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हाथों की गंदगी छिप जाए,

इसलिए पहने हैं ‘दस्ताने’,

अपनी फितरत बदल न सके,

बस ढूंढ लिए सौ बहाने।

 

हाथ कभी माटी को छूकर,

सृजन के गीत गाते थे,

अब ‘दस्तानों’ में कैद होकर,

षडयंत्रों को सजाते हैं।

 

खून के धब्बे न दिखें कहीं,

इसलिए रेशम का ये खोल है,

भीतर कलाई काँप रही,

पर बाहर सलीका अनमोल है।

 

स्पर्श की गर्माहट खो दी,

सुरक्षा के इस ढोंग में,

अब कोई भी हाथ थामे, तो

चुभन होती है हर अंग में।

 

ये राजनीति के दस्ताने हैं,

या धर्म की ओट के पर्दे हैं?

जो न्याय की गर्दन घोंट रहे,

वो हाथ बड़े ही गर्दे हैं।

 

सत्ता ने हाथों में इसे चढ़ाकर,

अपना चेहरा चमकाया है,

पर मासूमों के आंसुओं ने,

हर बुनावट को भिंगाया है।

 

उतारना ही पड़ेगा दोस्त,

कफन से पहले दस्तानों को,

देने होंगे हिसाब रूह को,

न कि इन पापी दस्तानों को।

 

विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

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