिला दिए गए।

​मित्र हिन्दू राजाओं के राज्यों (जैसे जयपुर) में भी मंदिरों को नहीं बख्शा गया।

​तोड़फोड़ के दौरान गो-हत्या की जाती थी और मूर्तियों को सड़कों पर अपमानित किया जाता था।

४. ​आर्थिक उत्पीड़न:

​1678 में पुनः जजिया कर लगाया गया, जिसका उद्देश्य इस्लाम का प्रसार करना था।

​तीर्थ-यात्रा कर भी लगाया गया (तीर्थ स्नान पर ₹6/4 आना)।

​वस्तुओं पर हिन्दुओं से 5% कर लिया जाता था, जबकि मुसलमानों से नहीं।

​औरंगज़ेब की मृत्यु (1707) के बाद भी बहादुरशाह और फर्रुखसियर के राज्य में हिन्दुओं को कोई राहत नहीं मिली।

 

🗡️ बन्दा वैरागी का पंजाब आगमन और पतन

​इस भयावह काल में, गुरु तेग बहादुर और गुरु गोविन्द सिंह के बच्चों के बलिदान के बाद, बन्दा वैरागी पंजाब में आए। उनके कार्य उस समय के मुगल अत्याचारों का प्रतिशोध मात्र थे।

​बन्दा के पतन के कारण

​आलेख में बन्दा वैरागी के पतन के दो मुख्य कारण बताए गए हैं, जिन्हें देश की “मूर्खता” कहा गया है:

​1. गुरु-पद का अभाव और घटती श्रद्धा

​सिखों के लिए गुरु का पद परमात्मा के समान था।

​गुरु गोविंद सिंह ने अपने बाद कोई नया गुरु न होने की घोषणा की थी। यदि बन्दा वैरागी को गुरु-पद मिला होता (चूँकि गुरु गोविंद सिंह ने उन्हें आशीर्वाद और तलवार दी थी), तो वह नई व्यवस्था बनाकर सिखों में वह श्रद्धा और भक्ति बनाए रख सकते थे जो गुरुओं के लिए थी।

​युद्ध की स्थिति में बन्दा की वह त्याग और तपस्या नहीं रह सकी जो केवल धर्म प्रचार के समय गुरुओं में थी, जिससे सिखों की दृष्टि में उनकी मान-प्रतिष्ठा कम हो गई।

​2. सिखों की राजनीतिक अनभिज्ञता और मुगलों की फूट डालो नीति

​हिन्दू और सिख राजनीति से पूरी तरह अनभिज्ञ थे।

​फर्रुखसियर के गुप्तचरों ने सिखों में फूट डालने के लिए गुरु गोविंद सिंह की पत्नियों को भड़काया और बन्दा के विरुद्ध अश्रद्धा रखने वाले ‘तत्व खालसा’ नामक सिख समूह को एक पत्र लिखवाकर बन्दा और सिखों में फूट डलवा दी।

​दिल्ली के शहंशाह ने बन्दा की सेना छोड़ने वाले सिखों को ₹1 प्रति दिन के वेतन पर शाही सेना में भर्ती कर लिया।

​तत्व खालसा के साथ संधि: दिल्ली के शहंशाह ने अमृतसर दरबार साहिब को ₹5,000 दिए और तत्व खालसा ने निम्न शर्तों पर संधि कर ली:

​खालसा लूटमार नहीं करेंगे।

​खालसा बन्दा की सहायता नहीं करेंगे।

​विदेशी आक्रमण पर खालसा दिल्ली के लिए लड़ेंगे।

​खालसाओं की जागीरें छीनी नहीं जाएंगी।

​हिन्दुओं को विवश कर इस्लाम स्वीकार नहीं कराया जाएगा।

​हिन्दुओं के साथ दुर्व्यवहार नहीं होगा और उनकी मजहबी बातों में दखल नहीं दिया जाएगा।

 

​बन्दा वैरागी का बलिदान

​इस संधि के कारण तत्व खालसा बन्दा के विरुद्ध प्रचार करने लगे। अंततः बन्दा वैरागी को पकड़ लिया गया और अपने सात सौ साथियों के साथ दिल्ली के चांदनी चौक में अनेक कष्ट देकर मार डाला गया।

​परिणाम: इस घटना के कुछ ही समय बाद, सिक्खों के साथ हुई संधि भंग हो गई, और मुगलों ने सिखों का फिर से दमन करना शुरू कर दिया।

 

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