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रामानंद चट्टोपाध्याय: भारतीय पत्रकारिता के जनक और ‘मॉडर्न रिव्यू’ के ऋषि

​लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

 

​भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में रामानंद चट्टोपाध्याय एक ऐसे स्तंभ हैं, जिन्होंने पत्रकारिता को ‘व्यापार’ नहीं बल्कि ‘तपस्या’ माना। २९ मई, १८६५ को बंगाल के बाँकुड़ा में जन्मे रामानंद बाबू ने अपनी प्रखर मेधा और निर्भीक लेखनी से ब्रिटिश हुकूमत की चूलें हिला दी थीं। उनकी स्थापना ‘मॉडर्न रिव्यू’ और ‘विशाल भारत’ जैसी पत्रिकाओं ने भारत के बौद्धिक राष्ट्रवाद को वैश्विक प्रतिष्ठा दिलाई।

 

​प्रयाग से कलकत्ता: एक पत्रकार का संघर्ष

​रामानंद बाबू की कर्मयात्रा जितनी विविधतापूर्ण थी, उतनी ही चुनौतीपूर्ण भी। इलाहाबाद (प्रयाग) की ‘कायस्थ पाठशाला’ में प्रिंसिपल रहने के दौरान उन्होंने ‘कायस्थ समाचार’ को नया स्वरूप दिया। लेकिन उनकी असली पहचान तब बनी जब उन्होंने १९०७ में प्रयाग से ‘मॉडर्न रिव्यू’ का प्रकाशन आरंभ किया।

जब उत्तर प्रदेश (तत्कालीन यू.पी. प्रांत) की सरकार उनकी निर्भीक आलोचनाओं से घबराने लगी और उन्हें प्रांत छोड़ने का आदेश दिया, तब वे पुनः कलकत्ता लौट आए। यही कारण है कि इस पत्रिका का इतिहास इन दोनों महान नगरों से गहराई से जुड़ा है।

 

​टैगोर का विश्व-मंच और ‘इंडिया इन बॉण्डेज’ का साहस

​रामानंद बाबू की पारखी नजर ने ही गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की प्रतिभा को पहचाना और उनकी पहली अंग्रेजी रचना को ‘मॉडर्न रिव्यू’ में स्थान दिया। यह पत्रिका उस समय विश्व की शीर्ष छह पत्रिकाओं में गिनी जाती थी।

उनका साहस देखिए—जब उन्होंने अमेरिकी पादरी जे.टी. संडरलैंड की पुस्तक ‘इंडिया इन बॉण्डेज’ को प्रकाशित किया, तो सरकार ने उसे जब्त कर लिया और उन्हें दंडित किया। लेकिन रामानंद बाबू झुके नहीं। १९२६ में लीग ऑफ नेशंस की बैठक में वे अपने खर्च पर गए ताकि उनके विचारों पर किसी सरकारी आर्थिक मदद का दबाव न रहे।

 

​हिंदी प्रेम और ‘विशाल भारत’ की स्थापना

​रामानंद बाबू स्वयं बांग्ला भाषी थे, लेकिन वे जानते थे कि बिना हिंदी के भारतीय जनमानस तक पहुँचना संभव नहीं है। इसी उद्देश्य से उन्होंने हिंदी मासिक ‘विशाल भारत’ का प्रकाशन शुरू किया। इस पत्रिका ने न केवल हिंदी साहित्य को समृद्ध किया, बल्कि विदेश में रह रहे गिरमिटिया और प्रवासी भारतीयों की समस्याओं को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाया।

 

​पत्रकारिता के नैतिक मूल्य

​रामानंद बाबू की शैली तेजयुक्त और निर्लिप्त थी। वे केशवचंद्र सेन के प्रभाव में ब्रह्मसमाजी बने और आजीवन समाज सुधार के कार्यों में संलग्न रहे। उनके लिए पत्रकारिता राष्ट्र की सेवा का माध्यम थी। वे केवल एक संपादक नहीं, बल्कि एक युग-द्रष्टा थे जिन्होंने भारतीय मेधा को विश्व के सम्मुख गौरव के साथ प्रस्तुत किया।

 

​अश्विनी राय ‘अरुण’ का विचार

​मेरी दृष्टि में रामानंद चट्टोपाध्याय जी भारतीय पत्रकारिता के वह ‘भीष्म पितामह’ हैं, जिन्होंने सिखाया कि कलम की ताकत किसी भी साम्राज्य की बंदूक से बड़ी होती है। उन्होंने अपनी आर्थिक हानि सहकर भी विचारों की स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रखा। आज उनके जन्मदिवस पर उन्हें स्मरण करना दरअसल उन मूल्यों को याद करना है जो आज की पत्रकारिता में कहीं लुप्त होते जा रहे हैं।

​महान देशभक्त पत्रकार को शत-शत नमन!

 

 

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