विष्णु गणेश पिंगले: गदर पार्टी का वह जांबाज क्रांतिकारी, जिसने हिला दी थी ब्रिटिश साम्राज्य की नींव
भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में विष्णु गणेश पिंगले एक ऐसा नाम है, जिन्होंने सात समंदर पार अमेरिका में इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़कर मातृभूमि को बेड़ियों से आजाद कराने का रास्ता चुना। गदर पार्टी के इस निडर सेनानी ने रास बिहारी बोस जैसे क्रांतिकारियों के साथ मिलकर ब्रिटिश सेना के भीतर विद्रोह की ज्वाला सुलझाने का साहसिक प्रयास किया था।
१. जन्म और प्रारंभिक जीवन
विष्णु गणेश पिंगले का जन्म २ जनवरी, १८८८ को महाराष्ट्र के पुणे जिले के तलेगांव गांव में हुआ था। वे बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। अपनी उच्च शिक्षा के लिए वे वर्ष १९११ में अमेरिका चले गए, जहाँ उन्होंने सिएटल विश्वविद्यालय के इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश लिया।
२. अमेरिका में ‘गदर’ की शुरुआत
इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान ही विष्णु पिंगले का संपर्क प्रसिद्ध क्रांतिकारी लाला हरदयाल से हुआ। लाला हरदयाल के क्रांतिकारी विचारों ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। यहीं उनकी मित्रता महान क्रांतिकारी करतार सिंह सराभा से हुई। देश को स्वतंत्र कराने के लिए गदर (सशस्त्र विद्रोह) पैदा करने के उद्देश्य से वे अपने साथियों के साथ वापस भारत लौट आए।
३. सशस्त्र क्रांति की योजना (लाहौर षडयंत्र)
भारत लौटने के बाद पिंगले ने ब्रिटिश इंडिया की फौजों में क्रांति लाने की योजना बनाई।
समन्वय: उन्होंने कोलकाता में क्रांतिकारी रास बिहारी बोस से मुलाकात की।
विस्तार: वे शचीन्द्रनाथ सांयाल को लेकर पंजाब चले आए, जहाँ पंजाब, बंगाल और उत्तर प्रदेश की सैनिक छावनियों में विद्रोह का पूरा खाका तैयार किया गया।
४. गद्दारी और गिरफ्तारी
२१ फरवरी, १९१५ को सशस्त्र विद्रोह की तिथि निश्चित की गई थी, लेकिन एक गद्दार की मुखबिरी के कारण सारी योजना विफल हो गई। विष्णु पिंगले को नादिर खान नामक व्यक्ति ने गिरफ्तार करवा दिया। गिरफ्तारी के वक्त उनके पास १० बम और महत्वपूर्ण दस्तावेज बरामद हुए थे।
५. शहादत: फांसी की सजा
विष्णु गणेश पिंगले पर ‘लाहौर षडयंत्र केस’ और ‘हिंदू-जर्मन षडयंत्र’ के तहत मुकदमा चलाया गया। उनकी वीरता का आलम यह था कि जेल की सलाखें भी उनके हौसले को कम नहीं कर सकीं। अंततः १७ नवम्बर, १९१५ को लाहौर की सेंट्रल जेल में उन्हें फांसी दे दी गई।
विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’